बुधवार, 29 नवंबर 2017

परिटिब्बा की ट्रेक और दलाई हिल्स में मस्ती : दोस्ती की महक में लिपटी कुछ यादें



यात्रा 11 अगस्त 2017 से 12 अगस्त 2017 के बीच में की गयी
बाएँ से दाएँ : वरुण, प्रशांत, मनन, देव और आगे समूह के संचालक संजीव 

अगस्त के वक्त फ़ालतू (जो कि हमारे कॉलेज के दोस्तों का व्हाट्सएप्प समूह है) का प्लान बना कि 12 अगस्त को मसूरी में घूमा जाए। योजना के अनुसार हमे मसूरी में दलाई हिल्स में जाना था। दलाई हिल्स की मैंने एक दोस्त के फेसबुक टाइम लाइन पर तस्वीर देखी तो मेरा उधर जाने का मन था। हाँ, बस मौका नहीं लग रहा था। उनके ये कहते ही मुझे तो अंधा क्या चाहिए दो आँखें वाला एहसास हुआ और मेरा मन उधर जाने को बन गया।
वैसे भी मैं घूमने को हमेशा तैयार रहता हूँ तो इस बार कहाँ ना नुकुर करता।

बस दिक्कत एक ही थी कि वो लोग देहरादून से 10 बजे करीब निकलने के लिए राजी थी। फ़ालतू के ज्यादतर दोस्त देहरादून के ही थे तो अपने अपने ठिकाने में थे। एक मनन जो गुडगाँव में था वो इसी दिन सुबह पहुँच रहा था तो उसका मन पहुँचने के बाद कुछ देर आराम करने का था। उसकी बात भी सही थी।  इधर मेरा हिसाब ऐसे बैठ रहा था कि मैंने सुबह पाँच साढ़े पाँच के करीब देहरादून पहुँच जाना था। ऐसे में तीन चार घंटे मेरा वक्त ही बर्बाद होता। तो मैंने योजना बनाई कि क्यों न मैं पहले ही मसूरी निकल जाऊँ। और एक छोटी ट्रेक उनके आने से पहले कर दूँ। मैंने उन्ही दिनों परिटिब्बा के विषय में पढ़ा था तो मैंने सोचा यही ट्रेक उस दौरान कर ली जाएगी। मैंने ये योजना सबसे पहले देव बाबू के सामने रखा। वो भी घुमक्कड़ी स्वभाव के हैं और उन्हें पहले बात समझाने में मुझे आसानी होती। मैंने उन्हें बताया तो वो भी परिटिब्बा जाने के लिए लालायित दिखाई देने लगे और साथ चलने के लिए तैयार हो गये। अब एक से भले दो होते ही हैं तो मुझे क्या चहिये था। ये बात करके तो उन्होंने मेरी बांछे वैसे ही खिला दी थी। 

मैंने जब ये बात समूह को बताई तो थोड़ा बहुत गरमा गर्मी हुई लेकिन किसी के पास भी कोई विकल्प नहीं था। सभी लोग साथ में जाना चाहते थे। चाहता तो मैं भी था लेकिन मैं बेस्ट विकल्प सोच रहा था। वो साढ़े पाँच बजे नहीं निकल सकते थे और न मैं साढ़े दस बजे तक इन्तजार कर सकता था। वैसे मैं इतनी देर उनके यहाँ भी बिता सकता था लेकिन मुझे इसकी कोई जरूरत महसूस नहीं हो रही थी। मैं बस में आराम से सो जाता हूँ तो जब रात्री के सफ़र के पश्चात कहीं पहुँचता हूँ तो घूमने फिरने के लिए तैयार रहता हूँ।  ऐसे में आखिरकार यही निर्धारित हुआ कि हम जल्दी चले जायेंगे और वो लोग अपने वक्त के हिसाब से आएँगे। इसके इलावा शनिवार को ये दो जगह घूमकर मेरा प्लान रविवार को ऋषिकेश जाने का भी था। मैं कई दिनों से नील कंठ महादेव मंदिर तक का ट्रेक करना चाह रहा था लेकिन हर बार कुछ न कुछ हो जाता था। इस बार सोचा था की जब उधर जा रहा हूँ तो इसे भी निपटा दें। अब प्लान तो ये ही था लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। वो क्या था उस पर आगे आयेंगे।  तो अब चूंकि प्लान लॉक हो चुका था तो मैं शुक्रवार का बेसब्री से इन्तजार करने लगा।


आखिर शुक्रवार भी आया। यानि 'जिसका मुझे था इन्तजार, जिसके लिए दिल था बेकरार वो घड़ी आ गयी वो घड़ी आ गयी'।' बस मुझे डॉन की तरह प्यार में हद से नहीं  गुजरना था बल्कि दफतर से आकर सामान बाँध कर आईएसबीटी पहुंचना था।  मैंने ऑफिस से आने के बाद सब तैयारी करी। अपने पास अन्थोनी होर्रोविट्ज़ का द माल्टीस फाल्कनर रखी। मैं उन दिनों यही उपन्यास पढ़ रहा था। ये एक कॉमेडी जासूसी बाल उपन्यास है। इसमें २६ साल का टिम डायमंड अपने छोटे भाई निक के साथ मिलकर केस सोल्व करता है। ये इस श्रृंखला का पहला उपन्यास था जिसे मैंने दिल्ली में लगने वाले दरयागंज बुक मार्किट से खरीदा था। उपन्यास रोचक था और टिम की हरकते हँसी दिलाती रहती थी। सफ़र के दौरान मैं ऐसे ही हल्के फुल्के उपन्यास या जासूसी उपन्यास पढना पसंद करता हूँ। मेट्रो, बस इत्यादि जगहों में आपके पास उपन्यास हो तो सफ़र में आसानी होती है। खैर, मैंने सब कुछ बैग में डाला। सामान एक बार चेक किया कि सब ठीक ठाक है और फिर रूम से निकल पड़ा। जल्द ही मैं एम जी मेट्रो में था और उधर से उपन्यास के किरदारों के साथ कश्मीरी गेट पहुंचा। उपन्यास का कथानक इतना मनोरंजक था कि सफ़र कब खत्म हुआ पता ही नहीं चला।

