शनिवार, 22 जुलाई 2017

गुडगाँव से नॉएडा,नोएडा से रानी माजरा और वापसी : बाइक यात्रा

23 जून 2017 से  25 जून,2017
हरिद्वार लस्कर बाईपास पर कहीं 
कई दिनों से अश्विन भाई मुझे अपने गाँव आने का निमंत्रण दे रहे थे लेकिन कुछ न कुछ हो जाता था और योजना को रद्द करना पड़ जाता था। पिछले हफ्ते भी ऐसा ही हुआ था। उस वक्त उनका तो टिकट हो गया था लेकिन मेरा नहीं हुआ था। लेकिन फिर भी मैं जैसे तैसे जाने के पक्ष में लेकिन कुछ ऐसा हो गया कि हम जा न पाए और फिर अंत में रविवार को दिल्ली में ही भ्रमण किया। उंसके विषय में जानने के लिए इधर क्लिक करें।

अब 22 जून की बात है कि अश्विन  भाई का दोबारा व्हाट्सएप्प आया। उन्होंने कहा इस बार चलना है क्या? मैं तो राजी था। मैंने मन बना लिया था कि कहीं नहीं तो नीलकंठ महादेव तक की जंगल ट्रेक को अंजाम दे ही दूँगा। जब अश्विन भाई ने पूछा तो सोचा कि चलो बढ़िया है। शनिवार को उनके घर रुक लेंगे और रविवार को ऋषिकेष चल लेंगे। उनसे ये बात की तो वो भी इसके लिए राजी हो गये।

अब ये देखना था कि कैसे जाया जायेगा। अश्विन भाई से मैंने सब टिकट करने के लिए कहा। उन्होंने कोशिश की लेकिन कुछ भी नहीं बन पाया। फिर सोमवार को ईद थी  और इस वजह से हरिद्वार वाला रूट काफी बिजी रहने वाला था। अश्विन भाई ने खुद भी और अपने भाई  के द्वारा भी काफी कोशिश करवाई लेकिन कुछ नहीं हुआ। उन्होंने फोन पर मुझे बताया तो मैंने कहा कि क्या बाइक से जाया जा सकता है? मुझे मालूम था कि अश्विन भाई के पास बाइक थी। उन्होंने ये बात जँच गयी। लेकिन अभी भी इसमें परेशानी थी वो ये कि उनकी बाइक में ट्यूब वाले टायर थे जिनके पंक्चर होने की संभावना ज्यादा रहती है। अगर ऐसा हो जाता तो बीच में परेशानी उठानी पड़ती। इसलिए उन्होंने कहा कि वो ऐसी गाड़ी का इंतजाम करते हैं जिसमे ट्यूबलेस टायर्स हों।मैने कहा अश्विन भाई परेशानी की तो एक और बात है वो ये कि मुझे गाड़ी चलानी नहीं आती। उन्होंने दिलासा दिया कि इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी। फिर क्या था अब एक खाका तैयार हो चुका था। हमे उसी हिसाब से चलना था।  

मुझे शुक्रवार को सीधे अश्विन भाई के रूम पे जाना था जहां से हम शनिवार सुबह जल्द से जल्द निकल पड़ते। मैं खुश था चलो एक बाइक यात्रा तो होगी। कुछ देर बाद अश्विन भाई का दोबारा कॉल आ गया कि बाइक का इंतजाम हो गया है। अब बस शुक्रवार का इंतजार था जब यात्रा शुरू करनी थी।

शुक्रवार की सुबह मुझे शेव बनानी थी लेकिन मैंने इस काम को शाम तक के लिए मुल्तवी कर दिया था। मेरी योजना ये थी मैं अभी ऑफिस चले जाऊँगा और फिर उधर से आकर थोड़ी एक्सरसाइज करके और तब अश्विन भाई के घर के लिए निकलूँगा। मैं छः बजे करीब तक वैसे भी रूम में आ  ही जाता हूँ। मैंने जाने के लिए सारा सामान इकट्ठा कर लिया था तो पैकिंग की कोई टेंशन नहीं थी। 

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

क़ुतुब मीनार : अश्विन भाई के साथ

रविवार 18 जून,2017



ऐसा नहीं है कि मैं क़ुतुब मीनार पहले नहीं गया हूँ। लेकिन मेरा मानना है जिस प्रकार आप एक किताब को दूसरी बार नहीं पढ़ सकते, क्योंकि एक बार पढ़ने के बाद आपके अवचेतन मन मे वो काफी कुछ बदल देती है, उसी प्रकार आप एक जगह दूसरी बार नहीं जा सकते। पढ़ना तो फिर भी ऐसी गतिविधि है जहां आप अकेले उस अनुभव को लेते हैं इसके बनिस्पत घूमने में कई वेरिएबल्स होते हैं। आप अगर कहीं दोबारा जाते है तो पाएंगे जिस वक्फे में आप उससे दूर रहे स् वक्फे में आपके और उस जगह के अंदर काफी कुछ जुड़-घट गया होता है। अगर ये वृद्धि  प्राकृतिक संपदा में होती है तो मन मे खुशी की लहर उठती है लेकिन अक्सर जब ऐसा नहीं होता और मौजूदा प्राकृतिक संपदा में आप कुछ घटाव महसूस करते हैं तो मन दुखी हो जाता है। जगह के इलावा आप किसके साथ उस जगह को देखने गए थे ये भी आपके घूमने के अनुभव को अलग बनाता है। कहने का लब्बोलबाब ये हुआ कि मेरी समझ में एक जगह को दूसरी बार देखना नामुमकिन है। एक बार डॉन, जिसकी तलाश सोलह मुल्कों की पुलिस को है, पकड़ में आ सकता है लेकिन आप दोबारा उसी जगह पहुँचे ये नहीं हो सकता। आप इस विषय में क्या सोचते हैं? मुझे बताईयेगा। 

अब आते हैं वृत्तान्त पर।

मेरा अश्विन भाई के साथ उनके गाँव जाने का प्लान काफी दिनों से चल रहा था। हमेशा सप्ताहंत का प्रोग्राम बनता था और उस वक्त ऐसा कुछ न कुछ हो जाता था  कि प्रोग्राम कैंसल करना पड़ता था। इस  सप्ताहंत भी ऐसा ही हुआ। मैंने इस  हफ्ते की शुरुआत में ही अश्विन भाई को बता दिया था कि इस हफ्ते कुछ भी हो मैं उनके साथ चलूँगा। मेरे तरफ से प्रोग्राम कैंसिल नहीं होगा। फिर गुरूवार की सुबह को मुझे किसी काम के लिए इंदौर को निकलना पड़ा। लेकिन मेरी वापसी उसी दिन की थी तो शुक्रवार की मुझे कोई दिक्कत नहीं थी। वैसे एक बात पहले ही हो चुकी थी। अश्विन भाई की टिकेट बुक हो चुकी थी। मेरा ख्याल उनके दिमाग से निकल गया था क्योकि उनकी टिकेट किसी और ने करवाई थी। जब मैंने उनसे बात की तो हमने यही निर्णय लिया कि मैं जनरल का टिकेट लेकर स्लीपर में चढ़ जाऊँगा और फिर फाइन दे दूंगा। उनकी तो सीट हो ही रखी थी तो बैठने में कोई परेशानी नहीं होती। अब मुझे शुक्रवार का इन्तजार था। 

शुक्रवार आया और मुझे थोड़ा आलस आने लगा। मन में आ रहा था कि प्रोग्राम कैंसिल कर दूँ। लेकिन फिर ऐसा हर यात्रा के वक्त होता है लेकिन इस आलस को पार करके यात्रा पे निकलो तो मज़ा दोगुना हो जाता है।  इसलिए  मैंने अपने तरफ से प्लान कन्फर्म ही रखा। 

