सोमवार, 21 अगस्त 2017

कानपूर मीट #4

शनिवार 8 जुलाई 2017

इस यात्रा संस्मरण को शुरुआत से पढने के लिए इधर क्लिक करें।

नाना राव पेशवा पार्क के सामने सभी लोग। बायें से अंकुर भाई,अल्मास भाई, राजीव जी ,राघव जी, भारती जी ,पुनीत भाई ,नवल जी और योगी भाई 

एक चालीस का वक्त हो गया था और अब हम घाट घूम चुके थे। इस विषय में आप पिछली कड़ी में पढ़ चुके हैं। अगर आपने नहीं पढ़ा है तो आप इधर जाकर पढ़ सकते हैं। हम लोग गाड़ी में बैठ गये थे और अब दूसरे स्थलों पर जाने की तैयारी थी।

जब पुनीत भैया से पुछा कि अगला पड़ाव कौन सा होगा तो उन्होंने कहा एक साईं मंदिर है, सुधांशु महाराज का आश्रम है और आखिर में गंगा बैराज घूमेंगे। मैं घूमने के लिए निकलता हूँ तो मंदिर अक्सर कम ही जाता हूँ। अगर मंदिर की वास्तुकला में कुछ विशिष्ट बात हो तो देख आता हूँ वरना अगर मंदिर साधारण है तो मुझे उसे देखने की इतनी उत्सुकता नहीं रहती है। सुधांशु महाराज के आश्रम के प्रति भी मैं मन में उत्सुकता नहीं जगा पा रहा था। हाँ, गंगा बैराज देखने की उत्सुकता मन में थी। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि मैंने 'गैराज' तो सुना था लेकिन बैराज शब्द से पहली बार रूबरू हुआ था। क्या होता होगा ये बैराज? ये प्रश्न मन में उठ रहा था लेकिन मैंने सोचा था कि जब देखेंगे तो पता चल ही जायेगा। क्योंकि गंगा बैराज था तो पानी तो होगा ही इस बात की मुझे पूरी उम्मीद थी।

हमारी गाड़ी घाट से निकल रही थी और मुख्य सड़क की तरफ आ रही थी कि पुनीत भाई ने बोला कि इधर एक किला भी है। किला का नाम सुनकर मेरे कान खड़े हो गये। मैंने पुनीत भाई को कहा कि किला तो देखना बनता है। अल्मास भाई ने एक बार कहा कि छोड़ो किला क्या देखना लेकिन बाकी लोग भी अब किले को देखने को उत्सुक थे। और ये बात सही भी थी कि क्योंकि जब आये थे तो होटल में बैठने तो नहीं आये थे और फिर एक दो जगह घूमने में क्या दिक्कत थी। ऊपर से मेरे मन में ये भी विचार आ रहा था कि अगर ज्यादा देर हुई तो मंदिर और आश्रम जाने की योजना को कैंसिल किया जा सकता है। हमारी गाड़ी आगे बढ़ गयी थी। हमको किले की ओर जाने के लिए गाड़ी वापस मोड़नी थी। सड़क संकरी थी तो ड्राईवर साहब ने गाड़ी थोड़े आगे बढ़ाई और एक जगह रास्ता देखकर गाड़ी मोड़ ली और किले की तरफ ले ली। इसी दौरान दूसरी गाड़ी से संपर्क करके उन्हें भी किले की तरफ आने के लिए बोल दिया।

अब हम लोग किले की तरफ बढ़ रहे थे और दस पन्द्रह मिनट के बाद ही किले के सामने मौजूद थे। उधर जाकर पता चला इसका नाम नाना राव पेशवा स्मारक पार्क है। दूसरी गाड़ी भी थोड़ी ही देर में आ गयी और हम लोग इस पार्क को देखने के लिए चल दिए। अभी लगभग दो बज रहे थे। आइये इस पार्क के विषय में कुछ बातें पहले जान लें :