कश्मीरी गेट मेट्रो से होते हुए मैं बस अड्डे के अन्दर दाखिल हुआ। इधर भी मुझे आसानी से देहरादून के लिए गाड़ी मिल गयी। मैंने अपनी सीट हथियाई और देहरादून के सफर पर चल निकला।
इसके बाद रात का सफ़र था तो नींद आना लाजमी था। जब तक बस वाले साहब ने लाइट जलाकर रखी तो मैंने उपन्यास पढ़ना जारी रखा लेकिन जैसे ही उन्होंने बत्ती बुझाई मैंने भी अपनी लाइट ऑफ की और नीद के आगोश में समा गया। मेरी नींद सीधा खतौली पहुँच कर टूटी जहाँ पे बस वाले ने खाने पीने के लिए बस रोकी। उधर रूककर मैं बस से बाहर आ गया और ठंडी हवा का आनंद लिया। मुझे डर इस बात का था कि देहरादून पहुँच कर कहीं बारिश न हो जाए। वैसे इसके लिए मैं तैयार था क्योंकि मैंने बैग में एक रेनकोट और एक छाता रखा हुआ था। बाद में वो हमारे काम भी आया था।

खैर, दस पंद्रह मिनट रुकने के बाद बस अपने गंतव्य स्थल यानी देहरादून के लिए चल निकली। आगे का सफर फिर नींद के झोंकों में बीता। और साढ़े चार - पाँच  बजे करीब मैं देहरादून पहुँच गया। देहरादून पहुँच कर मैंने देव बाबू को कॉल करना चाहा लेकिन अब उनका नंबर लग ही नहीं रहा था। ऐसे में मैंने सोचा कि पहले मसूरी बस अड्डे पहुँचा जाए और उसके बाद दोबारा उधर से नंबर मिलाने की कोशिश की जाए। उधर से बस अड्डे पहुँचने में दस पन्द्रह मिनट ही लगते हैं। तो मैं एक विक्रम में बैठा और रेलवे स्टेशन पहुँचा।

देहरादून में पहाड़ी क्षेत्रों के बसें अक्सर इधर से ही मिल जाती हैं। उधर पहुँचकर पहले मैंने एक मट्ठी और चाय पी। उसे पीते हुए ही देव बाबू को कॉल लगाया तो उनका फ़ोन लगे ही न। अब मैं परेशान हो गया। इसी नम्बर पे ही अक्सर उनसे व्हाट्सएप्प चैट होती थी। मै सोच में पड़ गया कि आखिर मामला क्या है? आजकल लोग एक से अधिक नंबर भी रखते हैं। मेरे पास तो उनका एक ही नंबर था। ऐसे में मैंने संजीव को कॉल लगाने की सोची। मेरा विचार था कि हो न हो संजीव के पास देव के अन्य नंबर भी होंगे। लेकिन उधर भी निराशा ही हासिल हुई। नहीं ऐसा नहीं था कि संजीव के पास नंबर नहीं था। बस संजीव भाई ने फोन ही नहीं उठाया।

अब मैं परेशान सा हो गया। पहले तो मन में ख्याल आया कि अकेले ही मसूरी के लिए निकल जाऊँ लेकिन फिर सोचा कि कुछ देर बाद एक और कोशिश करके देखूंगा। मैंने अपनी चाय निपटाई और फिर उसके कुछ देर बाद देव बाबू को कॉल लगाया।

इस बार उनका नंबर लग गया। पहले तो सोचा दो चार खरी खोटी सुनाऊँ लेकिन फिर मन को जब्त किया और उनसे पूछा कि कब तक आओगे? उन्होने कहा कि वो छः साढ़े छः बजे तक उधर पहुँच पाएंगे क्योंकि उन्हें अपने पापा को ऑफिस छोड़कर आना होता है। मैंने सोचा चलो इतनी देर में फ्रेश हो जाऊंगा। रेलवे स्टेशन के टिकट हॉल में ही शौचालय है तो मैंने उधर की ही सुविधा ली और फ्रेश हुआ। हाथ मुँह धोकर अब चाय की तलब लगी थी।

अब मैं  टिकट घर के बगल में मौजूद कैंटीन में चला गया। उधर चाय का आर्डर दिया और अपना उपन्यास the maltese falcon पढना जारी किया। अभी मुझे एक घंटे से ऊपर इतंजार करना था। इतनी देर मुझे चाय, टिम डायमंड और निक डायमंड के साथ बितानी थी। टिम भले ही बड़ा भाई है लेकिन एक नंबर का डरपोक और मंद बुद्धि है। वो अलग बात है उसे लगता है वो बहुत तेज तर्रार है। वहीं निक तेरह साल का है लेकिन काफी चतुर और स्ट्रीट स्मार्ट है। ऐसे में टिम अक्सर ऐसी परिस्थितियों में होता है जो खतरनाक के साथ मजाकियाँ भी हो जाती हैं और बेचारे निक को उसे बचाना होता है। तेरह चौदह साल के बच्चों को ये उपन्यास जरूर पसंद आएगा। उसका इलावा व्यस्क भी इसका भरपूर आनंद ले सकते हैं। मैंने उपन्यास खोल लिया था और चाय का इन्तजार करने लगा।

मुझे जब चाय मिली और मैंने उसका एक घूँट भरा तो मन प्रसन्न हो गया। ऐसे रेलवे कैंटीन में अक्सर चाय चाय कम गर्म पानी ज्यादा होता है लेकिन ये चाय जबरदस्त बनी थी।अदरक और मसाले से चाय इतनी अच्छी बनी  थी कि सारी थकान काफूर हो गयी। सुबह जहाँ मैंने चाय पी थी वो इसके मुकाबले पानी ही थी। मैंने अब एक घंटा इधर ही बैठने का निर्णय लिया और उस वक्फे में दो कप और चाय के पी लिए। चाय और उपन्यास की इस जुगलबंदी में एक घंटा कब बीता मुझे पता ही नहीं चला। चाय के तीसरे कप के दौरान मैंने देव बाबू को कॉल लगाया तो उन्होंने कहा कि दो दस पंद्रह मिनट में पहुँच जायेंगे। मैंने सोचा चलो अब टिकेट ले लिया जाये। मैंने उनसे बोला जब तक वो आते हैं तब तक टिकट ले लूँगा और उन्होंने  भी हामी भर दी। मैं उठा और चाय वाले भाई का धन्यवाद अदा करके मसूरी की टिकट लेने के लिए निकला।

जाने के लिए तैयार बैग। उस वक्त मेरी योजना रविवार को आने की थी तो इसलिए बैग भारी से लग रहा है
खतौली में रुकी हुई बस... फोटो खीचते हुए ध्यान नहीं रहा था... जाने कौन सी डील फाइनलाइज हो रही है इधर 