लेकिन  होनी को कुछ और ही मंजूर था। शुक्रवार का प्लान कैंसिल हुआ क्योंकि अश्विन भाई को जरूरी काम आ गया था। इसके बाद योजना शनिवार के सुबह जाने की बनी लेकिन  आखिरकार उसे भी मुल्तवी ही करना पड़ा। अब मेरे पास शनिवार खाली था तो मैंने इसमें कपड़े वगेरह निपटाए और अपनी चोटिल कमर को आराम दिया। जब प्रोग्राम कैंसिल हो रहा था तो अश्विन भाई ने पूछा कि सप्ताहंत में क्या करोगे तो मैंने बता दिया था कि यही दिल्ली में ही कहीं घूम लूँगा। तो उन्होंने भी साथ में आने के विषय में बोला। तो मैंने कहा कि चलो आप जिधर रहते हो उधर के ही आसपास ही घूमने जाते हैं। मैंने अक्षरधाम मंदिर नहीं देखा था तो सोचा उधर ही घूमा जाएगा। उन्होंने भी इसे नहीं देखा था तो उन्होंने भी इधर जाने की हामी भर दी। तो अब ये तय था कि रविवार कि कहीं न कहीं तो जाया जायेगा। 

रविवार की सुबह को मेरी आँख सात - साढ़े सात बजे ही खुली। मैंने चाय वगेरह बनाई और ब्लॉग पोस्टस पे काम करने लगा। नौ बजे करीब तक मैं चाय की चुस्की लेता जा रहा था और ब्लॉग पे काम कर रहा था। इसी दौरान उन्हें सन्देश भेजा कि कब चलोगे अक्षरधाम। मेरा मन शाम को जाने का था। लेकिन उनका जवाब आया कि एक दो घंटे में चलते हैं। मैं थोड़ा हड़बड़ा गया। मैंने चाय का कप किनारे रखा और उनसे कहा कि अभी तो उठकर खाली चाय का दौर चल रहा है। तो उन्होंने कहा एक दो घंटे तो हैं नाश्ता कर लो और मिल लो। मैंने देखा नौ बज रहे थे तो सोचा कि ग्यारह बजे करीब इधर से निकलूँगा। यही बात मैंने उन्हें बताई।  पोस्ट जितनी लिखी थी उतनी लिखी और उसे सेव किया। फिर नाश्ता बनाने में जुट गया। नाश्ते में अंडे के भुर्जी और चाय करने की सोची। उसकी तैयारी की और नहाने चला गया। नहाने जाने से पहले चाय का पानी उबालने के लिए छोड़ गया। नहाकर आया तो चाय उबल चुकी थी। उसे किनारे रखा और  फिर भुर्जी बनाई।  भुर्जी तैयार थी तो अब दोबारा चाय का पहले से उबला पानी चढ़ाया तो दो मिनट में वो भी तैयार। (जब एक चूल्हे वाला इंडक्शन हो तो ऐसे ही काम करना पड़ता है।) अब चाय और भुर्जी से पेट भरा। तब तक ग्यारह बज गये थे। मैं निकल रहा था। उस वक्त मेरे फ़ोन में नेट भी एक्टिवेट नहीं था। मैं अपने पीजी के वाईफाई से एक्टिव था। मैंने अश्विन भाई को बोला कि मैं निकल रहा हूँ और चूँकि नेट एक्टिव नहीं है तो समय समय पर कॉल करता रहूँगा। उन्होंने कहा ठीक है। 

गुरूवार को मौसम थोड़ा ठंडा  हुआ था तो उम्मीद कर रहा था कि गर्मी कम होगी और मौसम में यही ठंड बरक़रार रहेगी। जब निकला था तो हल्की सी बदली थी लेकिन  ऐसा लग ही रहा था कि वो सूरज महाशय को ज्यादा देर तक छुपाकर नहीं रख सकेगी। क्योंकि गर्मी बढ़ने लगी थी।  लेकिन उम्मीद फिर भी थी। उम्मीद करने में क्या जाता है। ऑटो से बैठकर मैं एम जी मेट्रो बैठा। फिर प्लेटफार्म पर चढ़ा और अश्विन भाई को कॉल किया। उन्हें कॉल करके बताया कि मेट्रो में हूँ और राजीव चौक पहुँच कर कॉल करता हूँ। पहले मैं केन्द्रीय सचिवालय उतरना चाहता था लेकिन उन्होंने ही सलाह दी कि दो तीन ट्रेन बदलोगे तो उतना ही वक्त लग जायेगा। मेरे को ये बात जची और मैंने इस पर अमल करने की सोची। 

अब मैं ट्रेन में चढ़ चुका था। ट्रेन की एसी शरीर को राहत दे रही थी। मैंने अपना किंडल निकला और रेजीना बेथोरी का लघु उपन्यास लाजलो खोल दिया। मैं बहुत दिनों से इसे पढने की सोच रहा था तो सोचा इस सफ़र में इस इच्छा को पूरी करूँ। नोएल, किम और बेन तीन दोस्त हैं जो कि रोड ट्रिप पर निकले थे। कुछ दिनों में किम का जन्मदिन था और उसके दोस्तों ने उसके लिए कुछ सरप्राइज पार्टी प्लान करी थी। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। मैं उनके साथ उनके सफ़र में शरीक था इसलिए मुझे पता ही नहीं लगा कि कब राजीव चौक आ
गया। मैंने उनकी कहानी को थोड़ा पॉज दिया और राजीव चौक में उतरा। मैं ऊपर चढ़ा और नॉएडा की तरफ जाने वाली मेट्रो का इन्तजार करने लगा। मैंने उन्हें 11:32 को कॉल करी होगी। जब रूम से निकला था तो उन्होंने बता दिया था कि वो पैतालीस मिनट में अक्षरधाम पहुँच जाएँगे। मेरे को तो वक्त लगना था। मैं 12:24 के करीब राजीव चौक था और मैंने उन्हें इस विषय में फोन करके इत्तला कर दी। मैंने कहा मैं दस पन्द्रह मिनट में ही अक्षरधाम में होऊंगा। उन्होंने भी कहा कि वो उस वक्त तक पहुँच जायेंगे। 

इतने में मेट्रो आई और मैं उस पर चढ़ गया। मैंने अपनी किताब दोबारा खोल दी। कथानक तेज रफ़्तार से भाग रहा था। नोएल, किम और बेन एक घर में घुसे थे जो बाहर से तो खाली दिख रहा था लेकिन उसके अन्दर कोई था। उधर उन्हें कई ऐसी चीजें भी मिली थी जिससे ऐसा लगता था जैसे उधर काले जादू का प्रयोग किया जा रहा था। मैं इसी में खोया हुआ था कि अक्षरधाम भी आ गया। अक्षरधाम से पहले एक रुचिकर वाक्या हुआ। उधर एक परिवार था जिसमे औरतों की संख्या ज्यादा थी। उन्हें उससे एक स्टेशन पहले उतरना था लेकिन वो इतने अन्दर बैठे हुए थे कि जब तक दरवाजे तक पहुचंते तब तक दरवाजा बंद हो गया था। वो घबराए न इसलिए उन्हें सलाह दी कि अगले में उतर जाओ और वापस इधर की तरफ आ जाओ। उनके चेहरे से चिंता की लकीरे गायब हो चुकी थी। अक्सर भीड़ भाड़ में स्टेशन छूट जाए तो आदमी बड़ा चिंतित हो जाता है। ऐसे लगता है जाने क्या हो गया। जबकि ये उतनी बड़ी बात भी नही होती।  वो अगले स्टेशन यानी अक्षरधाम का इन्तजार करने लगे।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

माउंट आबू मीट #9: होटल भाग्यलक्ष्मी और वापसी के ट्रेन का सफ़र


इस यात्रा वृत्तांत को शुरू से पढ़ने के लिए इधर क्लिक करें।  #हिन्दी_ब्लॉगिंग

यात्रा 21 मई 2017,रविवार की है

इवेंट के फेसबुक पेज से साभार 

दिलवाड़ा मंदिर समूह देखने के बाद दाल बाटी की पार्टी भी हो गयी। माउंट आबू में हमारा सफ़र अब खत्म हो चुका था।(इस विषय में पढने के लिए इधर क्लिक करें। )