  1. आज़ादी से पहले इसे मेमोरियल वेल्ल(memorial well) कहा जाता था। इधर १८५७ की क्रांति में नाना राव पेशवा की फ़ौज ने लगभग 200 अंग्रेज औरतों  और बच्चों को मार डाला था। उन्ही की याद में इसे बनाया गया था। 
  2. इस स्मारक के निर्माण के लिए उस वक्त कानपुर के लोगों को तीस हज़ार पौंड की रक्म अदा करनी पड़ी थी। ये सज़ा इसीलिए दी गयी थी क्योंकि वो उन औरतों और बच्चो की जान की रक्षा नहीं कर पाए थे 
  3. आज़ादी के बाद इस मेमोरियल को तोड़ दिया गया और इसका नाम बदल कर नाना राव पेशवा पार्क कर दिया गया।(स्रोत: , : वैसे उधर कुएँ के आगे एक बोर्ड था जिसमे कुछ और ही दास्तान लिखी है। उस बोर्ड की तस्वीर आप नीचे देख सकते हैं।   ) 

हम पार्क की तरफ बढे तो एक बड़े से गेट ने हमारा स्वागत किया। ये गेट किले के द्वार जैसा विशालकाय था। गेट के अगल बगल जैसी दीवारें थी वो भी किले की ही तरह थीं।  शायद यही कारण था कि स्थानीय लोग इसे पार्क की जगह किला कहते थे। क्योंकि अन्दर जाने पर हमे कुछ किले जैसा इसमें नहीं दिखा। हाँ, बहुत बड़ा पार्क जरूर था।

सोमवार, 14 अगस्त 2017

कानपुर मीट #3: होटल में पदार्पण, एसएमपियंस से भेंट और ब्रह्मावर्त घाट

शनिवार, 8th जुलाई 2017
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

होटल संजय के बाहर खड़े एसएमपियनस : बाएँ से अल्मास भाई, योगी भाई, नवल जी, शैलेश जी, अंकुर भाई, मैं पुनीत भाई, राजीव सिंह जी,राघव भाई और अजादभारती जी 





यात्रा वृत्तांत को शुरुआत से पढने के लिए इधर क्लिक करें।

हमारे होटल का नाम होटल संजय था जो कि रेलवे स्टेशन से सात आठ किलोमीटर दूर था। पंद्रह बीस मिनट का रास्ता था जो कि आराम से कट गया। हम बातचीत करते रहे। कानपुर मीट में और भी एसएमपियन्स आने वाले थे। पूछने पर पता चला कि राघवेन्द्र जी अपने परिवार के साथ घूमने आये थे और वो भी इस मीट में शामिल होंगे। राघवेन्द्र जी से मैं पहले नहीं मिला था तो उनसे मिलने की उत्सुकता थी। साथ में पता चला कि शैलेश जी और राजीव जी आने वाले थे। दोनों ही लखनऊ वासी थे।  राजीव जी से मैं माउंट आबू मीट  के दौरान मिल चुका था।  राजीव जी ने मुझे माउंट आबू में दशराजन उपन्यास दिया था। शैलेश जी को फेसबुक पे पाठकनामा के वजह से जानता था। उन्होंने पाठक साहब के उपन्यासों में आये संवादों को चित्रों के रूप में बड़ी कुशलता के साथ दर्शाया था। इन्ही खूबसूरत तस्वीरों का कलेक्शन पाठकनामा है। इसी नाम से फेसबुक पेज भी है। उनसे ये मेरी पहली  मुलाक़ात होने वाली थी।

हम जल्द ही होटल में पहुँच गये। होटल में हमे मीट के दूसरे आयोजक अंकुर जी मिले। ये कानपुर में ही रहते हैं और इनसे भी मैं पहली बार मिल रहा था। अंकुर भाई बैंक में कार्यरत है। उन्होंने हमे हमारा रूम बताया और हमने उधर एंट्री की।

हम अपने कमरों में आये फोन वगेरह चार्जिंग पे लगाए और चाय पानी का आर्डर दिया गया। जब तक वो आया  तब तक सब फ्रेश होने लगे। जब ये काम किया तो पता लगा कि बाथरूम की कुण्डी आगे से टूटी थी। यानी वो लग तो जाती लेकिन चूँकि उसका घुमावदार हिस्सा गायब था इसलिए दोबारा खोलना मुश्किल था। आते ही ये बात पता लग गयी थी तो सब सावधानी से इसका इस्तेमाल कर रहे थे। धीरे धीरे सब फ्रेश हो गये।