देहरादून रेलवे स्टेशन

टिकेट घर के बगल में जो चाय की दुकान है उधर की चाय ने उस दिन मूड बना दिया था

मैं टिकेट घर पहुँचा। उधर काउंटर के सामने लम्बी पंक्ति लगी हुई थी और मैं उसके पीछे खड़ा हो गया। उधर का हिसाब ये था कि टिकट का वितरण तभी होता था जब  बस आ जाती थी। जब तक मेरी बारी आती तब तक बस भर चुकी थी। अब अगली बस आने का इंतजार था। फिर मेरे आगे जो लोग खड़े थे वो एक साथ जाने वाले  थे। उनके साथ उन्नीस बीस लोग रहे होंगे तो मुझे ये डर था कि कहीं उन्ही के समूह से अगली बस न भर जाये। वे लोग भी असमंजस में थे कि बस से जाए या टैक्सी बुक करके। क्योंकि वो ज्यादा थे तो दो तीन टैक्सी तो करनी होती जो जेब को भारी लगता। इसी चर्चा को वो कर रहे थे। अभी टिकट मिलने में वक्त था कि देव बाबू  भी आ गए। उनका कॉल आया तो मैंने उन्हें अपने पास ही आने को कहा। उनके आते ही मसूरी की बस भी आ गयी और टिकट बिकने लगे। वो समूह अभी तक चर्चा में ही लगा था। ऐसे में मेरा नम्बर आ गया तो मैंने दो टिकट ली और जल्द ही हम लोग बस में सवार हो गए।

बस में बैठकर अब एक दूसरे के हाल चाल पूछे और इधर उधर की बातें शुरू हुई। कुछ ही देर में बस चल पड़ी और हम लोग बातों में मशगूल अपने गंतव्य स्थल के लिए चल पड़े।

बस में सबसे पहला चढ़ना कोई किला फतह करना सरीखा था .... चेहरे पर झलक रही है ख़ुशी 

देव बाबू के साथ चलने में मजा आता है क्योंकि उनके पास किस्सों की  भरमार होती है। ऐसे ही वो अपनी यात्रा के किस्से सुनाते रहे। एक दो सेल्फी ग्रुप में भी भेजी और आठ बजे करीब हम मसूरी पहुँच गए।

बस ने हमे लाइब्रेरी चौक से थोड़ी दूर ही छोड़ा था। हम पैदल चलते हुए लाइब्रेरी चौक पहुँच गए। अब हमे आगे का रास्ता तय करना था। मैंने नेट से पता किया था कि परीटिब्बा जाने के पहले वुडस्टॉक स्कूल जाना होगा, उसके बाद धोबीघाट और धोबीघाट से परीटिब्बा तक पैदल जाना था। बीच में लैंडमार्क के तौर पर सागर एस्टेट का बोर्ड भी दिखाई देता। लाइब्रेरी चौक पे हमने वुडस्टॉक की तरफ जाने का रास्ता पूछा तो रिक्शे वालों ने कहा वो एक डेढ़ किलोमीटर दूर है। वो उधर तक जाने के पचास रूपये ले रहे थे। वैसे तो मैं पैदल जाना चाहता था लेकिन वुडस्टॉक से हमे वैसे भी आठ दस किलोमीटर चलना था। क्योंकि धोबीघाट उधर से दो तीन किलोमीटर दूर था और उधर से परिटिब्बा भी दो तीन किलोमीटर दूर था। फिर आठ बज गए थे और साथ वालों ने ग्यारह साढ़े ग्यारह बजे इधर पहुँच जाना था। ऐसे में जितनी जल्दी परिटिब्बा पहुँचते उतना बढ़िया रहता। यही सोचकर वुडस्टॉक  तक पैदल जाने की बजाय रिक्शे में चढ़ गए।

हमे लगा था किस्कूल तक वो हमे लेकर जायेंगे लेकिन उन भाई साहब ने हमे स्कूल से काफी पहले छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि उधर से आगे रिक्शे को जाने की अनुमति नहीं थी। हम उधर उतरे तो हमने एक दो लोगों से परीटिब्बा के विषय में पूछा। लेकिन उन्हें इसके विषय में कोई जानकारी नहीं थी। सभी को लाल टिब्बा के विषय में पता था। फिर हमने धोभी घाट के विषय में पूछा तो एक व्यक्ति ने हमे बताया कि इधर दो तीन धोबी घाट हैं। ऐसे में हमने उससे पूछा कि क्या वुड स्टॉक स्कूल के  निकट भी कोई धोबी घाट है तो उन्होंने इस बात से सहमती दर्शाई। अब हमने उनसे वुड स्टॉक स्कूल की तरफ जाने का रास्ता पूछा और उनके द्वारा इंगित रास्ते की तरफ चल दिये।

मौसम खुशनुमा हो रखा था। वातावरण में हल्की सी ठंड थी और कोहरा था जिससे चलने में आनंद आ रहा था। रास्ते में सड़क के किनारे दीवारों में भी सुन्दर सुन्दर कलात्मक तसवीरें और पेंटिंग्सबनी हुई थी जो माहोल को और खूबसूरत बना रही थीं। कहीं गाँव के घर को दर्शाता आर्टवर्क थी तो कहीं खेत खलियानों में काम करते लोगों के चित्र। एक जगह डोली लाये जाने के चित्र थे तो एक जगह सुन्दर सी ग्राफिटी बनी हुई थी। आधुनिक और पुरातन कलाओ की खूबसूरती को पैदल चलते हुए देख रहे थे। अपने गंतव्य की तरफ बढ़ते हुए बीच में शहीद स्मृति स्थल भी पड़ा जो कि इस वक्त बंद था। उस दिन चूंकि शनिवार था तो हमे स्कूल की तरफ जाते हुए बच्चे भी दिख रहे थे। बच्चों को देखकर हमे भी अपने स्कूल के दिनों की याद आ गयी और हम उसी के विषय में बातें करने लगे। ऐसे ही रास्ते का आनन्द लेते हुए हम वुडस्टॉक स्कूल पहुँच गए।

मसूरी लाइब्रेरी 


रिक्शे में वुडस्टॉक की तरफ बढ़ते हुए 

मसूरी में टहलते हुए कहीं 

शहीद स्मृति स्थल में लगी कुछ और मूर्तियाँ 

शहीद स्मृति स्थल में लगी मूर्तियाँ 

शहीद स्मृति स्थल 

वुडस्टॉक स्कूल की तरफ बढ़ते हुए 

मसूरी के सड़क के किनारे ऐसे खूबसूरत लैम्प्स की भरमार है 

दिवार पे बनी पेंटिंग जिसमे गाँव वाले देवी की डोली लेकर जाते हुए दर्शाए गए  हैं 

एक और दिवार पे बनी कलाकृति

दीवार पे बनी ग्राफेटी

कोहरी से लिपटी सड़क

वुडस्टॉक विला को जाता रास्ता

वुड स्टॉक विद्यालय


अब हमे इधर से नीची जाती सीढियाँ लेनी थी जो कि हमे धोबीघाट तक पहुंचाती। हमने नीचे जाने से पहले एक बार पक्का किया कि वुडस्टॉक हॉस्टल के लिए सीढियाँ इधर से ही जाती हैं क्योंकि नेट में यही लिखा था कि उधर के हॉस्टल की तरफ जाती सीढ़ियों से ही धोबीघाट पहुँचा जा सकता है। जब हमे कन्फर्म हुआ तो हम सीढिया उतरने लगे। इधर भी बेहतरीन  नजारों ने हमारा स्वागत किया। चारो तरफ हरियाली, पेड़ पौधे और सुहावना मौसम। पेड़ों में लगूर मज़े ले रहे थे और उनकी हरकतें देखकर हम। सीढ़ियों से नीचे आये तो बीच में एक सड़क पड़ी। उधर शायद कुछ शिक्षिकाएं बैठी थी तो हमने उनसे घोबिघाट के विषय में पुछा तो उन्हें नीची जाती सीढ़ियों की तरफ इशारा करके बता दिया। हम अब सही रास्ते में थे।