अब हमारी अगली मंजिल होटल भाग्यलक्ष्मी थी। इधर नवल जी का रूम था। उनकी उदयपुर से फ्लाइट अगले दिन की थी इसलिए आज वो इधर रुकने वाले थे। हम इधर कुछ वक्त बिताना चाहते थे। इधर हमे एक और संपियन और उभरते लेखक  अमित श्रीवास्तव् जी मिलने आने वाले थे। उनका उपन्यास फरेब जल्द ही आने वाला है। वो नज़दीक में रहते थे और बाकी लोग उनसे पहले ही मिल चुके थे। अब चूँकि हमारी वापसी थी तो फिर मिलने का प्रोग्राम था।

हम गाड़ी से निकले तो कुलदीप भाई ने बोला उनकी थोड़ी तबियत सी ख़राब हो रही है। ये दिन भर गर्मी में घूमने के बाद एकदम से पूल में डुबकी लगाने का नतीजा था। लेकिन  अब क्या कर सकते थे ? एक ही काम था कि जब तक भाग्यलक्ष्मी पहुँचते तब तक वो आराम कर लेते। यही उन्होंने किया भी।

हम होटल भाग्यलक्ष्मी पहुँचे। हमने जो गाड़ी बुक की थी उनका काम हमे यहाँ तक छोड़ना था। इधर आकर हम लोग बैठ गये और बात चीत और चाय का दौर चला। कुछ चर्चा पॉलिटिक्स और कुछ ऐसे ही चलती रही। पॉलिटिक्स के ऊपर बात करते करते समूह दो धडो में बंट गया। चर्चा गर्मागर्म हो रही थी और मज़ा आ रहा था। मैंने थोड़ी देर चर्चा पे ध्यान दिया फिर  मुझे होटल के सामने पहाड़ी पर एक मंदिर नुमा जगह दिखी। मैंने राकेश भाई से उधर चलने के लिए कहा लेकिन अब वो भी थक चुके थे। उन्होंने अपनी असमर्थता जताई। मैं भी इतना तरो ताज़ा महसूस नहीं कर रहा था इसलिए मैंने भी उधर जाने का विचार त्याग दिया। आज के लिए वैसे भी काफी घुमक्कड़ी हो गयी थी। फिर अभी हमारे सामने वापस जाने के का भी सवाल खड़ा था।  हम लोगों की टिकेट कन्फर्म नहीं हुई थी।अभी कुलदीप भाई, योगी भाई और मेरे बीच इसको लेकर मंत्रणा हो रही थी। हमे पता चला कि नज़दीक ही बस स्टैंड है और उधर जाकर जयपुर जाने की बस का पता किया जा सकता है। जयपुर से दिल्ली तक आसानी से जाया जा सकता है। योगी भाई ने पहले मुझे जाने को कहा लेकिन ऐसी बातचीत का मुझे इतना अनुभव नहीं है। मैंने उनसे कहा तो उन्होंने खुद जाने के लिए हामी भर दी। फिर बस की बात चीत करने के लिए योगी भाई और राकेश भाई गये थे। वो वापस आये तो उन्होंने बताया कि बस का प्रोग्राम कैंसिल करना होगा। क्योंकि एक तो किराया अत्यधिक था और ऊपर से सफ़र भी तकलीफदेह होता। पहले बस से जयपुर जाओ और फिर दिल्ली का कुछ पकड़ो।  इसी दौरान हमारे साथ एक और साथी हो गये थे। ठाकुर महेश जी की टिकेट भी कैंसिल हो गयी थी। अब हम वापस जाने वाले छः थे। हसन अल्मास भाई, दीपक भाई, कुल्दीप भाई, योगी भाई, ठाकुर महेश जी और मैं। इनमे से खाली योगी भाई की ही टिकेट कन्फर्म हो पायी थी।  अब प्लान ये था कि स्टेशन पहुंचेंगे और जो होगा देख लेंगे। फिर दुबारा चाय का दौर चला। कुछ लोग नीचे चाय पी रहे थे और कुछ लोग ऊपर नवल भाई के रूम में थे। उधर फोन वगेरह चार्ज करने की व्यवस्था थी।

इतने में अमित भाई भी आ गये थे। उनसे मुलाक़ात हुई। उनसे ऊपर दिखने वाली जगह के विषय में जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि वो पिकनिक स्पॉट सा बन गया है। कई लोग उधर जाते हैं और पार्टी वगेरह भी उधर होती रहती थी। इसके बाद फोटोग्राफी का सेशन हुआ।

फोटो सैंडी भाई ने ली थी और खुद को स्लेटी करने का आईडिया उनका ही है। 

एक सेल्फी तो बनती थी। शिव भाई ने ये कमी पूरी कर दी। 


 इसके बाद विदाई कार्यक्रम चालू हुआ।  पहले शिव भाई , विद्याधर भाई और उनके साथ आये लोग विदा हुए। इसके थोड़े देर बाद संदीप भाई और राकेश भाई भी विदा हो गये। उन्होंने बाइक में जाना था। संदीप भाई को मुंबई जाना था तो उनका सफर हेक्टिक होने वाला था। सबने उन्हें आराम से बाइक चलाने की हिदायत दी। ये भी बोला गया कि ज्यादा नींद आये तो ढाबे में सो लेना। संदीप  भाई एक अनुभवी घुमक्कड़ हैं। उन्हें ये बातें तो पता होंगी ही। खैर, फिर थोड़ी देर में वो भी चले गये।

अब हम कुछ लोग ही बचे थे। जिनमे गुरूजी, जीपी सर, अमीर सिंह जी, वीर नारायण जी,पुनीत जी,संदीप अग्रवाल जी  और हम छः  जिन्होंने साथ जाना था। अमित जी थोड़ी देर के कहीं चले गये थे लेकिन वापस आये तो साथ में पकोड़ी लेकर आये। हमने थोडा थोडा खाया और फिर कुछ पकोड़ीयाँ नवल जी के रूम में भिजवाने को कहा। अमित भाई को उनसे बात करनी थी तो वो उधर लेकर चले गये। थोड़े देर ऐसे ही गप्पों का दौर चला। अब बाकियों की ट्रेन का वक्त हो गया था।  हम काफी लोग थे तो निर्णय ये हुआ कि एक ऑटो वाले भाई  गुरु जी और अन्य लोगों को लेकर जायेंगे और फिर हमे लेने वापस आयेंगे। हमारे ट्रेन में तो वक्त था। गुरु जी और अन्य लोगों की ट्रेन जाने वाली थी। इसलिए पहले चक्कर में गुरूजी, जीपी जी, अमीर सिंह जी, वीर नारायण जी,संदीप अग्रवाल जी  और अल्मास भाई निकल लिए। मैं उसके बाद नवल जी के रूम के  तरफ बढ़ चला। नीचे कुछ लोग सामान के पास बैठे हए थे। रूम में माहौल जमा हुआ था। ऐसे में सामान बाहर रखना उचित नहीं था तो मैंने अपना फोन चार्ज पे लगाया और नीचे से सामान ले आया। नीचे बैठे लोगों को भी ऊपर आने को कह दिया। मैं  वापस आया तो बाकियों का खाने का प्लान बन चुका था।  उन्होंने मुझे खाने के लिए पूछा तो मैंने मना कर दिया। पहले ही बहुत हो गया था और अब कुछ और खाने की उम्मीद नहीं थी। पुनीत भाई की ट्रेन का वक्त भी नज़दीक आ रहा था तो उन्हें यही बोला कि जल्दी जल्दी निपटा लो। लेकिन खाना आने में देर हो रही थी। होटल वाले से बात की तो पता चला और देर होगी तो ये निर्णय हुआ कि खाना रूम में लाने की बजाय नीचे बने रेस्तरां में ही मंगवाया जाए। यही किया गया और हम नीचे पहुंचे। उधर जब तक खाना आता तब तक ऑटो वाले के विषय में पूछा। अमित भाई ने पता कि तो पता लगा कि वो आ रहा है। इतने में खाना भी खाया गया। अब सब जल्दी जल्दी हो रहा था। जल्दबाजी में खाने का आर्डर जयादा हो गया था तो उसमें से कुछ  नवल जी से पूछकर ऊपर उनके रूम में भिजवाया और कुछ बाकी  लोगों ने खाया। फिर खाना पीना निपटाकर हमने अपना सामान लिया और ऑटो का इन्तजार करने लगे।

