शनिवार, 22 जुलाई 2017

गुडगाँव से नॉएडा,नोएडा से रानी माजरा और वापसी : बाइक यात्रा

23 जून 2017 से  25 जून,2017
हरिद्वार लस्कर बाईपास पर कहीं 
कई दिनों से अश्विन भाई मुझे अपने गाँव आने का निमंत्रण दे रहे थे लेकिन कुछ न कुछ हो जाता था और योजना को रद्द करना पड़ जाता था। पिछले हफ्ते भी ऐसा ही हुआ था। उस वक्त उनका तो टिकट हो गया था लेकिन मेरा नहीं हुआ था। लेकिन फिर भी मैं जैसे तैसे जाने के पक्ष में लेकिन कुछ ऐसा हो गया कि हम जा न पाए और फिर अंत में रविवार को दिल्ली में ही भ्रमण किया। उंसके विषय में जानने के लिए इधर क्लिक करें।

अब 22 जून की बात है कि अश्विन  भाई का दोबारा व्हाट्सएप्प आया। उन्होंने कहा इस बार चलना है क्या? मैं तो राजी था। मैंने मन बना लिया था कि कहीं नहीं तो नीलकंठ महादेव तक की जंगल ट्रेक को अंजाम दे ही दूँगा। जब अश्विन भाई ने पूछा तो सोचा कि चलो बढ़िया है। शनिवार को उनके घर रुक लेंगे और रविवार को ऋषिकेष चल लेंगे। उनसे ये बात की तो वो भी इसके लिए राजी हो गये।

अब ये देखना था कि कैसे जाया जायेगा। अश्विन भाई से मैंने सब टिकट करने के लिए कहा। उन्होंने कोशिश की लेकिन कुछ भी नहीं बन पाया। फिर सोमवार को ईद थी  और इस वजह से हरिद्वार वाला रूट काफी बिजी रहने वाला था। अश्विन भाई ने खुद भी और अपने भाई  के द्वारा भी काफी कोशिश करवाई लेकिन कुछ नहीं हुआ। उन्होंने फोन पर मुझे बताया तो मैंने कहा कि क्या बाइक से जाया जा सकता है? मुझे मालूम था कि अश्विन भाई के पास बाइक थी। उन्होंने ये बात जँच गयी। लेकिन अभी भी इसमें परेशानी थी वो ये कि उनकी बाइक में ट्यूब वाले टायर थे जिनके पंक्चर होने की संभावना ज्यादा रहती है। अगर ऐसा हो जाता तो बीच में परेशानी उठानी पड़ती। इसलिए उन्होंने कहा कि वो ऐसी गाड़ी का इंतजाम करते हैं जिसमे ट्यूबलेस टायर्स हों।मैने कहा अश्विन भाई परेशानी की तो एक और बात है वो ये कि मुझे गाड़ी चलानी नहीं आती। उन्होंने दिलासा दिया कि इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी। फिर क्या था अब एक खाका तैयार हो चुका था। हमे उसी हिसाब से चलना था।  

मुझे शुक्रवार को सीधे अश्विन भाई के रूम पे जाना था जहां से हम शनिवार सुबह जल्द से जल्द निकल पड़ते। मैं खुश था चलो एक बाइक यात्रा तो होगी। कुछ देर बाद अश्विन भाई का दोबारा कॉल आ गया कि बाइक का इंतजाम हो गया है। अब बस शुक्रवार का इंतजार था जब यात्रा शुरू करनी थी।

शुक्रवार की सुबह मुझे शेव बनानी थी लेकिन मैंने इस काम को शाम तक के लिए मुल्तवी कर दिया था। मेरी योजना ये थी मैं अभी ऑफिस चले जाऊँगा और फिर उधर से आकर थोड़ी एक्सरसाइज करके और तब अश्विन भाई के घर के लिए निकलूँगा। मैं छः बजे करीब तक वैसे भी रूम में आ  ही जाता हूँ। मैंने जाने के लिए सारा सामान इकट्ठा कर लिया था तो पैकिंग की कोई टेंशन नहीं थी। 


मैं ऑफीस में था और दिन साधारण तरीके से ही बीत रहा था।चार बजने को थे और मैं अब कुछ घन्टों में ऑफिस से निकलने की सोच रहा था। मैं उठा वाशरूम की तरफ गया। जब वापस आया तो एक सहकर्मी ने बोला कि मेरे लिए मुम्बई ऑफीस से कॉल था। जिनका कॉल था उनका नाम मैं पहली बार सुन रहा था। मैंने उनसे कहा कि ये नहीं वो होंगी क्योंकि दोनों के नाम में काफी समानतायें थीं। दोनों नाम एक जैसे लगते थे। उन्होंने कहा हाँ शायद ऐसा हो। मैंने कहा ठीक है देखता हूँ।