कुछ ही देर में राघवेन्द्र जी आ गये। उनसे मुलाक़ात हुई।  वो हमारे होटल के बगल वाले होटल में ही ठहरे हुए थे। उनके कुछ देर बाद ही शैलेश जी और राजीव जी भी आ गये। वो अपने साथ पाठकनामा की प्रति भी लाये थे जिसे हमने ले लिया और उसके पन्ने पलट पलट कर देखने लगे और संवादों का मज़ा लेने लगे। बात चीत का दौर चल रहा था। इसी दौरान राघव भाई ने सबको एक धागा और प्रसाद भेंट किया। धागा मौली जैसा था जिसे कि हाथ पर पहनना था। वो ये दोनों चीजें काशी के संकटमोचन मंदिर से लाये थे। प्रसाद में लड्डू थे जो कि बहुत स्वादिष्ट थे और उन्होंने बताया कि ये विश्व प्रसिद्ध हैं। दोनों चीजें पाकर सारे एसएमपियंस गदगद हो गये। मैं चूँकि नास्तिक हूँ तो पहनने में झिझक रहा था लेकिन फिर मैंने भी हाथ में डाल दिया। उसमे उनका प्यार जो था। वैसे भी अब विर्दोह वाली और सिम्बल वाली नास्तिकता मेरे मन में समाप्त होती जा रही है। इसलिए अगर मंदिर खूबसूरत हो तो उसकी खूबसूरती देखने के लिए अन्दर चले जाता हूँ। पहले नास्तिकता दर्शाने के लिए किसी भी धार्मिक स्थल में जाने से कतराता था। लेकिन जैसे जैसे उम्र बढ़ रही अपने आप को पहचान पा रहा हूँ और अपने आप से कम्फ़र्टेबल भी होता जा रहा हूँ। खैर, वापस मीट में आते हैं। बातचीत का मुख्य विषय पाठकनामा और नवल जी के फेसबुक पोस्ट ही थे। नवल जी अक्सर फेसबुक पे अपनी तस्वीर के साथ कुछ न कुछ पोस्ट्स करते रहते हैं जो कि बेहतरीन होता है। वो किस तरह ऐसा कर पाते हैं यही जानने के इच्छुक थे। क्योंकि पोस्ट के कोट्स और उनकी तस्वीर एक दूसरे को कॉम्प्लीमेंट करती है। उन्होंने ये राज उजागर किया कि इस कार्य में वो अक्सर अपनी बेटी की राय लेते हैं और उसी पर अमल करते हैं।

इसी दौरान पुनीत भाई ने रात के खाने और सुबह के नाश्ते के मेनू के विषय में पूछा। सबकी राय ली और फिर अल्मास भाई, योगी भाई, पुनीत भाई और मैं नीचे गये। उधर खाना क्या होगा ये निर्धारित हुया। इसके ऊपर थोड़ा बातचीत हुई। शायद कैटरर भाई ने एक पर्ची पर सब लिखकर दिया था जो कि पुनीत भाई के घर में ही रह गयी थी। कैटरर भाई कह रहा था वो होता तो ज्यादा मदद मिलती क्योंकि उसी हिसाब से मेनू को निर्धारित करते। फिर भी थोड़ा बहुत बात करके नाश्ता और रात के खाने का निर्धारण हो ही गया। ये काम निपटाकर हम लोग ऊपर आ गये। ऊपर बातों का सिलसिला जारी था।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

कानपुर मीट #२: आ गये भैया कानपुर नगरीया

8th जुलाई 2017,शनिवार
#हिन्दी_ब्लॉगिंग 




इस यात्रा वृत्तांत को शुरू से पढने के लिए इधर क्लिक करें। 

मेरे चारो तरफ सब कुछ हिलने लगा था। मुझे लगा कोई गड़गड़ाहट के साथ तेजी से मेरी तरफ बढ़ रहा था। वो इतना विशालकाय था कि मेरे तरफ बढ़ते हुए उसके कदम जमीन पर कम्पन पैदा कर रहे थे। और शायद यही मेरे हिलने का कारण भी था। तेजी से बढ़ते उसके क़दमों के साथ मुझे अपनी ह्रदय गति भी तेज होती महसूस हो रही थी। मुझे पता था इतना विशालकाय जीव मुझसे टकराएगा तो मेरे बचने की सम्भावना न के बराबर थी। मैंने उसे अपनी तरफ आता महसूस किया और टकराव के लिए दिल पक्का किया। मेरी मिंची हुई आँखें शायद ही अब खुलती। आवाज बढती गयी और साथ में कम्पन भी और मैं ये टकराया और वो टकराया। लेकिन ये क्या? एकाएक आवाज धीमी होने लगी। कम्पन घटने लगा। मेरी आँखें अभी भी बंद थी लेकिन सांसे तेज थी। ये चारो तरफ अँधेरा क्यों था? ओह याद आया। मैं तो ट्रेन में था। और ये कम्पन  इसलिए था कि बगल से ट्रेन गुजरी थी। मैंने राहत की साँस लेनी चाही लेकिन फिर मन में कुछ अन्य ख्यालों की बाड़ सी आ गयी। 