नेट में ये भी लिखा था कि रास्ते में एक सागर एस्टेट आयेगी तो हम उसकी तलाश में थे। जल्द ही हम एक बोर्ड के सामने पहुँच गए। अब हमे लगा कि हमे सागर एस्टेट के तरफ इंगित दिशा की तरफ बढ़ना  था। उधर एक दो फोटो खींचे और जिधर दिशा दिखा रखी थी उधर को बढ़ चले। ये रास्ता फिसलन वाला था। रास्ते में नमी थी और काई जमी हुई थी। फिसलने का डर था तो हम धीरे धीरे चल रहे थे। इस रस्ते में बगल में पानी भी बह रहा था जिसकी ध्वनि माहौल को और खूबसूरत बना रही थी। ऐसा लग रहा था मानों हम किसी एडवेंचर में निकले हों। हमे अपनी मंजिल तक पहुंचना था और हम ख़ुशी ख़ुशी उस रास्ते में बढ़ते जा रहे थे .हम  रास्ते में आगे बढ़ रहे थे और एक जगह पहुँच कर हम रुक गए। रुके इसलिए कि आगे रास्ता नहीं था ।

कोई प्राइवेट प्रोपर्टी थी जिसके गेट पे मैंने अनुष्का  नाम पढ़ा। हम सोच में पड़ गए कि ये क्या हुआ? अब किधर जाया जाये? क्या एडवेंचर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जायेगा। इतना तो तय था कि इधर से आगे रास्ता नहीं था। हमने निर्णय लिया कि वापस उस दोराहे की तरफ मुड़ेंगे जहाँ से इधर को आये थे। और इस निर्णय पर अमल करते हुए हम वापस दोराहे के लिए मुड़ गये।

दोराहे पर पहुंचकर हम दूसरे रास्ते को देख रहे थे। अब उधर से एक रास्ता सामने गाँव की तरफ जाता था। उधर एक व्यक्ति दिखे तो झाड़ू से सफाई कर रहे थे। उनसे परिटिब्बा के विषय में पूछा तो उन्होंने गाँव से होते रास्ते की तरफ इशारा किया कि उधर से जाओ। यानी वो जो गाँव था धोबीघाट था और उधर से हमे जाना था। नीचे पहुँच के निराशा के बादल जो आये वो छटे। अब सही रस्ते पे चलना था। लेकिन उससे पहले मैंने देव बाबू को कहा किस सही रस्ते की तरफ इशारा करते एक फोटो हो जाए। वो भी इसके लिए तैयार हो गए और मैंने उनकी एक तस्वीर निकाली।


लंगूर महाराज नाना पाटेकर की नकल करते हुए। अभी कुछ ही देर में अच्छा है अच्छा है कहेंगे 

धोबीघाट की तरफ बढ़ते हुए 

आस पास की हरियाली

सागर एस्टेट का बोर्ड

गलत रस्ते में बढ़ते हुए ये दिखा तो उत्सुकतावश इसकी तस्वीर खींच ली। मुझे नहीं पता ये क्या है। आपको पता है तो टिपण्णी में बताइयेगा।

काई वाला रास्ता 

काई वाला रास्ता 

जिस रोड पर देव बाबू हैं उधर को ही जाना है। यहीं से परी टिब्बा पहुंचेगे।

फिर हम अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चले। रास्ते में एक दो व्यक्तियों से कन्फर्म किया और ये पक्का करके कि सही रस्ते पे हैं आगे बढ़ते रहे। हम अब धोबी घाट के बीच से गुजर रहे थे। वो एक छोटा सा घरो का समूह था। उधर कपडे सुखाने के लिए डाले हुए थे। ये कपडे रस्ते से लेकर घरों की छतों में थे और अपने नाम को धोबीघाट सिद्ध कर रहा था। उधर से रास्ता ऊपर को निकलता है जो बाद में आगे की तरफ दूसरे गाँवों को जाता है। हम ऊपर जाने वाले रस्ते में बढ़ चले। ऊपर में एक बेंच थी जिससे आस पास का मनमोहक दृश्य दिख रहा था। देव बाबू उधर थोड़ी देर बैठे। मैंने एक दो फोटो ली। मैंने सोचा था कि वापस आते वक्त इधर बैठकर फोटो खिचाऊंगा। और थोड़ी देर बाद हम आगे बढ़ गए।

रास्ता सीधा था। बीच में एक आध जगह दो राहा आया लेकिन हमारी किस्मत थी कि उधर हमें स्थानीय लोग आते जाते दिख जाते थे जिनसे पूछ कर हम सही दिशा में बढ़ जाते। अब एक जगह हम आगे बढ़ रहे थे तो हमे एक बोर्ड दिखा। इस बोर्ड पर लिखा था कि कैलाश मानस धाम आपका स्वागत करता है। मुझे लगा हम फिर रास्ता भटक गए हैं लेकिन फिर सोचा वो लोग जो मिले थे झूठ तो नहीं बोल रहे होगे। उधर दो रस्ते थे। एक कैलाश मांस धाम की तरफ जाता था और दूसरा ऊपर जंगल की तरफ। हमने इसी रास्ते पे आगे बढ़ने का निर्णय लिया और तब तक बढ़ते रहे जब तक एक गेट के आ जाने से रास्ता खत्म न हो गया। अब हम हैरान थे। हमे लगा भी की शायद उन्होंने हमे बेवकूफ बना दिया। उस गेट पे लिखा था वो कैलास मानस धाम को जाने का रास्ता है और उधर बिना आज्ञा जाना वर्जित है। अब किया जाए? हम सोच में पड़ गए। हमने उधर फोटो खिंचाया और वापसी की।