मैं अपनी कुर्सी की तरफ गया।बैठा और कुर्सी को लैंडलाइन की तरफ घुमाया और रिसीवर उठाने ही जा रहा था  कि तभी जगजीत सिंह जी की मखमली आवाज में सरकती जाए रुख से नकाब आहिस्ता आहिस्ता बजने लगा। मैंने थोड़ी देर गाने का आनंद लिया और फिर नंबर को देखा। नंबर अंजान था लेकिन मुम्बई ऑफिस का ही कोई एक्सटेंशन था। एक बार तो मन किया कि उठाऊँ ही नहीं। मुझे फोन पे बात करना इतना सुहाता नहीं है। ये मेरे लिए जबरदस्ती का काम होता है। लेकिन फिर भी उठाया और बातचीत की। उधर से एक काम मिला। एक वेब पेज बनाना था और शुक्रवार को ही बनाना था। मैंने उनसे कहा कि ये संभव नहीं है लेकिन जितना हो सकता है उतनी कोशिश करूंगा। चार से ऊपर का वक्त हो चुका था और वेब पेज के कंटेंट और डिजाईन का कुछ अता पता नहीं था। मेरी ज़िन्दगी का ये भी फलसफा रहा है कि अगर कोई नामुमकिन काम भी मिले तो उसे जितना हो सकता है उतना करने की कोशिश तो कर ही लेनी चाहिए। अब मुझे उधर से आने वाले सामग्री का इतंजार करना था क्योंकि उसके बिना मैं काम शुरू नहीं कर सकता था।

पाँच बजे करीब मुझे मेल आया जिसमे सारे डिजाईन एलिमेंट्स थे जिसके हिसाब से वेब पेज बनाना था। इसमें भी दो हिस्से थे एक तो पेज बनाना और दूसरा जो उसमे डाटा डाले जा रहा था उसे सेव करना। मैंने ये बात उधर पहले ही बता दी कि मुझे कहीं जाना है तो मैं वेब पेज बना दूंगा और उसके बाद सोमवार को आकर डाटा सेव करने वाली प्रणाली पर काम करूंगा। वो मान तो नहीं रहे थे लेकिन किया क्या जा सकता था। गलती उन्ही की थी। अगर उन्हें वेब पेज चाहिए था तो सुबह से इतल्ला करनी थी। मैं अब अपने आप को भी कोस रहा था। मुझे शेव वगेरह करके सामान लेकर ही ऑफिस आ जाना चाहिए था। अगर ऐसा होता तो ऑफिस से ही मेट्रो पकड़ लेता। लेकिन अब मुझे पहले रूम में जाना था और फिर उधर से सामान उठाकर मेट्रो के लिए निकलना था। इस बिन बादल आई काम की बरसात ने मेरे घूमने की फसल को बर्बाद करने की आशंका मेरे मन में जगा दी थी। 

मैंने आश्विन भाई को इसकी बाबत बताया तो उन्होंने कहा टेंशन की कोई बात नहीं। तुम अगर बोटैनिकल गार्डन दस बजे से पहले पहुँच जाते हो तो बढिया  रहेगा क्योंकि उधर से परी चौक के लिए गाड़ी मिल जाएगी। दस बजे के बाद गाड़ी  मिलना मुश्किल होता है। यही बात मेरे ऑफिस के सहकर्मचारी चन्दन भाई ने भी मुझे बताई थी। उन्होंने तो ये तक कहा था कि वो इलाका दस के बाद खतरनाक हो जाता है और अगर मुझे देर हो जाये तो मुझे सुबह ही उधर जाना चाहिए। अब ऐसा होना मैं अफ्फोर्ड नहीं कर सकता था। 

मैंने सब कुछ किनारे रखा और वेब पेज बनाने में जुट गया। एक अच्छी बात ये थी कि एक ही पेज बनाना था और डिजाईन ज्यादा जटिल नहीं था।  मैंने लगभग एक डेढ़ घंटे में ही इसे बना दिया। इसके बाद इसमें अन्य बदलाव होने थे। ये काम पौने सात और सवा सात बजे तक चला।  अब मुझे रूम के लिए निकलना था तो मैंने उधर बोला कि बाकी का काम सोमवार को करूंगा और ऑफिस से निकल गया। 

जल्दी जल्दी कमरे पर  पहुँचा और जल्दी जल्दी कपडे बदले। सामान पैक तो था ही। अब शेव करने का वक्त नहीं था तो मैंने सामान उठाया और प्रशांत को बोलकर की मंडे को आऊंगा निकल गया। आठ बीस के करीब  मैं मेट्रो में था और चैन की सांस ले रहा था। अश्विन भाई ने ये सुनकर कहा कि अब तो आसानी से मुझे परी चौक से गाड़ी मिल जाएगी। अब मैं अपनी किताब के तरफ ध्यान दे सकता था। मैं अक्सर सफ़र में कोई न कोई किताब लेकर अवश्य चलता हूँ। इस बार मेरे हाथ में अर्नब रे की सुल्तान ऑफ़ डेल्ही थी।

शुरुआत में ही दो व्यक्ति दिल्ली की सर्द रात में किसी चीज का इतंजार कर रहे थे। मैं भी उनके साथ था। फिर ऐसा एक साजिश उजागर हुई और एक कत्ल हुआ। दोस्त ने दोस्त को धोखा दिया था और कथानक ने मुझे अपने आप से जकड़ दिया था।  ऐसे उपन्यास पढ़ते पढ़ते ही पहले राजीव चौक और फिर बोटैनिकल गार्डन आ गया। हाथ में किताब हो तो ऐसा सफ़र आसानी से कट जाता है। इसी दौरान अश्विन भाई ने खाने के विषय में पूछा तो मैंने कहा कि मुझे रोटियाँ पसंद नहीं है इसलिए थोडा चावल मिल जाए तो मैं उसी में खुश हूँ। उन्होंने कहा कि इतंजाम हो जायेगा। मैंने मंगल को कुछ आम लिए थे तो वो भी अपने साथ लेकर जा रहा था। आम और दाल चावल। रात्री भोज में ऐसे खाना मिल जाये तो बात ही क्या थी।