जब आपकी फटी हुई होती है तो आपका अवचेतन मन भी आपकी लेने में उतारू हो जाता है। जिसे ढाढस बांधना चाहिए वही आपकी लेने लगे तो वो अनुभव सच में विलक्षण होता है। आपने भी अनुभव किया होगा।   आप एक दिन हॉरर फिल्म देखने की योजना बनाते हैं और आपकी लग जाती है। बाथरूम जाते हुए खतरनाक ख्याल आने लगते हैं।  खिड़की से बाहर कोई मानव आकृति दिखने लगती है। हो सकता है ये हमारे अंदर बना कोई प्रोटेक्टिव मैकनिसम हो जो सदियों के एवोल्यूशन से हमारे जीन्स में हमारी सुरक्षा के लिए कोड हो गया हो लेकिन उस वक्त इतना कौन सोचता है।
बस मन मस्तिष्क को गरियाया जाता है।
ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ था
मैं अपने सपने के कारण डरा हुआ था। इसके इलावा मैं जगे होने और सोने की बीच की स्थिति में था। और अब मेरे अंतर्मन ने एक स्लाइड शो शुरू कर दिया था। उसमे खबरे चलने लगी। वो खबरे जो मैंने कुछ ही महीनों पहले देखीं थी। मैं अभी भी सोने और जागने के बीच की स्थिति में था। लेकिन मैं साफ़ देख पा रहा था कि एंकर कैसे कानपुर के निकट जाती ट्रेन के पटरी से उतरने के समाचार को दिखा रहे थे। मैं डरा हुआ था और जैसे कोई ट्रेन बगल से गुजरती मन में ये ही ख्याल आता कि अब हम उतरे अब हम उतरे। ऐसे ही कई बार हुआ और  एक ट्रेन के कारण कम्पन इतनी तेज हुआ कि झटके से मेरी आँखें खुल गयी। मैंने अपने अगल बगल देखा। मैं डरा हुआ था। घर में होता तो माँ के बगल में जाकर दुबक जाता। मुझे याद आया कि सामने की साइड लोअर बर्थ पर योगी भाई बैठे थे। अगर मैं कुछ न करता तो डरा ही रहता। मैंने योगी भाई की तरफ देखा।योगी भाई कान में हेडफोन खोंसकर फोन में कोई फिल्म देख रहे थे। मैंने उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। जब उन्होंने मेरी तरफ देखा तो मैंने मैंने उनसे पुछा कि उनका फोन चार्ज है क्या ? मैंने कहा मेरा फोन डिस्चार्ज होने वाला है और इसलिए मुझे चार्जर चाहिए थाउन्होंने अपने फोन से चार्जर निकाला और मुझे थमा दिया। मुझे अभी भी अपने शरीर से हरकत करने में दिक्कत महसूस हो रही थी। शायद डर के कारण ये हुआ था इसलिए मैंने फोन लिया और योगी भाई की तस्वीर ही खींच दी। इससे थोड़ा राहत मिली  और कुछ देर पहले के डर को मैंने अपने शरीर से निकलते हुए महसूस किया।  मैंने किसी तरह उठकर उनसे चार्जर लिया। अभी सुबह के पौने तीन बज रहे थे। सोने के एक डेढ़ घंटे में ही मेरी नींद खुल गयी थी। 


योगी भाई चार्जर देते हुए
चार्जर थामा और फोन पे लगाया तो वो चला ही नहीं। मैं फिर थोडा घबराया। लेकिन फिर हाथ को एक विशेष कोण पर घुमाया कि चार्जर चल गया और फोन चार्ज होने लगा। अब लगता था कि हाथ ऐसे ही रहेगा। मुझे इससे परेशानी नहीं होती क्योंकि मैं अभी जल्दी सोना नहीं चाहता था। और इस वजह से मुझे नींद नहीं आती।  अब मेरा फोन चार्ज होने लगा। 