हम वापसी को मुड़े ही थे देव बाबू के पीछे एक दो मधु मक्खियाँ लग गयी। वो हाथ हिलाकर उन्हें दूर भगाने की चेष्टा करते लेकिन वो थोड़ी देर दूर जाने के पश्चात वापस उनके तरफ चक्कर काटने लग जाती। हम वापस आकर उसी बोर्ड के सामने खड़े हो गए जो पेड़ पर लटका दिखा था। उधर से एक रास्ता ऊपर को जाता था। मुझे ये  भी याद आ रहा था कि ऐसा ही बोर्ड मैंने उस आर्टिकल पे देखा था जिसको पढ़कर इधर आये थे। मैंने देव बाबू से उस आर्टिकल को दोबारा खोलने को बोला लेकिन उन्होंने कहा कि परितिब्बा इसी रस्ते पे होगा।  चलो ऊपर चलते हैं। इसी दौरान वो उन मक्खियों से भी जूझ रहे थे। उनका मक्खियों से झूझते हुए बोलना काफी मजाकिया लग रहा था और मैं अपनी हँसी को कण्ट्रोल करने की भरपूर कोशिश कर रहा था। अब हम ऊपर बढ़ चले।

ये रास्ता जंगल के बीच था और हम इसमें ऊपर की तरफ बढ़ते रहे। मानस धाम से वापस आते हुए हमे आठ दस मिनट हो गए थे। हम ऊपर चढ़ने लगे तो हमे एक काँटों की बाड़ सी दिखी। इससे ये तो पता चल गया कि इधर इंसान आते हैं। अब हम बाड़ की दिशा में चलने लगे तो हम एक समतल जगह में पहुँचे। इधर एक आध छोटे छोटे मंदिर थे। पूरे एरिया में घास उगी हुई थी। लेकिन उधर दो चार बोतले थी जो कि उधर आदमियों के आने की चुगली कर रही थी। वो आदमी उधर कब आये होंगे ये कहना मुश्किल था। वो छोटे से मंदिर थे जिनमे झंडिया बंधी हुई थी, कुछ को सजाने का प्रयत्न भी किया गया था और एक आध पर घंटियाँ भी थी। लेकिन इसके इलावा चारो तरफ घास ही घास थी। हम उधर थोड़ी देर खड़े हुए। फिर हमने आस पास के इलाके को एक्स्प्लोर करने की सोची। थोड़ा बहुत घूमे तो हमे एक मंदिर जैसी जगह दिखी। ये दो मंजिला इमारत थी जिसके छप्पर वाली छत पर त्रिकोणीय स्ट्रक्चर था जिसके कारण मुझे लगा वो मंदिर होगा। हम उस इमारत में गए तो उसमे ताला लगा था। हम उसके नीचे वाले हिस्से में गए तो वो भी बंद थी। यानि उस बिहाबन इलाके में हम अकेले थे। हमने उधर थोड़ी बहुत फोटो खींची। अब थोड़ी देर हमने उधर आराम किया। उधर मैंने देव बाबू से कहा:

'देव बाबू मेरे पास ऐसी चीज है जिसे देखोगे तो प्रफुल्लित हो जाओगे?'
उन्होंने अपने पीछे पड़ी मक्खियों को उड़ाते हुए कहा - 'क्या?'
मैंने उनके तरफ देखा और फिर कहा-'इन मक्खियों को शायद आपसे इश्क हो गया है तभी आपका पीछा नहीं छोड़ रही'तो
लेकिन उनका ध्यान मेरी बात में कम और मक्खियाँ उड़ाने में ज्यादा था।
'अच्छा ये तो सुनो मेरे पास क्या है'
'क्या..' वो अपनी जगह बदलते हुए बोले..
'मैंने उन्हें पानी की बोतल दिखाते हुए कहा ये'
हम जब से चल रहे थे तब से हमने पानी की एक बूँद भी नहीं पी थी। मेरे पास बोतल थी तब भी मैंने इस विषय में कुछ नहीं बोला था। एक तो पानी उसमे आधा था और दूसरा मुझे पता था कि एक बार खुलेगी तो जब तक खत्म नहीं होगी तब तक बार बार मांगी जाएगी। अब हम थोड़ा आराम कर चुके थे और फिर हमे अब केवल नीचे ही जाना था। पानी को देखकर उनके चेहरे पर मुस्कान आई और उन्होंने हाथ बढाया।
मैंने उन्हें बोतल थमाई और उन्होंने एक आध घूँट पिया। उन्होंने बोतल मुझे थमाई और फिर उन दो मक्खियों से पीछा छुडाने में लग गए।

मैंने अब उन्हें वापस चलने को कहा तो वो तत्पर हो गए। जब तक हम चलते थे तो वो मक्खियाँ पीछे कम आती थी लेकिन रुको तो ज्यादा परेशान करती थी। हम बढ़ते गए। मैंने उनसे कहा कि - 'मुझे तो लगता है ये मक्खियाँ उस कैलाश धाम की पहरेदार थी। आपने गेट पे फोटो खिंचाई इसलिए रुष्ट होकर आपके पीछे लग गईं।'

ये सुनकर वो हंसने लगे। हम चले जा रहे थे लेकिन कोई भी जाना पहचाना रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। थोड़ी देर चलने के बाद उन्होंने  कहा कि लगता है हम रास्ता भटक चुके हैं। मुझे भी यही लगा।

अब क्या किया जाये ये सोचा गया। ये निर्धारित हुआ कि जिस रस्ते आये हैं वापस चले। मैने कहा मुझे तो याद भी नहीं किस रस्ते आए थे तो उन्होंने कहा मुझे याद है। अब वो आगे आगे बढ़ने लगे और मैं उनके पीछे पीछे। उधर रस्ते में किसी का मल था तो उन्होंने कहा देखो ये बाघ ने किया है। मुझे हँसी आ गयी। मैंने कहा मक्खियों से पीछा नहीं छूट रहा हमारा बाघ आएगा तो जाने क्या होगा। हम थोड़ी देर आगे बढे तो उन्होंने आगे बढ़ते हुए बड़े आत्म विश्वास के साथ 'हम्म' बोला। उस 'हम्म' में इतना आत्मविश्वास था कि मुझे लगा जब वास्को डी गामा ने इंडिया की तट का सही रास्ता खोजा होगा तो उसके 'हम्म' में भी उतना आत्मविश्वास नहीं रहा होगा।