साढ़े नौ के करीब मैं बोटैनिकल गार्डन में था। मैंने अपने आप को शाबाशी दी क्योंकि मैं निर्धारित वक्त से काफी पहले पहुँच चुका था। दस बजने में आधा घंटा था। अब मुझे तलाश थी एग्जिट गेट की। मैंने अश्विन भाई से पूछा तो उन्होंने कहा कि उधर एक ही गेट है जिधर से लोग निकल रहे होंगे तो मैं भी उनके साथ हो लूँ। इसके बाद में उन्होंने हिदयात दी कि मैं बस पकडूँ तो पीली वाली पकडूँ क्योंकि वो सरकारी थी। मैंने कहा आपकी आज्ञा का पालन होगा और ऐसी बस की खोज करने लगा। बस सामने ही दिख गयी और मैं उस पर बैठ गया। समय था नौ बजकर इकतालीस मिनट। मैंने अश्विन भाई को बोला तो उन्होंने कहा योगी आदित्यनाथ को शुक्रियादा करो क्योंकि उन्होंने ही बस चलवाई है।   मैंने कहा इस बस के चलने से ऑटो वाले तो रोते होंगे। तो अश्विन भाई ने कहा कि वो तो जाते ही नहीं है उधर। हाँ, उबर और ओला वाले जरूर रोते होंगे। ये भी सही बात थी। 

मैंने सोचा कि अब तो मैं जल्दी ही परी चौक पहुँच जाऊँगा लेकिन मैं गलत था। मुझे लग रहा था कि परी चौक नजदीक ही होगा लेकिन जब कंडक्टर साहब ने किराये के रूप में २५ रूपये मांगे तो पता लग गया कि अभी कम से कम आधे घंटे का सफ़र तो है ही। बस में इतनी रौशनी भी नहीं थी कि किताब पढ़ सकूँ। मैंने अश्विन भाई से इस बाबत पुछा तो उन्होंने कहा कि जगह तो दूर है इसलिए तो रात को कोई ऑटो उधर नहीं जाता। मैं अब आराम से बैठ गया और बाहर और भीतर के दृश्य को देखने लगा। मेरे बगल में दो व्यक्ति आकर बैठ गये। उनमे से एक ने शायद थोड़ी पी रखी थी। छोटे लड़के ही लग रहे थे वो। सफ़र चलता रहा। अश्विन भाई भी कॉल करके पूछते रहे कि मैं किधर किधर था। परी चौक आने से काफी देर पहले ही मेरे बगल में बैठे लड़कों में से एक  गेट पे जाकर खड़ा हो गया। जब ही स्टॉप आता तो ड्राईवर उससे पूछता कि उतरना है तो वो मना कर देता। वो कहता रहता कि थोड़ी आगे  उतरना है। उसका थोड़ा आगे पता नहीं कब आता। और फिर न जाने क्या हुआ कि ड्राईवर और कंडक्टर थोडा उसके ऊपर भड़क गये। उन्होंने कहा कि परी चौक से पहले कहीं बस नहीं रुकेगी। अब बहस होने लगी। मैंने उसके साथी को उसे सँभालने के लिए कहा लेकिन उसने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। ऐसे ही बहसबाजी-चिल्लम चिल्ली में परी चौक आ गया। वो लड़का बस से उतरकर ड्राईवर कंडक्टर दोनों को अपशब्द बोलने लग गया कि अब उसे वापस एक दो किलोमीटर जाना पड़ेगा और उस सफ़र के पैसे क्या वो देंगे ?  मैंने एक बार कंडक्टर से कन्फर्म किया कि ये ही परीचौक है तो उन्होंने कहा हाँ। उनकी बहस अभी भी जारी थी। मैं उतर गया। बस ने यात्री उतारे और आगे बढ़ गयी। वो लड़का तब भी कंडक्टर और ड्राइवर को गरियाता रहा।

मैंने  अश्विन भाई को  कॉल लगाया और कहा कि मैं परी चौक पहुँच गया हूँ। उन्होंने मुझे कुछ दिशा निर्देश दिए और करीब साढ़े दस बजे वो मुझे बाइक में आते दिखे। हम मिले और हेल्लो हाई हुई। 

जहाँ मैं रहता हूँ उधर घोड़ा चौक है। उसका नाम वैसे तो महाराणा प्रताप चौक है लेकिन अगर ये नाम किसी से लो तो काफी लोग बता नहीं पाते कि किस विषय में बातचीत हो रही है। उन्हें घोड़ा दिखता है लेकिन उसके ऊपर कौन बैठा है इससे कोई मतलब नहीं होता और इस कारण वो घोड़ा चौक के नाम से मशहूर हो गया है। मुझे लगा परी चौक की भी ऐसी ही कोई कहानी होगी। मैंने अश्विन भाई से इस बात पूछा तो उन्होंने कहा कि हाँ इधर एक चौक पर परी की मूर्तियाँ है तो इसलिए इसे परी चौक कहा जाता है।
 मैं: फोटो खींचने को मिलेगी। 
अश्विन भाई: रात को ठीक नहीं आएगी तुम गूगल से ले लो। 
मैं : गूगल में वो बात नहीं जो अपनी खींची तस्वीर में है 
अश्विन भाई : देखते हैं 
मैं : अभी किधर
अश्विन भाई: दोस्त से बाइक लेनी है और फिर उसमे पेट्रोल डलवाना है। 

