मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

चाँद बावड़ी : दुनिया की सबसे गहरी बावड़ी

यात्रा तीस सितम्बर २०१७  को की




किधर : चाँद बावड़ी, आभानेरी, राजस्थान
कैसे जायें : जयपुर से सिकंदरा बस से १०५ रुपये टिकट (जयपुर आगरा हाईवे )
सिकंदरा से गूलर चौक (साझा टैक्सी से १० रूपये में )
गूलर से आभानेरी (टैम्पो से साझा १० रूपये में )
खुलने का समय: सूर्योदय से सूर्यास्त तक
फोटोग्राफी : निशुल्क , विडियोग्राफी : २५ रुपये

सितम्बर के आखिरी हफ्ते में मेरी बहन रुच्ची घर आ रखी थी। उसके कॉलेज की छुट्टियाँ थी और क्लासेज तीस सितम्बर से दोबारा शुरू  होनी थी। ऐसे में उसे गढ़वाल से 29 को आना था। फिर गढ़वाल से दिल्ली और दिल्ली से जयपुर का सफ़र करना था। पहले मेरी योजना भी घर जाने की थी लेकिन एक दिन के लिए ही घर जाना हो पाता तो मैंने उसे स्थगित कर दिया। मैंने घरवालों को कहा कि मैं रुच्ची को दिल्ली के महाराणा बस अड्डे पे मिल जाऊँगा और उधर से उसके साथ जयपुर चला जाऊँगा। और उसे उसके हॉस्टल तक छोड़ आऊंगा। ऐसा इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि दिल्ली तक आने तक वो बारह घंटे का सफ़र वैसे ही कर चुकी होगी और थकी भी होगी।

चूंकि 2 अक्टूबर की वैसे भी मेरी छुट्टी थी तो मैं ये सफ़र आसानी से कर सकता था।

इसलिए इसी हिसाब से मैंने प्लान बनाने की सोची। मेरा विचार था कि रुच्ची को उसके हॉस्टल छोड़कर मैं फिर घुमक्कड़ी के लिए कहीं न कहीं निकल जाऊंगा। इसलिए जाने से दो तीन दिन पहले मैंने गूगल बाबा से  जानकारी इकट्ठा करना शुरू कर दी  और निर्धारित दिन यानी शुक्रवार तक आने तक एक दो जगह को निर्धारित कर लिया। घूमने के लिए तो मैं जयपुर भी घूम सकता था लेकिन उसमे दो बातें थी। पहली ये कि मैं एक बार जयपुर घूम चुका था। दूसरी ये कि मैंने सुबह पाँच साढ़े पाँच बजे करीब जयपुर पहुँच कर और उसके बाद अपनी बहन को उसके हॉस्टल छोड़कर फ्री हो जाना था। जयपुर के पर्यटक स्थल वैसे भी दस बजे के बाद ही खुलते हैं तो मेरे लिए तीन चार घंटे बिताना मुहाल हो जाता। इसलिए मैंने ये सोचा कि इस वक्फे में मैं जयपुर के आसपास की किसी जगह पहुँच सकता था। फिर उधर घूमकर उसका आनन्द ले सकता था और वापसी भी उसी दिन की हो सकती थी।

घुमक्कड़ी में भागा दौड़ी भी मुझे ज्यादा पसंद नहीं है तो मैंने दो जगह का ही चुनाव किया था। एक तो अलवर जहाँ देखने के लिए बहुत कुछ था और दूसरा चाँद बावड़ी, जो कि दुनिया की सबसे बड़ी बावड़ी थी। मैंने पहले ही उग्रसेन की बावली और फिरोज  शाह कोटला में मौजूद बावली देख चुका  था। फिर ये बावड़ी तो दुनिया की सबसे बड़ी बावड़ी थी इसलिए इसे देखने का लोभ भी था। अब ये उधर ही जाकर निर्धारित करता कि मुझे अंततः क्या देखना था। मन में कई बार जयपुर के आसपास की जगहों का ख्याल भी आया था लेकिन अपने को ज्यादा विकल्प देकर मैं खुद को कंफ्यूज नहीं करना चाहता था। कम जगहें  देखो लेकिन आराम से पूरा समय लगाकर देखो। यही मेरा मोटो रहा है।

खैर, निर्धारित दिन आया। पहले मुझे लगा था कि मुझे २९ यानी शुक्रवार को ऑफिस जाना पड़ेगा लेकिन फिर बाद में पता लगा कि उस दिन ऑफिस का अवकाश है तो मैं थोड़ा खुश भी हो गया। यानी मैं अब सफ़र पे निकलने से पहले कपडे धो धाकर निकलूंगा ताकि वापस आऊँ तो सूखे मिले(अकेले रहते हुए सब चीज की प्लानिंग करनी ही होती है। कपडे धोने जरूरी थे क्योंकि ऑफिस में फॉर्मल पहनना होता है और वापसी का कुछ आईडिया नहीं था। )। इसलिए मैंने २९ का दिन तो इन्ही कामों में लगाया। शाम तक सब काम निपटा और मैं बस अड्डे के लिए तैयार हुआ।