मेरे मन को तस्सली हो गयी कि बेटा अब तो रास्ता मिल गया। मैं पूरे जोश के साथ उनके पीछे चल दिया। मुश्किल से हम पाँच दस कदम चले होंगे की मेरी हँसी छूट गयी। हमारे वास्को डी गामा के हम्म ने हमे धोखा दे दिया था। उधर रास्ता क्या कुछ भी नहीं था। नीचे ढलान सी थी। मेरी हँसी छूटनी थी कि उनकी भी हँसी छूट गयी और हम दोनों उन्मुक्त हंसने लगे। परीटिब्बा को अंग्रेजी में witches trail भी कहते हैं यानी चुड़ैलों का पथ। चुड़ैल का तो पता नहीं इस घटना के बाद दस पंद्रह मिनट तक जंगल में हम राक्षसों के ठहाके जरूर गूँज रहे थे। मैं सोच रहा था कि इधर कोई आएगा तो उसे चुड़ैल का तो पता नहीं लेकिन राक्षसों  के कहकहे जरूर सुनाई देंगे।

अब मैं जिधर को भी मुड़ता थोड़ी देर में पूरे आत्मविश्वास के साथ हम्म कहता और फिर हम दोनों पागलों की तरह हंसने लगते। ऐसे ही हँसते हँसते हम वापस घूमकर उन्हीं मंदिरों के सामने आ गए। ऐसा न सोचियेगा वो मक्खियाँ अभी भी साथ नहीं थी। वो अभी भी साथ थी और तब तक साथ रही जब तक हम नीचे की ओर न जाने लगे। हम हँसते हुए आगे बढ़ते रहे और कुछ ही देर में वो कंटीली बाड़ भी दिख गयी जो आते वक्त दिखी थी।

हम अब नीचे बढे। देर भी हो गयी थी।बाकी लोग देह्रादून से निकल गए थे और कुछ ही देर में पहुँचने वाले थे। हमे उन्हें लाइब्रेरी चौक पे मिलना था। मुझे उस वक्त लगा कि शायद हम परीटिब्बा पहुँचे ही नहीं। उधर कहीं भी परिटिब्बा का बोर्ड नहीं था जबकि उस लेख में टिब्बा का बोर्ड दिख रहा था। टिब्बा मैंने देव बाबू को उस लेख को खोलने को कहा तो उन्होंने खोला।मैंने वो लेख खोला तो पाया कि जो बोर्ड उस लेख में दिख रहा था वो उसी तरफ जाने का इशारा कर रहा था जिधर हम गए थे। हम ऊपर तक पहुँचे थे लेकिन हमे कोई गुफा नहीं दिखी थी। जबकि उधर लिखा था कि उधर गुफाएं हैं। हमे तो उधर कमर तक के पौधे उगे हुए दिखाई दिए थे। चारो तरफ वही हाल था।

खैर, अब किया क्या जा सकता था। वापस जा नहीं सकते थे क्योंकि बाकियों से भी मिलना था। बस ये जानकर अच्छा लगा था कि हम ठीक ही दिशा में गए थे। मैंने मन में सोच लिया कि गर्मियों में एक बार इधर जरूर आऊंगा और फिर तफ्सील से इस इलाके को एक्स्प्लोर करूँगा। अब हम नीचे की तरफ बढ़ने लगे। कुछ ही देर में वो बेंच आ गयी जो धोबी घाट के ऊपर थी। उधर बैठकर थोड़ा आराम किया और फोटो खिंचवाई। फिर नीचे को चले। अब हम धोबीघाट पार करके उसी दो राहे पे खड़े थे जिसपे हम पहले रास्ता भटके थे और एक प्राइवेट एस्टेट तक पहुँच गए थे। मुझे उस एस्टेट का नाम नहीं पता था। और मैं जानना चाहता था कि वो क्या है। मैंने देव बाबू  से कहा कि देव बाबू मुझे लगता है वो अनुष्का शर्मा की एस्टेट है। उन्होंने कहा वो यहाँ क्या करेगी? मैंने कहा सचिन का बंगला भी तो है इधर। चलो देखकर आते हैं किसकी है बोर्ड पे तो नाम होगा। लेकिन देव बाबू नीचे आने को तैयार नही हुए। मेरा प्लान फ़ैल हो गया।  मुझे भी पता नहीं क्या सनक चढ़ी कि मैंने कहा ठीक है आप बैग स्मभालो मैं आता हूँ। और उन्हें बैग देकर मैं दोबारा नीचे तक गया और उस एस्टेट के कुछ फोटो लिए। वो एस्टेट किसी अनुसूया कुमार की थी। खैर, मुझे इससे क्या। मैं वापस ऊपर को हो लिया। मेरी सनक का इलाज तो हो गया था।

ऊपर से दिखता धोबीघाट 

चलता जा मुसाफिर चलता जा 


रास्ते में दिखा छोटा सा मंदिर 

इधर से ऊपर को जाना था 

रास्ते में बढ़ते हुए 

धाम का बोर्ड

धाम के सम्मुख देव बाबू।  यहीं से वो मधुमक्खियाँ उन पर मोहित हुई थीं।




जमीन पर उगे पौधों के बीच में देव बाबू 

ऊपर मौजूद एक मंदिर। शायद यही वो धाम है 

पौधों  से ढकी टंकी 

आस पास का नज़ारा 

आस पास का नज़ारा 

चारो तरफ फैले पौधे 

नीचे आते हुए ये दिखा था। आकर्षक लगा तो तस्वीर ले ली।

सही रास्ता दिखाते हुए हमारे वास्को डी गामा 

आराम फरमाते देव बाबू 

मैंने भी सोचा थोडा कमर टेक लूँ 

एस्टेट जिसके तस्वीर निकालने की सनक सवार हुई थी

दोराहे की तरफ जाते हुए 


ऊपर पहुँचा तो देव बाबू ने कहा कि अभी एक गाड़ी वाला इधर से गया था तो हम उससे लिफ्ट ले सकते थे। मैंने कहा पैदल चलते हैं तो उन्होंने कहा कि बाकी पहुँच गए। अब तो जितना जल्दी हो सकता था जाना बनता था। इतने में एक जिप्सी उधर से गयी और हमने उनसे लिफ्ट मांगी और उन्होंने लिफ्ट भी दे दी। वो हमे एक पेट्रोल पम्प तक लेकर आये।उन्होंने कहा इधर से हमे देहरादून के लिए कुछ न कुछ मिल जाएगा। हमने उनका धन्यवाद दिया और बाकी लोगों को फोन मिलाया।

उन लोगों ने  कहा कि वो किसी आईएएस अकादमी के सामने हैं। हमने गूगल में इसे सर्च किया तो ऐसा कुछ दिखा नहीं। हमने फोन करके पूछा  तो उन्होंने कहा कि पहले लाइब्रेरी चौक पहुँचो। अब हमे उधर चलना था । गूगल इसे डेढ़ दो किलोमीटर दिखा रहा था। देव बाबू ने कहा कोई लिफ्ट लेते हैं। हमने थोड़ा इंतजार किया लेकिन ऐसा कुछ मिल नहीं रहा था तो मैंने कहा इससे बढ़िया पैदल चल लेते हैं। अगर रास्ते में कुछ मिलता है तो लिफ्ट ले लेंगे। खड़े रहे तो वक्त ही ज़ाया होगा। उन्हें  बेमन चलना पड़ा। हम पहले ही काफी चल चुके थे। अब ये चलना और हो गया। लेकिन क्या कर सकते थे। चलना था तो चले। सवा बारह बजे करीब हमे टैक्सी वाले ने छोड़ा था और पौने एक बजे करीब हम दोबारा लाइब्रेरी चौक पहुँचे।