फिर आधा पौने घंटे बीते होंगे कि एक जंक्शन आया टुंडला जंक्शन और उधर ट्रेन थोड़ी देर के लिए रुकी। मैं उठा और थोड़ी देर के लिए गेट के पास चला गया। डर अभी भी लग रहा था लेकिन अब वो किसी और वक्त की बात लग रही थी। मैंने टुंडला में उतर कर उसकी तस्वीर उतारी। वैसे तो मुझे पता था कि इधर अभी तो कुछ नहीं मिलेगा लेकिन फिर भी मैंने यहाँ वहां नज़र दौड़ाई कि कोई ए एच व्हीलर की दुकान हो तो कोई उपन्यास ही खरीद लूँगा लेकिन सुबह के साढ़े तीन बजे ऐसा होना मुमकिन नहीं था और ऐसा हुआ भी नहीं। 


टुण्डला जंक्शन में अपनी ट्रेन का इतंजार करते यात्री। ये भाई साहब जाने क्या सोच रहे थे। 

मैं अपने डिब्बे में आ गया क्योंकि ट्रेन चलने को तैयार थी। अब घूमकर थोड़ा मन भी हल्का हो गया था। मैंने दुबारा फोन को चार्जर पर कनेक्ट किया। अपने हाथ को फिर उसी विशेष कोण में मोड़ा और फोन को चार्ज करने लगा। 

फोन चार्ज करते करते कब दुबारा नींद आ गयी इसका पता ही नहीं लगा। 

सुबह  साढ़े पाँच-छः  बजे नींद खुली मैं थोड़ी देर ऐसे ही लेटा रहा। फिर उठ गया। मैं थोड़ा जाकर नित्यक्रिया से निवृत्त हुआ और फिर आकर बैठ गया। मैंने बैठे बैठे ही कुछ तस्वीरें खींची। 






बाहर के नज़ारे देख देखकर मैं बोर सा हो गया था। अब उजाला भी हो गया तो मैंने कुछ पढने की सोची। मैंने सफ़र के लिए अपने साथ Manhattan Noir नामक कहानी संकलन लिया हुआ था। मैंने इसकी पहली कहानी Charles Ardai की The Good Samaritan पढना शुरू किया। अगर आप लोगों ने नहीं पढ़ी है तो जरूर पढ़े। मजेदार कहानी थी। कहानी कुछ इस तरह थी। कुछ दिनों से बेघर लोग रास्तों में मरे हुए पाए जा रहे हैं। उनकी मौत जहर के कारण होती है। ये जहर उन्हें कैसे दिया जाता है और कौन दे रहा है? ये एक रहस्य है। इस केस की तहकीकात जो डिटेक्टिव कर रहा है क्या वो इसका पता लगा पायेगा? अगर हाँ तो कैसे? १८ पृष्ठों की ये कहानी मजेदार थी और इसे मैंने एक ही बैठक में पढ़ लिया। तब तक योगी भाई भी जाग चुके थे। अल्मास भाई भी जग चुके थे। मैं ब्रश करने जाने लगा तो अल्मास भाई बोले कि अरे होटल में जाकर कर लेना ब्रश। लेकिन एक कहानी पढने के बाद मैं अभी दूसरी कहानी शुरू नहीं करना चाहता था। इसलिए थोड़ा ब्रश करके ही टाइम पास हो जाता। फिर भूख लग रही थी तो ब्रश के बाद चाय और कुछ खाने का भी सोच रहा था। इसलिए भी ब्रश करना जरूरी था। 

जो ट्रेन रात को हवा से बातें करते हुए चल रही थी वो ट्रेन सुबह घोंघे के समान आगे बढ़ रही थी। हमे यकीन था कि हमे लेट होगी और वही हुआ भी

खैर, जब सब उठ गये तो फिर चाय और बिस्कुट खाने का प्लान बनाया। मैं कुछ तेल वाला नहीं खाना चाहता था इसलिए बिस्कुट से काम चलाना चाह रहा था।  रात को खाया नहीं था तो अब भूख के मारे हालत डाउन हो रही थी। जो अल्मास भाई मुझे होटल में ब्रश करने की सलाह देते पाए गये थे वही चाय बिस्कुट देखकर अपना मन नहीं रोक पाए। उन्हें भी भूख लगने लगी तो उन्होंने भी ब्रश वगेरह निकाल दिया। ये देखकर मुझे हंसी आ गयी। बच्चू मुझे कह रहे थे कि होटल में जाकर करना ब्रश और अब खुद करने जा रहे थे। हा हा। वो ब्रश करके आये और उन्होंने नाश्ते के लिए कुछ सामान ले लिए। साथ में बिस्कुट तो थे ही तो हमने चाय ली और उनपर टूट पड़े।अब कानपुर आने तक चाय और बिस्कुट का ही दौर चलाना था। ट्रेन अपनी गति से आगे बढ़ रही थी