 साढ़े आठ बजे करीब मैं महाराणा प्रताप बस अड्डे पहुँच गया था। यहाँ तक पहुंचना भी अपने आप में भागीरथ प्रयत्न साबित हुआ था क्योंकि आगामी तीन दिन की जो छुट्टी आ रही थीं उनके चलते दिल्ली से कूच करने वाले लोगों की तादाद काफी थी। एमजी मेट्रो स्टेशन में ये लम्बी लम्बी कतारे लगी थी जिन्हें पार करते हुए मैं यही सोच रहा था कि कहीं रुच्ची उधर पहले पहुँच जाए और उसे मेरा इंतजार करना पड़े। लेकिन फिर ऐसा नहीं हुआ। मैं वक्त रहते उधर पहुँच गया था और जब उसका फोन आया कि वो बस से उतर गयी है तो मैं उधर की तरफ आ रहा था जहाँ आईएसबी टी में घुसने से पहले बस अक्सर अपने यात्रियों को उतार देती है। मैं जल्द ही उसके पास पहुँच गया। उसका बैग थामा और आईएसबीटी में दाखिल हुआ।

अन्दर आने से पहले मैंने उसे बता दिया था कि इधर से खाली साधारण गाड़ी मिलेगी। जयपुर के लिए वॉल्वो अगर पकड़नी हो तो अक्सर बीकानेर हाउस से मिलती है। ये उसे भी पता था। उधर जाने के लिए हमे मेट्रो से जाना होता या ओला करनी होती जिसमे थोड़ा झिकझिक थी और फिर चूंकि छुट्टियाँ थी तो इस बात की पूरी सम्भावना थी कि ऑनलाइन बुकिंग हो गयी होगी और वो भरी होंगी। इसलिए उधर जाकर सीट न मिले तो इधर ही  आना  पड़ेगा या फिर इफ्को चौक जाना पड़ता क्योंकि उधर भी जयपुर की गाड़ी काफी चलती रहती है। ऐसे में काफी भाग दौड़ करनी होती जिसके वो पक्ष में नहीं थी इसलिए उसने भी आईएसबीटी से जाने के फैसले पे सहमती जताई। 

हम अन्दर पहुँचे तो  उधर लोगों की भीड़ देखकर वो भी हैरान थी। ये सब लोग अधिकतर हिमाचल जाने वाले लोग थे जो कि दिल्ली की गर्मी से निजाद पाना चाहते थे। अगर मुझे रुच्ची को छोड़ने न जाना होता तो शायद मैं भी इन्हीं लोगों में शामिल होता।

खैर, आईएसबीटी में पहुँचने के बाद हमने राजस्थान की गाड़ियों को खोजने की कोशिश की लेकिन वो हमे मिली नहीं। एक दो चक्कर मारे तब भी नहीं दिखी। फिर  मैंने रुच्ची को नेट में ढूँढने के लिए कहा तो उसने ढूँढा और बताया।  अगर आप आईएसबीटी गए हैं तो उधर आपको पता होगा कि हर राज्य को जाने वाली गाड़ी एक विशेष प्लेटफार्म, जिनकी संख्या ४० से ऊपर है,  पर खड़ी होती है। ऐसे में जयपुर जाने वाली गाड़ी ढूँढना टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। भीड़ ने इसे थोड़ा और मुश्किल बना दिया था। लेकिन किसी तरह हमने अपने मतलब का प्लेटफार्म ढूंढा।  इन्हीं प्लेटफार्म  के सामने छोटे छोटे बूथ बने होते हैं जहाँ से आपको गाड़ियों के विषय में जानकारी और टिकट वगेरह भी मिल जाते हैं। मैं प्लेटफार्म पे बने बूथ पे गया तो मुझे मालूम चला कि उधर ही जयपुर के टिकेट मिल रहे थे।

 मैंने उनसे दो टिकट मांगे। एक मेल और एक फीमेल। राजस्थान की गाड़ियों में  मेल और फीमेल का अलग अलग किराया लगता है। महिला वर्ग को किराए में रियायत दी गयी है। उन साहब ने मुझसे मेरा गंतव्य स्थल पूछा  और फिर एक पर्ची में वो लिखा, फिर उसी कागज के टुकड़े में सीट नंबर और बस का नंबर दर्ज किया और मुझे वो पकडाते हुए हिदायत दी कि उस पर्ची को मैं संभाल कर रखूं क्योंकि कुछ ही देर में कंडक्टर साहब मुझे उसके बदले में टिकट देंगे।उन्होंने ये भी कहा कि तब तक मैं उधर खडा रहूँ। गाड़ी का वक्त सवा नौ का था जिसे बजने में पाँच दस मिनट थे तो मैंने वहीं खड़े रहने की सोची।