हम लोग अश्विन भाई के दोस्त के पास गये। उधर अश्विन भाई की बाइक छोड़ी और उसकी बाइक उठाई। फिर दुबारा परी चौक की तरफ आते हुए पेट्रोल पम्प तक आये। उधर पेट्रोल  भरवाया और अब अश्विन भाई के रूम की तरफ चल निकले। इसी दौरान अश्विन भाई ने बताया कि कैसे उनका दिन भी व्यस्त था और दौड़ भाग हो रही थी। आज दोनों की ही लगी थी। ऐसे ही अपने दिन के हाल सुनाते सुनाते उनका रूम आ गया। जब मैं रूम में पहुँचा तो मुझे याद आया कि परी चौक की फोटो निकालना तो भूल ही गया। मैंने सोचा अब अश्विन भाई की सलाह ही माननी पड़ेगी। गूगल बाबा से ही परीचौक की तस्वीर उधार लेनी होगी। 
परी चौक: स्रोत
अब हम अश्विन भाई के रूम में थे। उधर उनका रूम मेट डिनर लेकर आ गया था। हमने नहाना धोना किया। सुबह हमे जल्दी जाना था तो नहाने का वक्त नहीं मिल सकता था। इसलिए शाम को नहाना ही बेहतर था। मैं नहाकर बाहर आया। अश्विन भाई के रूम के बाहर बरामदा है जिस पर हमने कूलर लगाया और उधर ही खाने और सोने का प्लान बनाया। ये मुझे जचा। काफी दिनों से मैं खुले आसमान के नीचे नहीं सोया था। चटाई वगेरह बिछाई गयी। एक खाट भी थी जिस पर मुझे सोने को कहा गया लेकिन मैंने मना कर दिया। बहुत दिनों बाद नीचे सोने को मिला तो ऐसा अवसर मैं छोड़ना नहीं चाहता था। पी जी में रहते हुए बेड पर सोना पड़ता है जो मुझे पसंद नहीं। जब अकेले रहता था तो हमेशा जमीन पर ही सोता था। पता नहीं क्यों लेकिन उसमे मुझे ज्यादा सुकून मिलता है।  फिर कूलर लगाया गया और फिर डिनर हुआ। उसके बाद मैंने चाय बनाई और फिर हमने बैठकर थोडा गप्पे मारी। सुबह चूँकि जल्दी उठाना था तो मैंने चाय निपटाई और हम लोग सो गये। दिन भर की थकान और दौड़ भाग से नींद कब आई पता ही नहीं लगा। 
सोने का बढ़िया इंतजाम। कूलर की ठंडी हवा ने रात भर बहुत आराम दिया। 

सवा चार के करीब सुबह नींद खुली तो मैंने देखा अश्विन भाई रेडी हो गये थे। मैंने उन्हें कहा मुझे भी उठा देते तो उन्होंने कहा कि उठाने ही वाला था। वैसे तो हमारा प्लान तीन बजे निकलने का था लेकिन चूँकि पूरे दिन की थकान थी और रात को देर से ही सोये थे तो देर में ही नींद खुली। मैं भी उठकर तैयार हुआ। साथ वाला भाई सो रहा था। हमने अपने सामान बांधे और हम नीचे आ गये। 
जाने से पहले सुरक्षा जांच करते राइडर साहब 

अश्विन भाई ने बाइक चेक की और सब कुछ ठीक जानकर हम अपने सफ़र पर निकल पड़े। हमे दो सौ किलोमीटर से ऊपर का सफ़र तय करना था।  पाँच बज गये थे। हम निर्धारित समय से दो घंटे बाद निकल रहे थे। अश्विन भाई ने कहा कि बस अब ट्रैफिक न मिले तो बढ़िया रहेगा।

आधे घंटे के करीब बाइक चलाने के बाद अश्विन भाई ने मुझे कहा कि मैं मैप खोल लूँ लेकिन मेरे फोन का नेट जरूरत पढने पर दुबक जाता है और यही हुआ। फिर अश्विन भाई ने अपना जिओ दिया और उसपे हमने अपनी डेस्टिनेशन हरिद्वार डाली। हमें नीली सड़क दिखने लगी और उसके हिसाब से अपनी मंजिल की तरफ बढ़ने लगे। मौसम अभी अच्छा था और वातावरण में हल्की ठंड थी। सूरज जाग तो गया था लेकिन अपने पूरे जलाल पर नहीं था। हम ये उम्मीद कर रहे थे कि उसके जागने से पहले हम अपने मंजिल के करीब होंगे। 

करीब दो ढाई घंटे तक हम ऐसे ही सफ़र करते रहे। गूगल जहाँ मुड़ने को कहता उधर मुड़ते, जहाँ सीधा जाने को कहता सीधा जाते। रास्ते में एक बाइक गिरी हुई दिखी। उसमे दो आदमी और एक औरत जा रहे थे। वो किनारे खड़े थे और बाकी लोग उनकी मदद कर रहे थे। किसी को चोट आई हो ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा है। हम उधर रूककर भीड़ का हिस्सा नहीं बनना थे इसलिए सीधे ही आगे निकल गये।   हम चले जा रहे थे और रास्ते पीछे छूटते जा रहे थे।