ऑटो वाला आया और उसमें सामान रखा गया और हम उसमे एडजस्ट हो गये। हमे जल्द से जल्द पहुंचना था। पुनीत भाई की ट्रेन को आने में दस पंद्रह मिनट ही रह गये थे। अब ऑटो स्टेशन की तरफ बढ़ चला था। जैसे जैसे घड़ी निर्धारित वक्त की और बढ़ रही थी वैसे वैसे ऑटो की गति हमें कम होती लग रही थी। क्या पता हम वक्त पे स्टेशन पहुँच पाते या नही ? हमारा तो खैर कोई नुक्सान नहीं होता लेकिन पुनीत भाई की ट्रेन तो कन्फर्म थी। ऐसे में हमारा वक्त पर पहुँचना जरूरी था। ऑटो की गति को देखकर तो लग रहा था कि वक्त के साथ हो रही ये रेस हम  हार जायेंगे। लेकिन ऑटो वाला भाई अनुभवी थे। उन्होने बोला था वक्त पर पहुंचा देंगे और उन्होंने हमे गाड़ी के निकलने के वक्त से पांच मिनट पहले ही  स्टेशन पहुंचा दिया। हम उतरे तो पुनीत भाई किराया देने के लिये पर्स निकालने लगे। हमने उनसे जल्द से जल्द अंदर जाने को बोला और कहा किराया हम दे देंगे। वो अन्दर की तरफ भागे। उनके साथ योगी भाई  भी थे। हमने किराया दिया और अन्दर की ओर बढ़ गये। तब तक पुनीत भाई और योगी भाई उस  प्लेटफार्म पे जा चुके थे जहाँ से उनकी ट्रेन मिलनी थी। हमारी ट्रेन (जिसका की टिकेट कैंसिल हो चुका था ) जिधर लगनी थी उधर उधर से सामने ही वो वाला प्लेटफार्म था। इसके इलावा गुरुजी और बाकी लोगों वाली ट्रेन अभी भी लगी हुई थी। जब वो ट्रेन निकलने लगी तो हमने खिडकियों से उन्हें देखने की कोशिश की लेकिन उसमे सफलता नहीं मिली। इतने में उनकी ट्रेन चलने लगी। अब हमें अपना जुगाड़ करना था।

हमे उधर अल्मास भाई भी मिल गए थे। वो हमसे पहले आ गए थे। हमने आपस से बात की कि क्या किया जाए। मैं रेल यात्रा का अनुभवी नहीं हूँ लेकिन बाकि सब जानते थे क्या हो सकता था ? प्लान ये था कि हम जनरल का टिकट लेंगे और फिर स्लीपर पर चढ़कर पर्ची कटवाएंगे  और साथ में टी टी से बात करके सीट का जुगाड़ करने  की कोशिश करेंगे। अब हमने टिकट लेने थे। इधर बात ये आयी की टिकट कैसे लिए जाएँ।  थोड़ा कंफ्यूजन था की कहीं पाँचों का टिकट एक में ही न मिल जाये। ऐसे में पांच लोगों को एक साथ देखकर टीटी सीट के जुगाड़ में आना कानी कर सकता था। इसलिए यही निर्णय लिया की सब अपना अपना टिकट लेंगे। हमने टिकट लिया और हम वापस आये। मेरी नज़रें उधर किसी बुक स्टाल को ढूँढ रही थी लेकिन अफ़सोस ऐसा कुछ नहीं दिखा। वरना जैसे उदयपुर में रीमा भारती के तीन उपन्यासों को लिया था ऐसे ही कुछ रोचक दिखता तो खरीद लेता। लेकिन फिर हम एक जगह सामान रख कर बैठ गये और गप्पे मारने लगे।

ऐसे  ही बातें चल  रहीं थीं कि पुनीत जी का फोन आया। उन्होंने बताया कि योगी भाई कि तबियत ठीक नहीं थी। हम सोच में पड़ गए कि अचानक ये क्या हुआ ? उनके अनुसार योगी भाई के पेट में दर्द हो रहा था।  हम उनके पास जा रहे थे कि ठाकुर महेश जी ने अपनी दवाई की पोटली से कुछ गोलियाँ निकाली और योगी भाई को देने के लिए कहा। हमने महेश जी को सामान के पास ही रहने के लिए कहा और ओवर ब्रिज को को क्रॉस करके पुनीत भाई  के पास गए।  योगी भाई थोड़ा आगे के साइड ही विराजमान थे।हम उधर पहुंचे और उन्हें पुदीन हरा की गोली दी और पानी दिया। उन्होंने वो लिया। उन्हें आराम पहुँचा। अब हम लोग  पुनीत भाई की ट्रैन का इंतजार करने लगे। कुछ ही देर  में उनकी ट्रैन आ गयी।  हमने उन्हें विदा किया और वापस ठाकुर जी के पास गए।

अब हमे अपनी ट्रैन का इंतजार था। हमने  इसी दौरान ये भी प्लान बना लिया था कि ट्रेन आते ही हम ये देख लेंगे कि हमें कौन सी सीट मिल सकती थीं। हमे एक आईडिया ये भी मिला था कि सीट्स देखें और ऐसे यात्रिओं को देखें जो दूर के स्टेशन से  चढ़ने वाले थे या जल्दी के स्टेशन पे उतरने वाले थे। ऐसा होता तो हमे सोने लायक जगह तो कुछ देर के लिए  मिल ही  जाती। इसके इलावा ये भी प्लान था टी  टी से बात करेंगे। ऐसे ही वक्त बीता और  ट्रैन भी आ गयी। टी टी से बात करने पर  उन्होंने साफ़ मना कर दिया कि कोई सीट नहीं मिल सकती। खैर, अब जाना तो था ही हम उस  डिब्बे में चढ़ गए जिसमे  की योगी भाई की सीट थी। प्लान ये था की हम लोग सीट का जुगाड़ करेंगे और जो सीट कन्फर्म है उसमे ठाकुर जी को स्थापित कर  दिया जायेगा। ऐसे ही हम चढ़ गए और गाडी चलना शुरू हो गयी।

योगी भाई की सीट जिस साइड अप्पर बर्थ पे थी उसके नीचे वाली सीट आरएएफ वालों के लिए आरक्षित थी। हम दरवाजे के सामने जम गए।उधर एक व्यक्ति पहले से ही खड़ा था। हमने एक चादर जमींन पे बिछाई और उधर ही बिछ गए। जब हम बैठ रहे थे तो आर पी ऍफ़ के जवान न कहा कि आप कहीं और बैठ जाओ क्योंकि उन्हें कुछ  कुछ देर में दरवाजा खोलना पड़ेगा और इससे हमे परेशानी होगी। हमने उनसे कहा जब ऐसी बात होगी तो उठ जायेंगे। इसके बाद हम बकैती करने लगे।   ऐसे जाने का मेरा ये पहला अनुभव था और मैं बहुत खुश और उत्साहित था।

थोड़ी देर में जो बगल में खड़ा लड़का था उसने हमे अपने बैग  का ध्यान रखने को बोला और कहीं चले गया। इसके बाद थोड़ी देर में टीटी साहब आ गए तो हमने अपनी अपनी पर्ची कटवाई और बैठ गए। अभी  सफर चालु हुए आधा एक घंटा ही हुआ होगा की बारिश आने लगी। जहाँ हम बैठे थे वो गेट के  नज़दीक और उधर से  पानी भी टपक रहा था। मैं वैसे भी थका हुआ था। सुबह सुबह लम्बी ट्रेक जो की थी। इसके इलावा एक और बात मेरे दिमाग में खटक रही थी। जो बंदा मुझे अपना बैग देखने का बोलकर  गया था वो काफी देर से नदारद था। जब हम चढ़े थे तो हमे लगा था कि वो हमारे जैसे ही जेनेरल टिकट धारक था और टीटी से बचने के लिए ही रफू चक्कर हुआ था। लेकिन उसको गए काफी वक्त हो चुका था।