अब चूंकि टिकट हाथ में था तो हम खड़े होकर सवा नौ बजने का इन्तजार करने लगे। सवा नौ बजे  मैं काउंटर पे गया और बस के विषय में पूछा तो उन्होंने कंडक्टर की तरफ इशारा कर दिया कि वो बतायेंगे। कंडक्टर साहब ने सवारियों को आवाज दी और हम उनके पीछे हो लिए। बस तो दिख नहीं रही थी तो मैं सोच रहा था कि जाने किधर को ले जाया जा रहा है। खैर, उनके पीछे जाते हुए वो बसों की भीड़ से हमे पार लाये और फिर बाहर की तरफ इशारा करते हुए कहा कि आप गेट से निकलते हुए इस साइड में रहते हुए डिवाइडर के साथ साथ चलते जाना तो आपको बस दिख जाएगी। चूंकि पर्ची पे बस का नंबर दर्ज था तो हम भी इस दिशा निर्देश का पालन  करते हुए बाहर आ निकले। थोड़ी ही देर में  हम बस में थे।

बस में गर्मी थी तो पसीने भी आ रहे थे। हम अपनी सीट्स पे बैठे। थोड़ी देर में कंडक्टर साहब भी आ गए। बस निकलने वाली थी तो एक भाई साहब ने कहा कि एक सवारी के लिए रुक जाइये। साढ़े नौ से ऊपर वक्त हो चुका था। फिर उसके इंतजार में वक्त काटा  और सवारी के आने के बाद ही गाड़ी बढ़नी चालू हुई।

बाकी का सफ़र में ज्यादा कुछ नही हुआ। एक आध घंटे तो हमने बातचीत में गुजारा। इस दौरान कंडक्टर साहब ने टिकट काटी। फिर कुछ देर बाद हमे नींद सी आ गयी।  सफ़र के बीच में मुझे नींद के झोंकों के बीच एक बार बहस सुनाई दी। शायद सामान के किराये को लेकर कुछ बहस थी जिसका नतीजा ये हुआ कि वो व्यक्ति बस से उतर ही गया। इसके बाद का सफ़र नींद के झोंकों में ही बीता। और नींद पूरी तरह सिन्धी कैंप बस स्टैंड आने से थोड़ा पहले ही खुली।

हम बस स्टैंड में उतरे कि दो तीन लोग हमे पर्यटक समझकर होटल की जानकारी देने के लिए हमारे पास आ गए। हमने कहा होटल नहीं चाहिए क्योंकि लोकल है तो वो दूर हुए। इसके बाद रुच्ची को भूख लगी थी और मुझे चाय पीनी थी तो मैंने चाय का आर्डर दिया और रुच्ची के लिए एक मैगी का आर्डर दिया। जब तक वो तैयार होता तब तक मैं चाय की दुकान के बगल में बनी एक बुक स्टाल का चक्कर लगा आया। उधर मुझे एक दो किताब पसंद आ गईं तो मैंने उन्हें खरीद लिया। एक तो केशव पंडित की टाइम बम थी। मैंने केशव पंडित का खाली एक उपन्यास 'शादी करूँगी यमराज' पढ़ा है। वो भी तीन चार साल पहले पढ़ा था और जयपुर की यात्रा पे निकलते हुए मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से लिया था। उस उपन्यास को जब मैं ट्रेन में पढ़ रहा था तो जो भी एक बार शीर्षक पढ़ता मुस्कुराए बिना नहीं रह पाता। उस दिन हम मुंबई से पुणे जनरल के डिब्बे में गए थे और वो भी एक अलग अनुभव था। उधर मैं बैग टिका कर डिब्बे के  बाथरूम के बाहर ही खड़ा हो गया था। पूरा डिब्बा खचाखच भरा था और मुझे भीड़, बदबू , चिल्लम चिल्ली से निजाद केशव पंडित के उपन्यास ने ही दिलाई थी। अब जब केशव पंडित का ये उपन्यास देखा तो पुरानी यादें ताजा हो गयी और इसे ले लिया। फिर अमित खान के उपन्यास सात तालों में बंद मौत की तरफ नजर पड़ी। अब अमित जी के उपन्यास मुझे दिल्ली में नहीं मिलते हैं। इनका भी एक उपन्यास पढ़ा है औरत मेरी दुश्मन और वो उपन्यास जब पुष्कर की यात्रा की थी तो यहीं इसी दुकान से लिया था। यानी दोनों लेखकों के उपन्यास से मेरी दो यात्रायें जुडी हुई थी और दोनों ही यात्राएं जयपुर से जुडी हुई थी। खैर, मैंने उन यात्राओं की यादों से खुद को निकला और उपन्यास की कीमत अदा करके बाहर को आ गया।