अश्विन भाई ने कहा कि अलकनंदा रेस्टोरेंट  पर जाकर हम नाश्ते के लिए रुकेंगे। वैसे भी सफ़र में मैं काफी हल्का खाना पसंद करता हूँ। मुझे नाश्ते से ज्यादा चाय की दरकार थी क्योंकि कल के खाने के बाद  से मेरे सिस्टम में चाय की एक बूँद भी नहीं गयी थी। मैं चाय के ख्वाब देखने लगा और करीब सवा सात बजे तक हम अपनी मंजिल अलकनंदा रेस्टोरेंट तक पहुंचे। अब तक हम तकरीबन 130 किलोमीटर चल गये थे और ये अच्छा औसत था। यानी आधी यात्रा हो चुकी थी। हम रेस्टोरेंट में दाखिल हुये। थोडा लघु शंका वगेरह निपटाई, मुँह पे पानी वगेरह मारा और फिर बैठ गये। हमने चाय  मंगवाई और एक एक पराठा भी मंगवाया। जब तक वो आया तब तक अश्विन भाई रेस्टोरेंट की डिटेल्स गूगल में फीड करने लगे। आजकल वो गूगल के लोकल गाइड बने हुए हैं। चीजों की इन्फो डालते रहते हैं और पॉइंट्स कमाते रहते हैं। इधर भी उन्होंने इनफार्मेशन अपडेट की। जब तक वो ये कर रहे थे तब तक नाश्ता भी आ गया। हमने नाश्ता किया और मैंने एक बार की चाय और मंगवाई। पता नहीं अब अगले दो तीन घंटे तक चाय मिलती या नहीं। तब तक का कोटा पूरा कर लेना चाहता था मैं। चाय के अच्छी बने होने ने भी मुझे एक और बार पीने के लिए प्रेरित किया। हमने चाय निपटाई और फिर आगे के लिए निकल पड़े। 

नाश्ता, चाय और अश्विन भाई की मासूम मुस्कान। ये ख़ुशी गूगल से पॉइंट्स पाने की है। 
हम आगे बढ़ चले। गूगल हमे सीधा हाईवे का रास्ता दिखा रहा था लेकिन अश्विन भाई के बताया कि हमे अब हाईवे पे नहीं बने रहना था। हमे पुरकाजी लस्कर हरिद्वार बाईपास निकलना था। लस्कर हरिद्वार रोड पर ही अश्विन भाई का गाँव था। यही हमारी मंजिल थी। हमने गूगल में नया गंतव्य स्थान फीड किया और उधर की ओर बढ़ चले।

हमे एक जगह मुड़ना था लेकिन हम आगे की ओर आ गये। थोड़ी देर कनफूजन रहा लेकिन फिर एक दो जगह पूछा और सही जगह की तरफ बढ़ गये। जब हम पुरकाजी बाईपास पे आ गये तो अश्विन भाई रस्ते से वाकिफ थे। अब हम अपनी मंजिल की ओर चले जा रहे थे। अब गूगल की मदद की हमे जरूरत नहीं थी। करीब नौ बजे के करीब मैंने अश्विन भाई को रुकने के लिए कहा। बाइक में बैठे बैठे मेरी कमर थोडा दर्द कर रही थी और जीन्स भी परेशान कर रही थी। सामने खेत खलियान थे तो मैं उनकी फोटो भी खींचना चाहता था। उन्होंने मेरी हालत में दया कि और गाड़ी रोक दी। करीब दो तीन मिनट हम रुके और उसके बाद नौ बजे के करीब फिर से चल दिए। 

सड़क के किनारे खेत 
अब वैसे भी एक घंटे का रास्ता रह गया था। हम लक्सर होकर गुजरे। उधर कई कम्पनीज थी जैसे जे के टायर्स,रामदेव पतंजलि,एंकर, श्री सीमेंट  जिनके विषय में अश्विन भाई ने मुझे बताया। ये भी बताया कि इस कारण उधर ट्रैफिक बढ़ गया है और चूँकि रोड चौड़ी नहीं है तो दुर्घटनायें होती रहती हैं। हम आगे बढ़ते रहे। इधर की खासियत यही थी लोग बाग़ कैसे भी गाड़ी चला लेते थे। एक भाई ने तो बिना इंडिकेटर दिए गाड़ी मोड़ ली थी। हम उससे टकराने वाले थे। ऐसे में उससे थोड़ी बहस हुई। अश्विन भाई भी उस पर थोड़ा गुस्सा हुए। मैंने उन्हें शांत होने को कहा। उन्होंने कहा इधर ऐसे ही होता। लोग बाग़ कैसे भी कुछ भी किधर भी मोड़ देते हैं। ऐसे में खुद की गलती तो मानते नहीं। यही वो भी आदमी भी कर रहा था और इसलिए उन्हें गुस्सा आ गया था।

 अब हम उनके गाँव के नजदीक पहुँच गये थे। उन्होंने मुझे अपना स्कूल भी दिखाया जो उनके गाँव से दो किलोमीटर पहले पढता था। उन्होने बताया कि वो अक्सर इधर पैदल ही आते थे। फिर उन्हें साइकिल मिल गयी तो उससे आने लगे।ऐसे ही वो आस पास की चीजों के विषय में बता रहे थे। फिर थोड़ी ही देर में हम उनके घर के आगे थे। वक्त रहा होगा दस के करीब।  अगर हम बस से आते तो शुक्रवार की रात को सात बजे करीब चले होते और इधर आठ बजे पहुंचे होते। अभी हम सुबह पाँच बजे चले थे और पाँच घंटे में ही पहुँच गये थे। हमे काफी फायदा हुआ था। इस बात ने मुझे भी बाइक चलाना सीखने के लिए प्रेरित किया। अब जल्द ही चलाना सीखूँगा। 

हम अन्दर दाखिल हुए। सबसे मिले। अश्विन भाई के जो भाई थे वो इंटरव्यू के सिलसिले में गुडगाँव गये हुए थे। वो गुडगाँव पहुँच गये थे और उन्होंने इंटरव्यू देकर वापस आना था। वो बस से आने वाले थे तो हमे चिंता थी कि ट्रैफिक में न फंस जाए और आख़िरकार हुआ भी यही था। ट्रैफिक में फंसने के कारण वो काफी देर से घर पहुंचे थे। 