अब मेरे दिमाग में टीवी में दिखने वाले विज्ञापन घूमने  लगे थे। कोई भी लावारिस वस्तु बम हो सकती है। मैं कभी पास वाले आरएफ वालों को देखता और कभी बैग को देखता। मेरे दिमाग कल्पना की उड़ान भरने लगा। मन में चित्र उभरने लगे कि कैसे ये बम फटेगा और हम क्योंकि नज़दीक हैं हमारे परखच्चे उड़ जायेंगे। शायद ये ज्यादा उपन्यास पढ़ने का नतीजा भी है। मैंने कुलदीप भाई को अपने मन में उपजी शंका से अवगत कराया। पहले तो उन्होंने इस बात को हँसी में टालना चाहा लेकिन फिर जिद करने पर हमने बात करने की सोची। तभी उधर से टीटी भी गुजरे। वो हमे पहचान ही गए थे क्योंकि हमने उनसे पहले प्लेटफार्म  बात की थी और फिर  हमने पर्ची कटाई थी। हमने उनसे बैग के बारे में बोला तो उन्होंने भी कहा कि कपडे ही होंगे। हमने कहा चेक कर लीजिये हमे संतुष्टि हो जाएगी। उन्होंने आरपीऍफ़ वाले  भाई से कहा जिन्होंने चैन वगैरह खोलकर  देखना चालू किया। ऐसे में मेरे मन में और विचार आने लगे। कभी मन में आता कि सचमुच ही उस बैग में बम मिलेगा और हमे हमारी मुस्तैदी के लिए इनाम मिलेगा। या कभी मन में आता की शायद  ड्रग्स मिले और हमे पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिए जाये। ऐसे ही रोमांचक कथानक मेरा मन बन रहे  था। लेकिन ये सब शेख चिल्ली के स्वप्न ही थे। बैग में कपडे ही थे। फिर हमने उन्हें बैग को अपने पास रखने के लिए बोला। अगर वो बंदा आता तो वो उनसे बैग ले लेता। वो राजी हो गए। वैसे यहाँ ये बात आश्चर्य वाली है कि  जब तक हम उधर बैठे थे तब तक वो बंदा वापस नहीं आया था।
जनरल वाले स्लीपर में। फोटो में दीपक भाई,अल्मास भाई और मैं। फोटो कुल्दीप भाई ने खींची 
हमको भिगोने को आतुर पानी हमारी ओर बढ़ता हुआ 

खैर,अब हम मस्ती कर रहे थे। सीट का कोई जुगाड़ नहीं हुआ था लेकिन ये पता चला था कि ये गाडी जयपुर तक खाली हो जाती है जहाँ से सीट  मिलने की संभावना थी। ऐसे ही मस्ती चल रही थी कि उधर से एक आरपीएफ वाले  भाई से बात होने लगी। उनसे  भी हमने सीट के लिए बोला तो उन्होंने भी असमर्थता जताई। हमने कहा ५०० रूपये में एक सीट नहीं हो सकती।  वो हँसने लगे क्योंकि हमने ये बात हँसते हँसते ही कही थी। हंसी हंसी में ये भी बोले कि आज तो ढाई हज़ार भी दोगे तो कुछ न मिलेगा।

जब शुक्रवार को सफर के लिए निकला था तो ये नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ अनुभव होगा। अब नींद भी आ रही थी। अल्मास भाई तो ठाकुर साहब को उनकी स्थापित जगह से हटाकर सोने के लिए बढ़ गए थे। ठाकुर साहब हमारे साथ आकर बैठ गए। उन्होंने बताया वो  तो जगे हुए थे और उन्हें ट्रैन में नींद अक्सर कम ही आती है।

अब कुलदीप भाई और मैं आगे सीट देखने गए क्योंकि एक स्टेशन आने वाला था। हमे एक सीट मिल भी गयी लेकिन जैसे ही सीट पर चढ़ने लगे तो नीचे से एक बुजुर्ग ने कहा कि उनकी सीट है। अब बहस होना लाजमी था। कुलदीप भाई तो चढ़ ही गए थे  सीट पर की उठाओ मुझे। बहस बढ़ने लगी लेकिन फिर उनके  उम्र का लिहाज किया और उतर गए। हुआ ये था कि कायदे से वो लोग ज्यादा थी और उनकी सीट कम थी। उन्होंने स्टेशन में उतरने वाले भाई से अपनी सीट बदल दी थी। और खुद उस भाई की सीट पर दो दो सो रहे थे। अब जब उस भाई की सीट खाली हुई तो वो वापस आपने सीट पर जाने का सोचने लगे क्योंकि उस भाई की सीट पर तो वो पहले से ही काबिज थे। उनकी योजना सही थी जिसपे हम बट्टा लगाने जाने कहाँ से धमक गये थे।

वैसे भी हम थके हुए थे तो ही बहस हुयी थी। साधारण वक्त पर तो ऐसे होती ही नहीं। खैर, हम आगे बढ़ गए। हमारी किस्मत अच्छी थी कि एक ऐसी सीट मिल गयी जो आने वाले स्टेशन पे खाली हो रही थी। हमने उसे अधिकार में ले लिया  और बैठ गए। तभी एक युवती अपनी माता जी के साथ आ गयीं और कहने लगी ये उनकी सीट है। हमने कहा ऐसा कैसे हो सकता है टिकट दिखाइए तो उन्होने कहा कि टी टी ने बोला। हमने कहा उन्हीं को लेकर आइये। हमे पता था क्या हुआ होगा। वो चली गयीं। कुछ देर बार टीटी साहब आये तो हमे पहचान गए और बिना कुछ बोले चले गए। उन्हें शायद दूसरी सीट दे दी होगी। कुलदीप भाई ने मुझे उधर बैठाया और बोला कि वो आते हैं आगे सीट देख कर।अगर कुछ मिला तो ठीक नहीं तो एक ही सीट में एडजस्ट होना पड़ेगा। लेकिन जैसे ही ट्रैन रुकी तो ऐसे भीड़ चढ़ी की सीट की उम्मीद बेकार हो गयी। थोड़े देर में कुलदीप भाई आये और उन्होंने इस बात की पुष्टि कर दी। अब क्या था अब तो इसी सीट पर एडजस्ट होना था। हम किसी तरह एडजस्ट हुए और कुछ ही देर में सो गए।

सुबह के वक्त गर्दन में दर्द हुआ तो नींद टूटी। मेरी गर्दन सीट से बाहर निकली हुई थी। कुलदीप भाई गहरी नींद में थे। मैं अपनी जगह से उठा और बाथरूम वगैरह गया। गेट खुला हुआ था तो उधर कुछ फोटो खींची। थोड़ी देर में उधर एक आर पी एफ वाले आये और उन्होंने गेट बंद करने के लिए कहा। ये पौने सात बजे का वक्त रहा होगा।

वापसी के दौरान ट्रेन से ली गयी एक तस्वीर

वापसी के दौरान ट्रेन से ली गयी एक तस्वीर

वापसी के दौरान ट्रेन से ली गयी एक तस्वीर 




उन्होंने  गेट बंद किया और दीपक भाई लोगों को के पास चले गया। मुझे  समझ नहीं आया कि सुबह के वक्त गेट बंद करने का औचित्य क्या था ? खैर, उधर भी दीपक भाई लोग उठ गए थे। अब गुडगाँव आने की देर थी। मुझे उतरकर ऑफिस जाना था। ट्रैन लेट थी तो ऑफिस में इस बाबाबत पहले ही बता दिया था कि लेट हो जाऊंगा। इसी दौरान सब आ गये थे। हमने चाय वगेरह भी पी ली थी। मैंने मुझसे बुरा कौन के कुछ पृष्ठ भी पढ़ लिए थे।  गुडगाँव आने से  पहले के ही कई स्टॉप्स से लोकल पब्लिक चढ़ने लगी थी। ऐसे में ज्यादातर यात्री उठ गए थे। मैं इस चीज से वाकिफ था क्योंकि जब मुंबई में रहता था तो सेंट्रल रेलवे वाले ज्यादातर लोग जो कल्याण रहते थे ऐसे ही एक्सप्रेस पकड़ना पसंद करते थे। वो लोकल से सफर करना इतना पसंद नहीं करते थे क्योंकि वो वक्त ज्यादा लेती थी और उसमे भीड़ भी काफी रहती थी। ठाकुर साहब आज शाम तक  दिल्ली ही थे।गुरूजी के ऑफिस में  मिलने का प्रोग्राम था। मैंने कहा कि ऐसा कुछ होता है तो मुझे बता दीजियेगा  मैं भी आने की कोशिश करूंगा। कोशिश ही कह सकता था क्योंकि पता नहीं था ऑफिस से कब छूटूँ। फिर थोडा थकान भी थी ही।अब गुडगाँव का स्टेशन आया तो मैंने सबसे विदा ली और उतर गया। उधर से सीधे अपने रूम में गया। उधर पहुँचकर नहाया और ऑफिस के लिए निकला। अब सीधे ऑफिस जाना था।