अब मुझे  थोड़ा भूख लग गयी थी। मैंने देव बाबू से कहा कि चाय पीते हैं तो उन्होंने कहा कि वो इतंजार कर रहे होंगे। इतने में मुझे सोफ्टी वाला दिख गया। अब सोफ्टी दिखे और मैं छोड़ दूँ।  बचपन से लेकर आजतक तो ऐसा हुआ नहीं। मैंने देव बाबू से पुछा तो उन्होंने मना कर दिया। मैंने झट से एक सोफ्टी ली और उसका आनंद लेने लगा। इतनी देर में हमने आस पास रिक्शे वालों से आईएएस अकादमी के विषय में पूछा तो एक व्यक्ति हमे उधर छोड़ने के लिए राजी हो गया। कुछ ही देर में उसने हमे आईएएस अकादेमी के गेट पे छोड़ा और तब हमे मालूम हुआ कि गूगल सही जगह क्यों नहीं दर्शा रहा था।

ये इसलिए कि उस जगह का नाम LBS National academy of administartion है। हमने उधर पहुँच कर अपने दोस्तों को कॉल किया तो पता लगा कि वो आगे निकल चुके हैं। हमको उधर से बोला गया कि उधर से दलाई हिल्स की तरफ आ जाओ।  देव बाबू अकादमी के गेट पर पता करने गए और पता करके आये। फिर हम सही रास्ते की तरफ बढे। दलाई हिल्स जाते समय भी एक बार हम रास्ता भटके। एक दोराहा आया जहाँ से हमे ऊपर जाना  था लेकिन हम नीचे को बढ़ गए। नीचे के दुकान दिखी तो मैंने देव बाबू से कहा कि इधर पूछ लेते हैं पक्का करने में क्या हर्ज है काफी भटके हैं आज। इस बार देव बाबू ने कहा कि नहीं पूछते फिर भी इस बार मैने  जबरदस्ती करी और पूछा तो पता लगा कि हम सच में रास्ता भटक चुके थे। हम फिर ऊपर को बढे और सही रस्ते में हुए।उस दोराहे से ऊपर को दलाई हिल्स का रास्ता था। इसके बाद का रास्ता आसान था जिसमे हम आसानी से बढ़ते चले गए।

दलाई हिल्स में बौध मंदिर था।इसके अंत में गौतम बुद्ध की मूर्ती भी थी। हमने उधर बाकियों को खोजा तो वो उधर भी नहीं दिखे। हमे एक बार को लगा कि कहीं हम गलत तो नहीं आ गए लेकिन फिर उन्हें फोन किया तो पता लगा कि वो और आगे हैं। अब हम आगे बढ़ने लगे। हमने रेलिंग पार की तो उधर कई और लोग देखे। ये रास्ता पथरीला था और हम इस पर बढ़ते जा रहे थे। हम नीचे की तरफ जाने लगे। थोड़ी थोड़ी देर में उन लोगों से बात चीत करते और उनकी दिशा में बढ़ते जाते। ऐसे ही दस पंद्रह मिनट चलते हम चलते रहे। आखिरकार जहाँ पर ये लोग आराम कर रहे थे हम उधर पहुँचने वाले थे। देव बाबू ने उनके आराम की जगह ढूंढी थी। पहले मुझे उनके ऊपर विश्वास नहीं हुआ था लेकिन फिर भी उनके पीछे चलने लगा था। मै बीच बीच में कहता कि हम्म न करना बस। वो कहते नहीं विश्वास रखो इस बार सही जा रहा हूँ। ऐसे ही हम मजे लेते हुए बढ़ते जाते।

अब हम एक संकरे से रस्ते में आगे बढ़ रहे थे। वो आगे आगे थे और मैं पीछे पीछे। मेरे हाथ में कैमरा भी था और मैं उससे फोटो लेने में व्यस्त था कि एक जोर सी आवाज़ हुई। टाक। आवाज़ के बाद मेरी आँखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा और गुटने पे ऐसा लगा जैसे किसी ने आग लगा दी हो। एक दर्द की तीव्र लहर मेरे शरीर में दौड़ गयी। मेरे चलने की गति हमेशा से ही तेज रही है और उसका नुकसान मुझे आज हुआ था।मैं तेजी से चल रहा था और आधा ध्यान मेरा कैमरा में था और इस कारण मुझे आगे आती चट्टान नही दिखी और मेरा घुटना उससे जा भिड़ा। टकराने की आवाज़ इतनी तेज थी कि देव बाबू को मैंने पीछे मुड़ते देखा लेकिन वो नीचे खाई की तरफ देख रहे थे। फिर उन्होंने मुझे देखा तो मैंने पूछा कि नीचे क्या देख रहे हो। उन्होंने कहा कि मुझे लगा तुम नीचे चले गए। दर्द से मेरा बुरा हाल था लेकिन ये सुनकर मुझे हँसी आ गयी। मैंने कहा वाह क्या बात है- दोस्त को चोट लगी और सबसे पहला ख्याल ये आया कि वो खाई में गया। वो भी खींसे निपोरने लगे और कहा कि आवाज़ ही इतने तेज हुयी थी कि मुझे लगा गये तुम । मैंने अपनी हँसी पे काबू किया और कहा  अब रुको थोड़ी देर आराम कर लूँ। थोड़ी देर उधर आराम किया और जब दर्द थोड़ा सा हल्का हुआ तो दोबारा चलने लगे। लेकिन अभी जब मुझे याद आता है कि देव बाबू की पहली प्रतिक्रिया पीछे देखने के बजाए नीचे खायी में देखने की थी तो मुझे हँसी आ जाती है।