हमने हाथ पाँव धोया। चाय पानी पिया और फ्रेश हुये। उसके बाद नहाये और फिर ग्यारह बजे के करीब हम खेतों की ओर चले गये। मैं कई दिनों बाद खेतों में जा रहा था। जब छोटे में गाँव में जाता था तो उधर खेतों में जाता था लेकिन वो पहाड़ी खेत थे। ये प्लेन्स के थे। हमारे खेतों में ज्यादातर फलों के पेड़ होते थे और इधर मक्के,धान  लगे हुए थे। हमने खेतों में थोड़ा वक्त बिताया।

थोड़ी देर खेत पर बिताने के बाद अश्विन भाई मुझे ऐसी जगह ले गये जहाँ कभी गाँव बसा करते थे। उधर कभी  दो गाँव होते थे जिनके नाम  हरदेवपुर और सहदेवपुर थे। लेकिन बाढ़ के कारण गाँव शिफ्ट करने पड़े और नया गाँव रानी माजरा बसाया गया था। उन्होने बताया कि जब वो छोटे थे तो इस जगह आकर जमीन में दबे मिटटी के बरतन के हिस्से ढूंढते थे जो कि इतने सालों बाद मजबूत रहते थे। मैंने कहा ये बात तो सही है। हमारे गाँव के मिटटी के घर इतने सालों  की उपेक्षा के बाद अब टूटने शुरू हुए। अगर उनकी केयर होती तो वो ठीक रहते और ऊपर से मौसम के अनुरूप रहते। मैंने ऐसे घरो के विषय में सुना था जो शायद मिटटी से बनते थे और सर्दी में गर्म और गर्मी में ठंडे रहते थे।  

बाढ़  के विषय में बात चली तो मैंने कहा कि इस विषय में अनुपम मिश्र जी की किताब आज भी खरे हैं तालाब उन्हें पढनी चाहिए। काफी अच्छी किताब है। मूलतः किताब जल संगरक्षण के ऊपर है। कहते हैं पहले हमारे पास इतने तालाब होते थे कि बारिश का पानी इकट्ठा हो जाता था। चूँकि अब उन जगहों पर बिल्डिंग बना दी गयी थी तो उस पानी के लिए कोई जगह नहीं बची है और नतीजा बाढ़ के रूप में दिखता है। उन्होंने कहा ये बात तो सही है। उन्होंने फिर उधर हो रहे खनन के विषय में बताया कि उससे भी बाढ़ आने की संभावना होती है क्योंकि ये खनन गाँव की सीमा के नज़दीक ही हो रहा है जिससे पानी के ठहरने के लिए कुछ बचता ही नहीं। इंसानी लालच का नतीजा इंसानों को ही भुगतना पड़ता है। इसी विषय पर मुझे एक कहानी याद आ गयी। 

ये कहानी मैंने छोटे में पढ़ी थी स्कूल की अंग्रेजी पुस्तक में थी। उस कहानी के अनुसार पहले इन्सानों को खाना उगाने की जरूरत नहीं पडती थी। आसामान इतना नजदीक होता था कि उसके टुकड़े तोड़कर ही पेट भर लिया करते थे। लेकिन फिर जैसे वक्त बदला इन्सान का लालच बढ़ता गया। वो जरूरत से ज्यादा टुकडा लेता और जब उसका उपयोग न कर पाता तो उसे फेंक देता। आसमान ने जब अपनी बर्बादी होते देखी तो रुष्ट हो गया और इंसान की पहुँच से बहुत दूर चला गया।  अब इन्सानों को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने माफी माँगी। आसमान ने नीचे आने से मना कर दिया लेकिन कहा कि वो बारिश करेगा ताकि आदमी अपना भोजन खुद उगा सकें। कहानी ऐसी ही कुछ थी। अब तो मुझे इतना याद नहीं लेकिन ये इंसानी फितरत को सही तरीके से दर्शाती है। मैंने ये कहानी भी अश्विन भाई को सुनाई। बातों के दौरान ऐसे कहानी सुनाना मुझे अच्छा लगता है। इसके बाद खेतों की बातें हुई और फसलों के चुनाव के विषय में भी अश्विन भाई ने बताया कि किस तरह किसान को सब कुछ देखकर फसल का चुनाव करना चाहिए। कैसे प्लानिंग होनी चाहिए जिससे आपके फसल ऐसे वक्त पर उपलब्ध हो जब उसका सबसे अच्छा दाम आपको मिल सके। उनकी ये बातें मुझे काफी रोचक लगीं। 
खेत में उगी फसल 

एक पगडण्डी जो विभिन्न खेतों मो जोडती थी 

 ट्यूब वेल का कार्य इधर चल रहा था 

इधर कभी नदी बहती थी. बरसात में पानी इधर भर जाता है.