एक यात्रा का अंत हुआ था लेकिन इसी यात्रा के दौरान ही कई और यात्राओं की योजना बन गयी थी। कौन सी यात्राएं थी? उसके विषय में तो जब वो यात्राएं होंगी तो बताऊँगा। अभी के लिए तो इतना कहूँगा कि इस यात्रा से काफी यादें मिली, कई बेहतरीन लोगों से रूबरू होने का मौका मिला और कई अनुभव मिले। कुछ अपने को जाना और कुछ दूसरों को जाना। यही जानना पहचानना तो यात्रा का मज़ा होता है, क्यों है न?

पुनाश्च : अमित भाई ने ये याद दिलाया कि होटल का नाम धनलक्ष्मी नहीं भाग्यलक्ष्मी था। उनका धन्यवाद। और अब मुझे बादाम की मात्रा बढ़ानी पड़ेगी या अगली बार जिस जगह रुकूँ उधर की फोटो ले लेनी पड़ेगी। 😜😜😜😜😜😜

सम्पात 

पूरी ट्रिप के लिंकस
माउंट आबू मीट #१: शुक्रवार का सफ़र
माउंट आबू मीट #२ : उदय पुर से होटल सवेरा तक
माउंट आबू  #3 (शनिवार): नक्की झील, टोड रोक और बोटिंग
माउंट आबू #4: सनसेट पॉइंट, वैली वाक
माउंट आबू मीट #5: रात की महफ़िल
माउंट आबू मीट #6 : अचलेश्वर महादेव मंदिर और आस पास के पॉइंट्स
माउंट आबू #7:गुरुशिखर
माउंट आबू मीट #8: दिलवाड़ा के मंदिर, होटल में वापसी,दाल बाटी  की पार्टी 
माउंट आबू मीट #9: होटल भाग्यलक्ष्मी और वापसी के ट्रेन का सफ़र

रविवार, 2 जुलाई 2017

ब्लॉगर में ब्लॉग पोस्ट के लिए कस्टम यूआरएल कैसे बनायें

अक्सर, मैं देखता हूँ कि हिंदी ब्लॉगर्स  के पोस्ट के यूआरएल का उनके पोस्ट के कंटेंट से कोई लेना देना नहीं होता है। ब्लॉगर की एक कमी ये है कि अंग्रेजी के शीर्षक को तो वो यूआरएल में बदल देता है लेकिन हिंदी के शीर्षक के साथ ऐसा नहीं कर पाता है। ऐसे में वो इस प्रकार का लिंक ही पोस्ट के लिए बनाता है:

http://duibaat.blogspot.com/2017/07/blog-post.html

अब इस लिंक को आप किसी को भी दें तो उसे अंदाजा नहीं हो पायेगा कि पोस्ट किस विषय में है। वैसे लगने को तो ये छोटी सी बात है लेकिन इसका असर काफी पड़ता है। मसलन आपकी पोस्ट सर्च रिजल्ट्स में कम आएगी। अगर आई भी तो उन पोस्ट्स से काफी पीछे होगी जिनका यूआरएल उनके पोस्ट के कंटेंट से मिलता जुलता है। अगर आप सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन का कोई भी लेख पढेंगे तो पायेंगे यूआरएल का कंटेंट से सम्बंधित होना महत्वपूर्ण माना जाता है और अक्सर इसकी सलाह दी जाती है।

अब  आप सोच रहे होंगे कि कैसे आप कस्टम यूआरएल बना सकते हैं ? ये बहुत आसान काम है और चुटकियों में किया जा सकता है। आइये जानते हैं।

शनिवार, 1 जुलाई 2017

माउंट आबू मीट #8: दिलवाड़ा के मंदिर, होटल में वापसी,दाल बाटी की पार्टी

इस यात्रा वृत्तांत को शुरू से पढ़ने के लिए इधर क्लिक करें।

यात्रा 21 मई 2017,रविवार की है

फेसबुक के इवेंट पेज से साभार 


अब हम दिलवाड़ा के जैन मंदिरों की तरफ जा रहे थे। हम सबसे पहले गुरुशिखर से  निकले थे और इस बात का एहसास हमे काफी दूर जाकर हुआ। हमने एक लाल मंदिर के सामने गाड़ी रुकवाई और फिर बाकियों को फोन किया गया। ये एक अच्छा लैंडमार्क था जहाँ हम इन्तजार कर सकते थे। मैंने बाहर आकर इस  मंदिर की फोटो खींची।  इसके इलावा उधर एक साइनबोर्ड था जिसमे ट्रेवर्स टैंक लिखा था। शायद कोई ट्रेक हो सकती थी इसलिए मेरा ध्यान उधर गया। मैं उधर जाना तो चाहता था लेकिन समूह का कोई राज़ी नहीं होता तो इसलिए कुछ कहा नहीं। फिर थोड़ी देर में बाकियों से बात हो गयी तो पता चला कि वो ब्रह्म कुमारी का शान्ति केंद्र देखने लग गये थे। उन्होंने हमे आगे दिलवाडा के मंदिरों में जाने के लिए बोला और कहा कि वो उधर ही हमे मिलेंगे। हम अब अपने गंतव्य की ओर बढ़ चले।

सत्संग आश्रम लाल मंदिर 

ट्रेवर्स टैंक को जाता रास्ता 


हम दिलवाडा पहुँचे तो ड्राईवर   साहब ने गाड़ी लगाई और हमसे कहा कि हम मंदिर देखकर आ जाए। वो हमारा उधर ही इन्तजार करेंगे। मंदिर में फोन ले जाने की   अनुमति नहीं थी तो हमने अपने फोन गाड़ी में ही रख दिए।हम मंदिर की ओर बढ़ चले। मंदिर के प्रांगण में पहुँचे तो उधर लाइन लगी हुई थी। उधर जूते उतारने थे और नंगे पाँव अन्दर जाना था। उधर ड्रेस कोड भी था। एक रूल के अनुसार शॉर्ट्स में अन्दर जाना मना था।  ये पढ़कर मुझे हँसी आ गयी। खैर, उनका मंदिर था वो इस बात के लिए स्वंतत्र थे कि उन्हें कैसे लोगों की आवाजाही उधर स्वीकार थी।

हमने अपने जूते उतारकर एक जगह रखे और लाइन में लग गये। क्योंकि मंदिर में बहुत श्रद्धालु आते हैं तो मंदिर में सब कुछ व्यवस्थित हो इसलिए एक छोटे समूह को ही एक बार में अन्दर भेजा जाता था। दो समूहों के जाने के बीच का वक्फा 15 मिनट का है। हम अपनी बारी आने का इन्तजार करने लगे। हमने इन मंदिर के शिल्पकला की काफी तारीफ सुनी थी और हम उसे देखने के लिए उत्सुक थे।

हमारी बारी आई। हमारे समूह को एक मार्गदर्शक दिया गया था जिनका काम हमे मंदिरों से परिचित करवाना था। उन गाइड ने हमे बताया कि यहाँ पाँच मंदिर थे। और वो एक एक करके हमे हर मंदिर को दिखवाने वाले थे।
हमारे गाइड ने हमे ये भी बताया कि हर टूर पन्द्रह मिनट का होता है और उसके बाद सैलानी इस बात के लिए स्वतन्त्र होते हैं कि वो मंदिर में रुकना चाहते हैं या बाहर जाना चाहते हैं लेकिन जब तक टूर चले तो सबको साथ रहना होता है। दूसरी बात उन्होंने ये बताई की इधर फर्श काफी गर्म होगा तो हम लोग एक सफ़ेद मार्बल की जो पट्टी बनी है उसी में चले। हम चलने लगे तो हमे एक मार्बल की पट्टी भी दिखी तो उसी में चलने लगे।