ऐसे ही एक जगह ट्रेन रुक गयी तो अल्मास भाई बोले - 'विकास भाई तुम्हारे यात्रा वृतांत के लिए एक मस्त चीज दिखाता हूँ'
मैं - 'ऐसा क्या करतब कर रहे हो?'
अल्मास भाई - 'अरे देखो तो सही! आओ मेरे साथ' और ये कहकर वो गेट की तरफ बढ़ गये। ट्रेन रुकी हुई थी। सामने हरे भरे खेत दिख रहे थे। वो गेट पर रुके और फिर नीचे उतर गये। नीचे उतारकर उन्होंने एक सिगरेट जला लिया और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराने लगे
'बोलो कैसी रही?'
मैने कहा - 'क्या?'
अल्मास भाई- 'देखो हम चलती ट्रेन से उतरकर सिगरेट पी रहे हैं और चलती ट्रेन में वापस चलेंगे'
मैंने अपने कंधे उचका दिया। ट्रेन रुकी हुई थी। अल्मास भाई को कैसे चलते हुए महसूस हुई ये नहीं कह सकता। लेकिन ट्रेन कभी भी चल सकती थी इसलिए मैं उन्हें ऊपर आने के लिए कह रहा था। उन्होंने उधर दो तीन पफ मारे और फिर जब ट्रेन हिलने डुलने लगी तो चढ़ गये। मैं उन्हें हैरानी से देखता रहा। 'चलो अब चाय पीते हैं', मैंने कहा और योगी भाई की तरफ बढ़ गये। ट्रेन आगे बढ़ गयी। 


नाश्ते से पहले ब्रश पे पेस्ट लगाते अल्मास भाई। जब मैं ब्रश कर रहा था तो अल्मास भाई मुझे कह रहे थे कि होटल में कर लिया होता लेकिन जब पेट के चूहे बेकाबू हो गये तो खुद भी पेस्ट करने लगे। 😝😝😝😝

अब ट्रेन कानपुर पहुँचने वाली थी। आधा एक घंटा और रहा होगा कि एक जगह फिर रुक गयी। रेल की पटरी के सामने ही एक गाँव था। उसके सामने एक गन्दा सा नाला था जिसकी गंदगी देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो मच्छरों का स्वर्ग हो।मैंने इस बाबत टिपण्णी भी की। मैं उधर देख ही रहा था कि एक बच्चा एक नेत्रहीन बुर्जुग को लेकर पटरी पर चल रहा था और खिड़की वालों से पैसे की गुहार लगा रहा था। उसके कुछ ही देर बाद गाँव से दो तीन बच्चे और निकले और उनके साथ कुछ और बुजुर्ग दिव्यांग थे और वो रुकी हुई ट्रेन के सामने चलते चलते भीख मांगने लगे।कुछ तो ये तक कह रहे थे कि हम मांग रहे हैं तो नहीं दे रहे हो और अगर हिंजड़े  मांगते तो फट से 10-20 रूपये दे देते। मुझे ये सुनकर हैरानी हुई। ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें भीख न देकर हम उनका हक़ मांग रहे हैं। ऐसा क्यों था? ये मेरे समझ के परे था। जब मुंबई में काम करता था तो उधर मेरा दफ्तर गेटवे ऑफ़ इंडिया के बगल में वाइट पर्ल होटल के नज़दीक था।उधर कई अरबी लोग आते थे और इसीलिए कई भिखारी भी घूमते रहते थे। एक बार मैं ऐसे ही खड़ा था और एक बच्चा भिखारी एक महीला से भीख मांग रहा था। वो परेशान दिख रही थी और उसे मना कर रही थी। वो अरबी महिला थी। ऐसे में उसकी नज़र मेरे से मिली और शायद उसमे उसने सहानुभूति देखी तो मुस्कुरा कर बोला- 'ये लोग परेशान कर देते हैं। ' मैंने भी कंधे उचका कर कहा कि क्या किया जा सकता है। यानी कहीं भी हो भिखारी चारों तरफ है और इधर तो गाँव में ही ये मौजूद थे और ये शायद इनका पेशा भी था। थोड़ी ही देर में ट्रेन चलने लगी तो ये विचित्र गाँव पीछे छूट गया