इधर कभी गाँव हुआ करते थे. अब जमीन में कुछ अवशेष ही बचे हैं 

हाल में ही बोई गयी फसल. ये कुछ ही महीनों में तैयार होगी

यही बाते करते हुए हम खेतों से निकले और नदी के तट पर गये। उधर बाइक को एक जगह पर खड़ा किया और नदी किनारे गये। उधर पहले से ही कई बच्चे खेल कूद रहे थे। कुछ अपनी भैंसों को लेकर आये थे और उन्हें उधर ले जा रहे थे। हमने भी उधर हाथ मुँह धोया। चर्चा जारी थी जो थोडा चर्चा रामायण महाभारत के ऊपर चली गयी । अश्विन भाई ने बताया कि कैसे इन ग्रंथों में चीजें जोड़ी गयी और इन्हें दैविक रूप दिया गया वरना पहले ये कहानी आम इंसानों की थी जिन्होंने वो कर दिखाया जो खाली देवों द्वारा संभव माना जा सकता था। मैने कहा इस बात से मैं सहमत हो सकता हूँ। लेकिन जो नाटकों ने इसमें फंतासी का तडका लगाया है वो हास्यापद लगता है। ऐसे ही चर्चा थोड़ी देर चली  और हम पानी का आनंद लेते रहे। लोगों को देखकर हमारा भी नहाने का मन कर रहा था लेकिन कपडे उपलब्ध न होने के कारण अपना मन मारना पड़ा।  उधर हमने  थोडा वक्त और बिताया और  वापस आ गये। लंच का वक्त भी हो रहा था।  
नदी में नहाते बच्चे 

घास चरती भैंस 

पानी से हाथ मुँह धोकर गर्मी दूर भगाते अश्विन भाई 
 हमारा दिन ऐसे ही बीता। घर के कुछ काम किये। लंच किया और थोडा आराम किया। मैं उठा तो अश्विन भाई कबके जग गये थे और काम में व्यस्त थे। घर आओ तो काम हो ही जाता है। फिर हम  मार्किट गये।  उधर उन्होंने कुछ सामान लेना था जिसे लेने जाना था। मैं भी उनके साथ बाइक पे हो लिया।हमने सामान लिया और वापस आये।

अगले दिन मुझे ऋषिकेश में नीलकंठ महादेव जाना था। शाम को मैंने इस बाबत बात की तो अश्विन भाई ने कहा कि अगले दिन यानी रविवार को उनके घर में भोज आयोजित था। क्योंकि उनके भाई लखन की लड़की हुई थी और उस उपलक्ष में इसका आयोजन हो रहा था जिसमे गाँव वाले सभी निमंत्रित थे। ऐसे में उधर नहीं जाया जा सकता था। ये सही बात थी और हमने उधर का प्लान कैंसिल कर दिया। अब कल तो कहीं जाना नहीं था तो रात को थोड़ी देर तक गाँव में ही घूमते रहे। उधर ही अश्विन भाई के पडोसी मिले जो हमारी हम उम्र थे तो थोड़े देर उनके घर में बैठे। फिर ऐसे ही टहलने लगे। अश्विन भाई के गाँव की बात करूँ तो दिखने में वो कुछ अलग नहीं था। जब गाँव के विषय में हम सोचते हैं तो मिटटी के घर ही मन में आते हैं लेकिन अब तो हर जगह सीमेंट के घर हैं। हमारे गाँव में अभी भी ट्रेडिशनल पहाड़ी घर दिख जाते हैं लेकिन नये घर जो बन रहे हैं वो सीमेंट के ही हैं। बस क्योंकि लोग बाग़ घर के बाहर बैठकर बतिया रहे थे तो गाँव वाली फीलिंग आ रही थी। शहरों में ऐसा होना कम ही होता है। अब जबसे फ्लैट्स का चलन चला है तब तो और हम हो गया है। जब तक खाने का वक्त नहीं हुआ तब तक हम ऐसे ही घूमते रहे और शांत माहोल का आनंद लेते रहे।  जब खाने का वक्त हुआ तो घर में गये और खाना खाया।  

अब सोने का वक्त हो चुका था। हमने रात को बाहर सोने का प्लान बनाया। खाट बिछाई गयी। एक पंखा लगवाया गया और अब हम सोने को तत्पर थे। मुझे नींद आ गयी लेकिन जब नींद खुली तो देखा अश्विन भाई अपनी खाट पे नहीं थे और पंखा बंद था।  छत से उनकी आवाज आ रही थी।  मैं उधर गया तो पता लगा लाइट गुल थी और वो फोन पर उसके न होने की शिकायत दर्ज करवा रहे थे। वो खत्म हुआ तो उन्होंने कहा कि कॉल सेण्टर में जिसने फोन उठाया था वो ऐसे ही बंडल मार रहा था कि लाइट एक पेड़ के गिरने के कारण नहीं थी। ऐसी गर्मी में जब हवा का नामो निशान नहीं था तब कोई पेड़ गिर सकता है भला। बात तो अश्विन भाई की सही थी। वैसे भी उसने कुछ न कुछ कहना था तो यही बहाना उसने अश्विन भाई को चेप दिया।  थोड़ी देर लाइट का इतंजार किया और फिर अन्दर चले गये। जब लाइट आई तो बाहर आकर दुबारा सो गये। अब नींद सुबह के उजाले के कारण खुली। रविवार आ चुका था और मुझे आज ही वापस लौटना था। 

सुबह पूजा होनी थी जिसके तैयारी के लिए हम पहले मार्किट में जाकर सामान लाये थे।  जब मार्किट जा रहे थे तो अश्विन भाई ने कहा कि वो भी आज मेरे साथ ही चल लेंगे कोई बाइक में अकेले जाना उन्हें अच्छा नहीं लगेगा। मेरी मंडे को छुट्टी नहीं थी इसलिए मुझे तो रविवार को जाना ही था। अश्विन भाई साथ हो गये थे तो और क्या चाहिए था। मार्किट जाते हुए ही मेरे मन में एक सवाल जागा कि गाँव का नाम रानी माजरा क्यों रखा है तो उन्होंने इससे जुड़ा किस्सा सुनाया। उन्होंने कहा ये तो नहीं पता लेकिन ये, गाँव फिर चाहे वो शाही शाषन हो या ब्रिटिश शाषन, अपना लगान एक अखाड़े को ही देता था। इस अखाड़े का नाम श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वानी है। ये बात मेरे लिए रोचक थी। 