तब तक चाय तैयार थी और मैगी बन रही थी। मैंने एक चाय पी। चाय अच्छी थी तो उसे खत्म कर दूसरी का आर्डर दिया। जब तक दूसरी चाय आती तब तक रुच्ची  के लिए  मैगी भी बनकर तैयार थी। उसने वो खाई और मैंने चाय पी। फिर हम ओला में उसके कॉलेज तक की सवारी ढूँढ रहे थे। हमारे सामने फिर एक आदमी आ गया। वो उन्हीं लोगों में से एक था जो बस से उतरकर हमसे होटल के विषय में पूछने आये थे। वो हमसे होटल के लिए पूछने लगा। हमने उसे मना किया तो उसने कहा कि मेरे पास ऑटो भी है तो आपको छोड़ सकता हूँ। हमने उससे किराया पूछा तो उसने किराया बताया। तब तक रुच्ची  ओला का किराया देख चुकी थी।  वो किराया और उस बन्दे द्वारा बताये किराए में ज्यादा फर्क नही नहीं था। ऐसे में हमने ऑटो से जाना ही ठीक समझा और फिर मुझे वापस भी तो आना था इसलिए यही तय किया कि उसे ऑटो से छोड़ने चला जाऊंगा और फिर वापस उसी ऑटो से आ जाऊंगा।


सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

कानपुर मीट #6 : ब्लू वर्ल्ड वाटर पार्क और वापसी

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रविवार 9 जुलाई 2017

ब्लूवर्ल्ड वाटर पार्क में (बाएँ से दायें: अल्मास भाई,राजीव सिंह जी, आजादभारती जी, पुनीत भाई, नवल जी,राघवेन्द्र जी ,युग, पार्थ  ,मैं और योगी भाई )

टीवी की आवाज़ ने मेरी तंद्रा को भंग किया। टीवी पर कोई गीत आ रहा था। गाना खत्म हुआ तो पता चला जो प्रोग्राम चल रहा था वो रंगोली था। इतने वर्षों बाद रंगोली से दोबारा जुड़ना हुआ। जब पौड़ी में रहता था यानी 2005 से पहले तो रंगोली रविवार की दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था। सुबह छः बजे उठ जाया करते थे और नाश्ते के वक्त रंगोली देखा करते थे।  उसके बाद कभी पढ़ाई के सिलसिले में और कभी नौकरी के सिलसिले में भटकना चालू हुआ तो टीवी और उसके साथ रंगोली भी कहीं छूट गया था। इसलिए एक बार को जब टीवी पर रंगोली चलने का एहसास हुआ तो लगा कि वापस अपने बचपन में पहुँच चुका हूँ। लेकिन फिर थोड़ी देर में ही सब याद आ गया कि कानपुर के एक होटल में हूँ।  खैर, नींद तो अब खुल गयी थी। उठा तो सामने आज़ादभारती जी दिखे जो चाय पीते हुए टीवी का आनन्द ले रहे थे। उन्होंने मुझे जगा हुआ देखा तो चाय के लिए पूछा तो मैंने भी हाँ कर दी। अब अकेले रहते हुए तो बेड टी नहीं मिल पाती है। खुद ही सब करना होता है इसलिए आज बेड टी मिली तो उसने चाय के स्वाद को चार पाँच गुना ज्यादा बड़ा दिया। अब मैं रंगोली के गाने देखते हुए चाय की चुस्कियाँ ले रहा था। थोड़े ही देर में योगी भाई भी जाग गए। उनसे चाय के लिए पूछा तो वो कॉफ़ी वाले निकले। अब उनके लिए कॉफ़ी मंगवाई गयी। अब सब अपने पेय पी रहे थे और टीवी में आ रहे गीतों का आनंद ले रहे थे। इतने में नवल जी कमरे में आये। उन्होंने रंगोली चलते हुए देखा तो उस पर थोड़ी देर बात हुई। कौन कौन सी एक्ट्रेस इसको होस्ट कर चुकी हैं। कैसे ये जीवन का हिस्सा हुआ करता था इत्यादि।  इसके बाद हमे तैयार होने के लिए बोला गया। क्योंकि हम लोगों को आज वाटर पार्क जाना था तो जितने जल्दी तैयार होते उतना ठीक रहता। क्योंकि फिर हॉल में जाकर नाश्ता भी करना था। लेकिन करते कराते देर हो ही गयी और जब नीचे पहुँचे तो ग्यारह के करीब वक्त हो गया था।