खैर, उधर से बाकी लोगों के पास पहुँचने के लिए थोड़ी ही दूरी रह गयी थी तो हम जल्दी ही उनके पास पहुँच गए। आखिर देव बाबू ने हमे मंजिल तक पहुंचा ही दिया था। उधर हम बाकी लोगों : संजीव, मनन, प्रशांत और वरुण से मिले। उधर ठंडी ठंडी हवाएं चल रही थी। शांत माहोल और ठन्डी हवाओं का हमने थोड़ी देर आनंद लिया। खूब गप्पे मारी। उन्होंने सेल्फी ज्यादा खींची। मुझे अपनी फोटो खिंचवाना वैसे भी ज्यादा पसंद नहीं इसलिए मैं एक दो में ही शामिल हुआ। वो लोग तो जाने कब से उधर बैठे हुए थे। पंद्रह बीस मिनट तक बैठने के बाद हम वापस चलने के लिए तैयार हो गए। वापस आते हुए भी काफी फोटो खींची। रास्ता संकरा था संभल कर चलना पड़ रहा था। लेकिन जब यार साथ हों तो क्या दिक्कत महसूस होती है। मजे मजे में वापस मंदिर तक आ गये।

लाइब्रेरी चोक की तरफ बढ़ते हुए 

लाइब्रेरी चौक की तरफ बढ़ते हुए 

प्यारी प्यारी सोफ्टी 

दलाई हिल्स को जाता रास्ता 

आगे बढ़ते पथिक 

हम भी आखिर पहुँच ही गये 

अखंड ज्योति 

बुद्ध प्रतिमा 

पीछे छूटा मंदिर 

आस पास का इलाका 

सेल्फी बाज देव बाबू 

आगे को बढ़ता रास्ता 


बाहू बली प्रशांत और शांत चित संजीव 


पास-फ़ैल- इसने बहुतो को फ़ैल कराया उस दिन 

ऐसी ही 

ऐसी ही 

दायें से बायें प्रशांत मनन (आगे) वरुण संजीव(पीछे )

फालतुओं की सेल्फी 

अखंड ज्योति 

हवा में लहराते झंडे 

वरुण और मनन- ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे 

ऐसी ही 



नीचे आते हुए एक स्कूल दिखा। उसके पार्क में ये पत्थर दिखे। तो खींच ली फोटो


फिर दलाई हिल्स से आईएसअकादमी और उधर से लाइब्रेरी चौक तक पहुँचे। यहाँ तक दो बाइक्स में हम बारी बारी आये।

इन सब में चार सवा चार बज गए थे। हमे भूख भी लग गयी थी तो अब लंच करना था। पहले दूर जाने की सोच रहे थे लेकिन निर्धारित यही हुआ कि नजदीकी रेस्टोरेंट को देखें। ऐसा इसलिए जरूरी था  वरुण, s संजीव,मनन और प्रशांत तो दो पहिया वाहन से आये थे लेकिन हमे बस से जाना था। हम दूर जाते तो बस पकड़ने के लिए इधर ही आना होता। फिर मसूरी से आखिरी बस छः साढ़े छः बजे करीब निकलती तो ज्यादा दूर जाने से उसके छूटने का डर भी रहता। ऐसे में कलसंग रेस्तरां तय हुआ और हम उधर की तरफ बढ़ गये। कुछ ही देर में हम उधर बैठे थे और पेट पूजा कर रहे थे। खाना स्वादिष्ट था लेकिन मेरा खाने में इतना ध्यान था कि उसकी तस्वीर नहीं ले पाया।

हम लंच कर ही रहे थे कि बारिश होने लगी। मेरे पास छाता और रेनकोट दोनों ही था तो मुझे टेंशन नही थी। मेरे रेनकोट और छाते ने मदद की। हमने खाना निपटाया और वापसी का मन बनाया। बाकियों के रेनकोट वगेरह भी बाइक में थे तो उस तक पहुँचने के लिए छाता इस्तेमाल हुआ। फिर देव बाबू ने रेन कोट डाला और हम लोग पैदल बस स्टैंड की तरफ बढ़ चले। हम उम्मीद कर रहे थे कि मसूरी से देहरादून की तरफ जाने वाली आखिरी गाड़ी न चली गयी हो। और हम वक्त पर उधर पहुँचे थे। उस वक्त गाड़ी निकलने ही वाली थी। हमे एक सीट ही मिली थी। हमे निर्धारित किया कि बारी बारी बैठकर जायेंगे। अब हम वापस जा रहे थे।

वैसे आने से पहले मेरा मेरा विचार ऋषिकेश जाने का भी था लेकिन अब चूंकि घुटने में चोट लग गयी थी तो मैंने वो विचार त्याग दिया। अब  मैं वापस गुड़गाँव अपने रूम में जाना चाहता था। इस बस से मैं रेलवे स्टेशन तक पहुँच ही सकता था। देव बाबू को अपने यहाँ जाने के लिए बीच में उतरना था तो उन्होंने अपना स्टॉप आते ही विदा ले ली। अब बारिश भी थम गयी थी। जब गाड़ी रेलवे स्टेशन पहुँची तो मैंने सोचा कि एक चाय हो जाए तो मैं अपने सुबह वाले ठिकाने में गया। इस वक्त उधर कोई और था। मुझे हल्का सा लगा कि कहीं अब चाय की गुणवत्ता में कोई कमी न आ जाये। लेकिन मेरा डर निराधार  था क्योंकि चाय उतनी ही बेहतरीन थी जितनी सुबह थी। मैंने चाय का आनन्द लिया और फिर चाय पीकर आईएसबीटी के लिए निकल गया। मेरी जेब में ३०० रूपये बचे थे।

मैंने सोचा था कि आईएसबीटी में पहुँचकर कुछ उपन्यास लूँगा लेकिन अन्दर जाने से पहले पैसे निकलने का ध्यान नहीं रहा। फिर उधर ही काफी घूमा लेकिन किसी भी एटीएम में पैसे नहीं थे। बाहर जा  नही सकता था क्योंकि मुझे दस बजे की गुडगाँव वाली गाड़ी मिल गयी थी। मैंने किताब लेने का ख्याल त्यागा और चुप चाप गाड़ी में बैठ गया। बस में ज्यादा भीड़ नहीं थी। मैं दिन भर घटी घटनाओं के विषय में सोचने लगा। काफी मजे किये थे। चोटिल भी हुआ था लेकिन मजे पूरे आये। हाँ, परी टिब्बा किसी दिन ढंग से जाऊँगा। ये मन में फैसला किया। फिर दिन भर की थकान का असर ही था कि इन्हीं विषयों में सोचते हुए कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला। बाकी का सफ़र नींद में ही कटा।

जब मेरा स्टॉप आया तो मैं उठा। मैं उधर उतरा और रूम की तरफ बढ़ चला। अगले दिन रविवार था तो आराम कर सकता था। यही सोच कर रूम में घुसा। बैग एक जगह पटका। फिर पानी पिया। थोड़ा आराम किया। पसीने से लथपथ था तो नहाया।
पाँच बज रहे थे। नींद भी आ रही थी तो आराम से सो गया।
एक सफ़र का अंत हुआ था। अगला सफ़र किधर का होगा ये बाद में भी सोचा जा सकता था। अभी तो नींद आ रही थी।