हम फिर कानपुर की तरफ बढ़ने लगे।पुनीत भाई से फोन में बात हो गयी थी और वो हमे लेने आने वाले थे। उन्होंने हमे बताया कि नवल जी भी सुबह ही आने वाले हैं और उनकी ट्रेन के आने का वक्त हमारे ट्रेन के वक्त नजदीक है। हम खुश हुए। नवल जी से पहली बार माउंट आबू में मिला था। बड़े मिलनसार और खुश मिजाज व्यक्ति हैं। हाँ, उन्होंने मुझे कई बार बोला था कि तुम कम बोलते हो और मैंने भी हामी में मुंडी हिला दी थी। अब क्या कर सकते हैं? कोई कम बोलता है कोई ज्यादा बोलता है। सबकी अपनी प्रकृति है। 

हमने फिर चाय पी और बिस्कुट लिए। ट्रेन को ज्यादा देर हो गयी थी। हमे शायद साढ़े छः  बजे कानपुर पहुँच जाना चाहिए था लेकिन पौने आठ हो गये थे। हम कानपुर में आ गये थे।आजकल कानपुर सुनता हूँ तो भाभी जी घर पे हैं के किरदार मन में घूमने लगते हैं। उस वक्त भी लग रहा था कि रेलवे स्टेशन से निकलूंगा तो कोई हप्पू सिंह जैसे व्यक्ति हमे दिख जाएगा। लेकिन ये सब ख्याली पुलाव हैं। मुझे पता था। हमारी ट्रेन रुकी और हम प्लेटफार्म नंबर छः पर उतरे। 

हम पुनीत भाई को फोन मिलाने वाले थे कि योगी भाई ने ओवरब्रिज से आती सीढ़ियों की तरफ इशारा करके बोला कि वो रहे पुनीत भाई।हमे लगा मज़ाक कर रहे हैं लेकिन सच में साक्षात पुनीत भाई थे। मुझे लगा रात के लिए झिडकी न पड़े कहीं। रात के भागा दौड़ी में हमने उन्हें काफी परेशान किया था। लेकिन उन्होंने प्यार से सबको गले लगाया। और फिर हम बाहर को निकलने के लिए ओवरब्रिज की ओर बढ़ने लगे। हम बाहर निकलने के लिए ओवर ब्रिज से उतरे और प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुंचे। उधर एक किताबों की रेड़ी सी दिखी तो थोड़ी देर उधर खड़े हो गये उधर ही नवल जी और आजादभारती जी मिले। आज़ाद भारती जी पाठक साहब के सबसे बुजुर्ग फेन और उनके मित्र भी हैं। मैं उनसे पहले भी दिल्ली में एक पुस्तक मेले में मिल गया था। दुबारा उनसे मिले तो अच्छा लगा।  किताबों की रेहड़ी में मुझे कुछ भी रुचिकर नहीं दिखा तो मैंने नहीं लिया। 

अब चाय पीने की तलब लग रही थी। ट्रेन की चाय तो गर्म पानी से थोड़ी ही बेहतर होती है इसलिए एक अच्छी चाय पीना चाहता था। ये बात पुनीत भाई से कही तो उन्होंने कहा कि स्टेशन से बाहर निकलकर पीते हैं। हम बाहर आये। स्टेशन की फोटो ली और अल्मास भाई ने सबके साथ एक सेल्फी ली। 


कानपूर सेंट्रल के बाहर सेल्फी: अल्मास भाई, नवल जी, मैं , योगी भाई, आज़ाद भारती जी और पुनीत भाई 

फिर हम कार में बैठ गये। कार मैं बैठकर ये निर्णय लिया कि अब सीधे होटल की तरफ ही बढ़ा जायेगा और उधर ही चाय का इतंजाम होगा। हमारे दूसरे आयोजक अंकुर भाई उधर ही हमारा इन्तजार कर रहे थे। उनसे भी पहली बार मिलना होगा। फिर हमारी कार होटल की तरफ चल निकली। उधर कुछ और एसएमपीयंस आने वाले थे। मैं उनसे मिलने के लिए उत्सुक था। ये अनुभव कैसा होगा? कौन कौन आएगा? आगे क्या होगा? हम किधर किधर जायेंगे? यही सब प्रश्न मेरे मन में उठ रहे थे। अब तो बस उधर पहुँचने का इंतजार था। 