 अब टूर शुरू हो चुका था और हमे मंदिरों के विषय में बताया जाने लगा। पहले हमे बताया गया कि कितने मंदिर और फिर एक एक करके उधर ले जाया गया। जैसे जैसे गाइड कुछ बताता जाता वैसे वैसे लोग बाग़  आपस में टिपण्णी करते रहते। जैसे मुझे याद आ रहा है जब गाइड भाई मंदिर की लागत बता रहा था तो एक खुराफाती बोला कि उस वक्त रूपये होते ही नहीं थे। फिर थोड़ी चर्चा इस बात पर चली कि जो लागत बताई जा रही है वो उस वक्त के हिसाब से है या उस वक्त की कीमत की वैल्यू अब क्या होगी उस हिसाब से है। मैं चुपचाप इस बहस का आनंद ले रहा था।

फिर जीपी जी ने भी कहा कि वो कीमत तो आज के हिसाब से ही बता रहे होंगे। मुझे भी यही लगता है।

इसके इलावा एक छोटा सा डिस्कशन अमीर सिंह जी के साथ भी हुआ। उन्होंने इन मंदिरों की भव्यता को एक अलग नज़रिए से देखा। मैं भी कुछ ऐसे ही देखता हूँ। उन्होंने कहा इन भव्य मंदिरों की लागत निकालने के लिए कितनों का शोषण हुआ होगा। मैंने कहा बहुत लोगों का। और ये मंदिर ही क्यों ये बड़े बड़े किले, इमारतें,भव्य धार्मिक जगहें(सभी धर्मों की)  और अन्य चीजें अगर देखा जाए तो आम जनता के पैसे और खून पसीने से ही तो बनी है। बस नाम उसका हो जाता है जिसने पहले ये पैसा उस जनता से निकलवाया और इधर लगाया। लेकिन ये विमर्श लम्बा खिंच सकता था  और इसके ऊपर आराम से चाय पे कपों के साथ बातचीत होनी चाहिए थी इसलिए हमने इस विमर्श को ज्यादा लम्बा न खींचते हुए विराम दे दिया और दुबारा मंदिर की भव्यता में खो गये।

हमे दो गाइड मिले थे। एक ने पहले दो मंदिर दिखलाये। फिर हमे ऊपर की तरफ भेज दिया गया जहाँ एक पुजारी जैसे एक जवान युवक थे जिन्होंने हमे बाकी के दो मंदिर दिखाए और उनके विषय में बताया। उन्होंने हमे बताया तो काफी कुछ था लेकिन अब मैं सारी बातें भूल चुका हूँ। उस वक्त मुझे अपने फोन की बड़ी याद आ रही थी। ऐसे वक्त पे मैं फोन का रिकॉर्डर एप्प चालू कर देता हूँ जिससे महत्वपूर्ण जानकारी छूटती नहीं है और बाद में वृत्तांत लिखने में भी आसानी होती है। अब सोचता हूँ उधर एक नोट बुक ले जानी चाहिए थी। लेकिन अब तो चिड़िया ने खेत चुग लिया तो क्या फायदा। जो जो याद है वही बता पाऊँगा।

जब हम वापस जाने को हुए तो इस युवक ने एक बढ़िया स्पीच भी थी जिसका सार ये था कि वो लोग फ्री में ये काम करते हैं और चूंकि मंदिर में कोई आने का टिकेट नहीं लगता तो उनका जीवन यापन सैलानियों के दी गयी दक्षिणा से होता है। तो ये हमारे ऊपर था कि हम उसे दक्षिणा देते या नहीं। मैंने तो दे दिया। बाकियों ने भी दिया।

अब आइये पहले मंदिर के विषय में बता दूँ। बाद में आगे बढ़ेंगे।
उधर मौजूद पाँच मंदिर निम्न हैं :

१. विमल वसहि
विमल वसहि दिलवाड़ा मंदिर समूह में से एक प्रमुख मंदिर है
- यह प्रथम तीर्थंकर को समर्पित है और सबसे प्राचीनतम मंदिर है
-इसका निर्माण १०३१ में गुजरात के राजा विमल शाह ने करवाया
-गाइड द्वारा बताया गया कि उस वक्त इसकी लागत १८ करोड़ ५३ लाख थी
- इस मंदिर के निर्माण में २७०० मजदूर लगे थे

२. लूण वसहि
- ये दूसरा प्रमुख मंदिर है जो की २२ वें तीर्थंकर नेमीनाथ को समर्पित है
-इसे १२३० में दो भाईयों -वास्तुपाल और तेजपाल ने बनाया था जो कि गुजरात के राजा वृधावल के यहाँ मंत्री थे
-इसका निर्माण उनके भाई की याद में किया गया था
-इसी मंदिर के पास एक कीर्ति स्तम्भ भी है।
३.श्री ऋषभ देव जी
- ये मंदिर पहले तीर्थंकर को समर्पित है
- इसमें आदिनाथ जी की १०८ मन की मूर्ती है
४.श्री पार्श्वनाथ जी

५. श्री महावीर स्वामी जी

इन मंदिरों की कारीगिरी मन को मोह लेने वाली थी। खासकर छत पर जो इन्होने मार्बल का फानूस बनाया था उसे देखकर आश्चर्य होता था। गाइड ने ये भी बताया था कि मजदूरों ने ऊपर देखते हुए ही इसका निर्माण किया था क्योंकि बनाकर ऊपर फिट करना मुश्किल था। ये सोचकर मन में उन कलाकारों के प्रति श्रद्धा का भाव अपने आप ही जाग जाता है।

इसके इलावा इधर देवरानी जेठानी के गोखले  हैं। ये  दो  खिड़की नुमा स्ट्रक्चर है,एक देवरानी का और एक जेठानी का , जिसके इर्द गिर्द काफी अच्छी कारीगरी की है। कहते हैं जब ये मंदिर बन रहा था तो दोनों भाईयों से उनकी पत्नी से दरख्वास्त की कि उनकी याद में भी कुछ इस मंदिर में जोड़ा जाए। इसके बाद भाईयों ने गोखले  बनाने की सोची।  देवरानी और जेठानी में ठन गयी। अगर एक का अच्छा बनता तो दूसरा अपने लिए बना हुआ झरोखा तोड़ देती। ऐसे ही जब चलता रहा तो भाईयों ने निर्णय लिया कि दोनों के लिए एक ही तरीका का झरोखा बनेगा। बस गाइड ने जो हमे बताया वो ये कि आम लोग इन दोनों में फर्क नहीं कर पाते हैं लेकिन अगर ध्यान से देखो तो पता चलेगा कि देवरानी के झरोखे में कुछ मूर्तियाँ है जिनकी गर्दन थोड़ी झुकी है जो कि ये दर्शाता है कि वो जेठानी को सम्मान दे रही है। जब ये कहानी चल रही थी तो समूह में काफी हँसी ठट्ठा होने लगा। शायद आदमियों को भी अपने घरों के देवरानी जेठानी के झगड़े याद आ गये। और औरतों को अपना अक्स इसमें दिखने लगा। माहौल थोडा हँसी मज़ाक वाला हो गया था।

अब खाली एक मंदिर बचा हुआ था तो उसमें जाने से पहले थोड़ा आराम करने की सोची। तब तक बाकी लोग भी आ गये थे। उन्होंने हमे देखा और हमारी तरफ ही आ गये। उनका बाकी मंदिरों की तरफ जाने का विचार नहीं लग रहा था।  हम साथ ही आखिरी मंदिर की तरफ बढे। यह मंदिर कारीगरों ने बनाया था। वो दस से बारह घंटे बाकी के मंदिरों में काम करते और जो खाने का वक्त होता उस में इस मंदिर में काम करते। इसमें इस्तेमाल किया गया सामान वो था जो बाकी के मंदिरों से बचता था या उधर के लिए उपयुक्त नहीं  माना जाता था। ये भी खूबसूरती में कहीं भी पहले वाले मंदिरों से कम नहीं था।