हम वापस आये तो तब तक हवन की तैयारी चलने लगी थी। सब कुछ व्यवस्थित हो गया था।  हवन समाप्त हुआ। फिर दिन तक भोज समाप्त हुआ। मैंने भी इसमें गाँव वालों के साथ बैठकर खाया। फिर हमने थोडा आराम किया। फिर एक बार की चाय हुई और  उसके कुछ देर बाद ही हम भी वापस नॉएडा के लिए निकल पड़े। 

निकलने के कुछ देर बाद ही एक टायर में हवा कम लगी तो उसे मार्किट में भरवाया। इसके बाद आगे बढ़ चले। हम दिन के वक्त निकले थे तो  गर्मी काफी थी और हम पसीने से हम लतपथ हो गये थे। गर्मी से परेशानी हुई बाकी यात्रा साधारण तौर पर गुजरी। बीच बीच में ट्रैफिक ने भी थोड़ा परेशान किया। ट्रैफिक के कारण ही अश्विन भाई ने कहा कि वो मुझे ऐसी जगह छोड़ देंगे जहाँ से मुझे मेट्रो मिल जायेगा और इससे मैं जल्दी पहुँच जाऊँगा। अगर दिल्ली वाले रास्ते से जायेंगे तो काफी देर हो जाएगी क्योंकि हम ट्रैफिक में फंस जायेंगे। मुझे ट्रैफिक में फंसना नहीं था तो हमने इसी योजना पे काम किया।

अश्विन भाई ने नॉएडा में मुझे एक जगह छोड़ा जहाँ से मुझे नॉएडा सिटी सेण्टर के लिए ऑटो मिल जाता। उससे पहले हम कुछ पीना चाहते थे। मैं चाय और अश्विन भाई कोल्ड ड्रिंक लेकिन अभी पियेंगे अभी पियेंगे सोचते सोचते ही ये जगह आ गयी थी। अब रुकने का कोई तात्पर्य नहीं था तो मैंने एक ऑटो देखा। वो नॉएडा सिटी सेण्टर जा रहा था तो मैं  उसमे बैठ गया। मैंने अश्विन भाई से विदा ली और हम अपने अपने स्थानों के लिए निकल पड़े।

ऑटो ने बीस रूपये में मेट्रो के गेट पर छोड़ा। मैं मेट्रो में बैठा और राजीव चौक के लिए मेट्रो पकड़ी। चूँकि मैं शुरुआत से चल रहा था तो मुझे सीट भी मिल गयी थी। मैंने अपना उपन्यास खोल दिया और पढने लगा। जब अश्विन भाई के घर था तो उधर भी वक्त बेवक्त कुछ पृष्ठ पढ़ डालता था। उपन्यास मजेदार था और मैं इसे जल्द से जल्द पढना चाहता था।  जब राजीव चौक आया तो मैंने येलो लाइन पकडनी थी। मैं उतरा और हुडा के लिए गाड़ी पकड़ ली। गाड़ी में बैठकर जब अपने फोन की कम होती बैटरी देखी तो याद आया कि चार्जर तो अश्विन भाई के पास रह गया। फिर देखा उनका कॉल भी आया था। व्हाट्सएप्प किया और पूछा तो पता लगा उन्हें भी तभी ध्यान आया था। मैंने उनसे कहा कि चार्जर अब अगली बार मिलेंगे तो ले लूँगा। अब मेट्रो में अपने उपन्यास सुल्तान ऑफ़  डेल्ही को पढने लगा। ऐसे ही मेट्रो का सफ़र भी समाप्त हुआ। 

पौने दस बजे करीब मैं अपने रूम में था और इस बात से मैंने अश्विन भाई को अवगत करवाया। दिन भर के बाइक के सफ़र के दौरान मैंने चाय एक आध बार ही पी थी इसलिए चाय पीने को मेरा मन तड़प रहा था। मैंने चाय चूल्हे पर चढ़ाई और नहाने चल दिया। शुक्रवार को हुआ ये सफ़र रविवार को खत्म हुआ था। एक बेहतरीन अनुभव था जो अश्विन भाई के साथ और बेहतरीन हो गया था। मुझे तो इस सफ़र में बड़ा मज़ा आया। आपको कैसा लगा बताना नहीं भूलियेगा। 

                                                                       **** समाप्त ****

5 टिप्‍पणियां:

  1. परंपरागत गाव की बेहतरीन घुमक्कडी

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. जी सही कहा। गाँव का माहौल बहुत अच्छा था। शुक्रिया।

      हटाएं
  2. परी चौक वाली घटना मेरे साथ भी हुई थी,
    बाटनिकल गार्डन से जब परि चौक के लिये बैठे तो कंडक्टर ने तीन बंदो के 81 रु लिये तो समझ आया कि परी चौक बाजू वाली कालोनी में नहीं है। बहुत देर बात आया, चालक को तब तक चार बार टोक दिया था कि आगे मत छोड देना।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. जी मैं भी जब किसी अंजान रास्ते पे जाता हूँ तो मन में ये भय तो रहता ही है कि कहीं जहाँ जाना है उससे आगे न निकल जाऊँ।
      ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया।

      हटाएं

आपकी टिपण्णियाँ मुझे और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करेंगी इसलिए हो सके तो पोस्ट के ऊपर अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।