क्रमशः
कानपुर मीट की कड़ियाँ :
कानपुर मीट #१:शुक्रवार - स्टेशन रे स्टेशन बहुते कंफ्यूज़न
कानपुर मीट #२: आ गये भैया कानपुर नगरीया
कानपुर मीट #3: होटल में पदार्पण, एसएमपियंस से भेंट और ब्रह्मावर्त घाट
कानपूर मीट #4
कानपुर मीट # 5 : शाम की महफ़िल

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

कानपुर मीट #१:शुक्रवार - स्टेशन रे स्टेशन बहुते कंफ्यूज़न

7 जुलाई 2017, शुक्रवार 

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

माउंट आबू की मीट की सफलता के बाद अब नई मीट की तैयारियाँ चल रही थी।  जो मीट निर्धारित की गई थी उसे दिसंबर में होना था। यानी लगभग पाँच साढ़े पांच महीने के बाद। मेरे लिए वक्त बहुत ज्यादा था। वैसे माउंट आबू के बाद मैं छोटी छोटी तीन यात्राएं कर चुका था। और इन साढ़े पाँच महीनों में भी ऐसी कई यात्राओं का प्लान था। लेकिन ये यात्रायें एस एम पी मीट से जुदा रहती हैं। ये खालिस घुमक्कड़ी थी जबकि एस एम पी मीट में घुमक्कड़ी के साथ पाठक साहब के जिंदादिल फैंस से मिलने का तड़का भी होता है। ये अलग तरीके का नशा है। ऐसे में जब रांची मीट की बात चल रही थी तो मैं कान खड़े करके चुपचाप उस पर नज़र गड़ाये हुए था। लेकिन जब ये प्लान ठंडे बस्ते में जाता महसूस हुआ तो लगा खुराक अब दिसंबर में ही मिल पायेगी।मन दुखी था। ऐसे में दुःखहर्ता के रूप में एक मैसेज मुझे व्हाट्स एप्प में दिखा। कानपुर में मौजूद हमारे पर्सनल फनकार पुनीत दुबे जिन्हें प्यार से पी के डूबे की पदवी दी गयी है ने एक मैसेज डाला। उसके अनुसार वो एक छोटी सी गेट टुगेदर का आयोजन करने वाले थे और  इसमें शामिल होने के लिए हर कोई आज़ाद था। मैंने सोचा मैं कानपुर साइड तो कभी गया नहीं हूँ। ऐसे में उधर जाने का अच्छा मौका है और ऊपर से एसएमपी के नये प्रशंसकों से  मिलने का मौका मिलेगा। मेरी तो बांछे खिल गयी। मैंने  तुरन्त हामी भर दी।

अब देखना ये था कि किस तरह कानपूर जाया जायेगा। जो निर्धारित नाम थे उनमे योगेश्वर भाई का भी नाम था। तो मैंने सोचा उन्हें ही कॉल लगाया जाए। उन्होंने कहा वो टिकेट बुक कर देंगे। मैं खुश। मैंने अब तक आईआरसीटीसी से केवल एक ही बार टिकेट बुक किया था इसलिए मैं थोडा कतरा रहा था। उन्होंने टिकेट बुक किया तो उसमे वेटिंग चल रहा था। मैंने कहा मैं अपनी ओर से कोशिश करता हूँ और अपने साइड से देखा तो मुझे टिकेट मिल गये। मैंने दो टिकेट बुक करवा लिए। जो सूची बनी थी उसमे चूँकि दिल्ली के किसी ओर से हामी नहीं भरी थी तो मैंने किसी और से पूछा भी नहीं। अल्मास भाई के विषय में मैंने सोचा उन्होंने पहले ही टिकेट करवा दी होगी। अब अंग्रेजी की एक कह्वात है न कि assume makes an ass out of you and me, बस यही मेरे साथ भी होगा। मैंने पहले से ही सोच लिया था लेकिन कुछ दिनों बाद जब अल्मास भाई का कॉल आया तो पता चला उन्होंने ऐसा कुछ नहीं करवाया था। अब मैं गधा तो बन ही चुका था लेकिन अपनी गलती सुधारने को भी तत्पर था। फिर बात ऐसी हुई की उनका टिकेट भी मुझे ही करवाने का मौका मिला और ऐसे मैंने अपने पापों का प्रायश्चित किया।