हमने कुछ वक्त इधर बिताया और फिर मंदिर से बाहर आये। मेरा तो और घूमने का मन था लेकिन समूह में हो तो मेजोरिटी की ही चलती है। बाहर निकलते वक्त  बस मन में एक ही विचार था कि काश इधर फोटो खींचने का प्रतिबन्ध नहीं होता तो मज़ा आ जाता। लेकिन अब किया क्या जा सकता है।

मंदिर से बाहर एक दूकान थी जो छोटी छोटी पुस्तिका बेच रही थी। मैंने उधर से माउंट आबू वाली पुस्तिका ली। फिर हमने जूते पहने और अपनी कार की ओर निकले। हमारे साथ नवल जी भी थे। वो आये तो दूसरे ग्रुप के साथ थे लेकिन अब हमारे साथ चलने लगे थे।  वो बड़े दिलदार और हँस मुख प्रवृत्ति के आदमी हैं। हम होटल की तरफ चल दिए थे और उन्होंने पूरे रास्ते भर समा बाँध कर रखा।

हम कुछ ही देर में होटल पहुँच गये। क्योंकि हमारा होटल नज़दीक ही था। पांच किलोमीटर से भी कम रहा होगा।

हम होटल की लॉबी में बैठकर बाकी सबके आने का इंतजार करने लगे। जब हम दिलवाडा से निकल रह थे तो ये प्लान बना था कि हम दाल बाटी खाने जायेगे। जब सब आ गये तो इसी प्लान को अमलीजामा पहनाया जाने लगा। पहले सबने फ्रेशन अप होने की सोची। जब तक मैं फ्रेश होकर वापस आया तो बाकी लोग दाल बाटी के लिए निकल चुके थे। उधर कुलदीप भाई ही थे। फिर हम दोनों भी चल पड़े। उन्होंने राकेश भाई की बाइक को इस काम के लिए थामा। हमे इससे पहले ए टी एम भी जाना था। मुझे कुछ पैसे निकालने थे ताकि ट्रिप का अपना कंट्रीब्यूशन जाने से पहले दे दूँ और वापसी के खर्चे के लिए भी कुछ हो। कुलदीप भाई को भी इसी वास्ते पैसे चाहिये थे। हमने पहले एक ए टी एम खोजा और फिर पैसे निकाले। फिर बाइक पार्क की। रस्ते में हमे संदीप जी भी आते दिखे थे तो वो भी तब तक पार्किंग के जगह पे पहुँच गये थे। फिर हमने वो होटल खोजा जहाँ बाकी लोग दाल बाटी का लुत्फ़ उठा रहे थे। हम उधर पहुँचे और हमने भी भोजन किया।काफी मज़ा आया। दाल बाटी काफी  लाजवाब थी और साथ में जो लड्डू थे वो तो आहा आहा थे। मैंने क्या सबने एक-एक और मंगवाया।

दाल बाटी का इंतजार करते हुए - ठाकुर महेश जी,जीपी जी ,अल्मास जी और अमीर जी। उनके इलावा ठीक सामने दीपक भाई, शिव भाई और विद्याधर भाई आपसे में मंत्रणा करते हुए। (फोटो ठाकुर महेश जी ने दी। उनका धन्यवाद )


मैं आया तो बाइक में था लेकिन कुलदीप भाई को कोई काम था और शायद संदीप अग्रवाल उनके साथ जाना चाहते थे तो वो लोग बाइक में निकल गए।मैं शिव भाई, विद्याधर  भाई,राजीव सिंह जी, अमीर जी, गुरप्रीत जी और अन्य  के साथ होटल की तरफ बढ़ गया। रास्ते के बीच में अमीर जी और गुरप्रीत जी फोटो खिंचवाने के लिए रुक गए और हम होटल की तरफ बढ़ गये। होटल की तरफ जाते हुए मुझे एक खूबसूरत सा गेट और मंदिर दिखा था जिसकी फोटो मैंने खींच ली थी।


राजीव सिंह जी (लाल टी शर्ट) और शिव भाई भी फोटो की शोभा बढ़ाते हुए 



जब हम होटल पहुंचे तो मैंने विद्याधर भाई से ट्रिप के के कंट्रीब्यूशन के विषय में पुछा और अपना हिस्सा दिया। कुलदीप भाई भी तब तक आ गए थे तो उन्होंने भी अपना हिस्सा दिया और फिर होटल की  लॉबी की  तरफ बढ़ गए। अब अगला मुकाम एक चार्जर का पोर्ट ढूँढना था। फोन की जान जाने को थी। किस्मत अच्छी थी पोर्ट मिल गया और फोन को चार्ज पे लगा दिया।  कुछ देर में ही हमे इधर से जाना था लेकिन तब तक अगर थोडा भी फोन चार्ज हो जाता तो क्या बुरा था। वैसे भी मेरी ज़िन्दगी की फलसफा रहा है कि समथिंग इस फार बेटर देन नथिंग। अकसर हम कम है कम है सोचते रहते हैं और जो मिलता है उससे भी हाथ गंवा देते हैं। लेकिन मुझे ये बेवकूफाना लगता है। उदारहण के लिये कुछ लोग घूमने नहीं जाते क्योंकि उन्हें लम्बी छुट्टी नहीं मिलती लेकिन वो इसी चक्कर में वीकेंड भी बर्बाद कर देते हैं। या ट्रेक पे नहीं जाते क्योंकि लम्बी ट्रेक के लिए वक्त नहीं है। मेरा मानना है एक हफ्ते के लिए घूमने नहीं जा सकते तो क्या हुआ एक-दो दिन के लिए जाओ। अगर ३०-४० किलोमीटर की ट्रेक के लिए वक्त नहीं मिल पा रहा तो ६-७ किलोमीटर की करो। बातों का लब्बोलुबाब ये है कि मेक द बेस्ट आउट ऑफ़ व्हाट यू हैव गाॅट।

खैर, भावनाओं में बह गया था। 😜😜😜😜 वापिस सवेरा पैलेस की लॉबी में पहुँचते हैं। अभी हम गर्मी से आये थे और बैठे हुए थी कि कुलदीप भाई ने पूल में जाने का प्लान बनाया। मुझे तो जाना नहीं था लेकिन पुनीत भाई इसके लिए तैयार हो गए और वो दोनों पूल की तरफ निकल गए।अब तक काफी सारे लोग आ गए थे।अब हम निकलने को तैयार थे।  हमने अपना सामान गाड़ियों में भरना शुरू किया । जब तक सामान गाड़ियों में सेट होता  तब तक पूल वाले लोग भी वापस आ गये थे। अब हम होटल से निकलने को तैयार थे। सबने चेक किया कि कुछ रह तो नहीं गया है और सब गाड़ियों में बैठकर माउंट आबू से विदा लेकर चल दिए।

हम माउंट आबू से जा रहे थे लेकिन साथ में यादों का खजाना लेकर भी जा रहे थे।
क्रमशः
पूरी ट्रिप के लिंकस
माउंट आबू मीट #१: शुक्रवार का सफ़र
माउंट आबू मीट #२ : उदय पुर से होटल सवेरा तक
माउंट आबू  #3 (शनिवार): नक्की झील, टोड रोक और बोटिंग
माउंट आबू #4: सनसेट पॉइंट, वैली वाक
माउंट आबू मीट #5: रात की महफ़िल
माउंट आबू मीट #6 : अचलेश्वर महादेव मंदिर और आस पास के पॉइंट्स
माउंट आबू #7:गुरुशिखर
माउंट आबू मीट #8: दिलवाड़ा के मंदिर, होटल में वापसी,दाल बाटी  की पार्टी 

(#हिन्दी_ब्लॉगिंग: आज चिट्ठा जगत में घूमते हुए पता लगा कि आज का दिन अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉग दिवस के रूप में मनाने की सोची गयी है। ये ख़ुशी की बात है। आप लोग भी आज पोस्ट लिखकर इसमें योगदान दें। )