सोमवार, 13 नवंबर 2017

गिरफ्तारी - अम्ब्रोस बिएर्स

'Ambrose Bierce' की कहानी  'An Arrest' का हिंदी अनुवाद

लेखक के विषय में :
अम्ब्रोस बिएर्स अमेरिकी लेखक थे। उन्होंने अमेरिकी गृह युद्ध में हिस्सा लिया था। उनकी किताब डेविल्स डिक्शनरी को अमेरिकी साहित्य की १०० सबसे श्रेष्ठतम कृतियों की सूची में रखा गया है। उनके विषय में पूरी जानकारी इधर प्राप्त कर सकते हैं।

ये कहानी Present at hanging and other stories नाम के कहानी संग्रह में मौजूद थी।




अपने बहनोई के क़त्ल करने के बाद, केंटकी का ओर्रिन ब्रोवर, कानून के नज़रों में एक फरार अपराधी था। काउंटी जेल,जहाँ वो अपने ट्रायल का इंतजार कर रहा था, से वो फरार हो चुका था। उसने जेलर को एक लोहे की छड़ से मारकर बेहोश कर दिया था और उससे चाबी हथियाने के बाद रात के अंधेरे में वो जेल से भाग निकला था । जेलर चूँकि उस वक्त  हथियारबंद नहीं था इसलिए ब्रोवर को बिना किसी हथियार के ही उधर से भागना पड़ा था। जैसे ही वो कस्बे से बाहर निकला वो एक जंगल के भीतर चला गया। यहीं उससे गलती हो गयी थी। जब ये घटना घटित हो रही थी तो वो इलाका लगभग बीहड़ हुआ करता था, इसलिए  जंगल में घुसने से  उसके रास्ता भटकने की संभावना काफी बढ़ गयी थी।

रात का अँधेरा गहराता जा रहा था।  आसमान से चाँद और तारों के नदारद होने से भी रात की कालिमा कई गुना बढ़ गयी थी। ब्रोवर चूँकि उधर का निवासी नहीं था तो वो उस इलाके से अनजान था। कुछ तो गहरा अँधेरा और कुछ उसके उस जगह से अनजान होने के कारण वो कुछ वक्त बाद ही रास्ता भटक चुका था। अब उसके लिए ये बताना भी मुश्किल था कि वो कस्बे से दूर जा रहा था या फिर कस्बे की तरफ को  आ रहा था। वो जानता था कि दोनों में से कोई भी बात हो लेकिन  लोगों का एक दस्ता खोजी कुत्तों की तरह उसके पीछे जल्द ही लग जाएगा। इससे उसके भाग निकलने की संभावना काफी कम हो जाएगी। उसे अपने आप को पकड़वाने की कोई इच्छा नहीं थी और वो किस दिशा में बढ़ रहा था इसी बात पर उसकी आज़ादी निर्भर करती थी। अगर एक घंटे की आज़ादी भी उसे मिलती तो वो उसको पाने की भी चाहत रखता था।

इसी सोच में डूबा वो चलता जा रहा था जब अचानक से वो जंगल से होता हुआ एक पुरानी सड़क पे निकल आया।  दूर अँधेरे में मौजूद एक आकृति ने उसे ठिठकने पर मजबूर कर दिया। आकृति अँधेरे के कारण धुंधली सी दिखाई दे रही थी लेकिन वो जानता था कि हो न हो वो कोई आदमी ही था। उसे मालूम था कि अब वापस मुड़ा नहीं जा सकता था। इसके लिए अब बहुत  देर हो चुकी थी। यकायक ब्रोवर के मन में न जाने कहाँ से ये हाहाकारी ख्याल आया कि अगर वो जंगल की तरफ मुड़ता है तो उस आकृति द्वारा गोलियों से छलनी कर दिया जायेगा। इसी अप्रत्याशित ख्याल ने उसे जड़ कर दिया। वही वो आकृति भी हिलने का नाम नहीं ले रही थी।  ब्रोवर को  अपने दिल की बढ़ती धड़कनों के कारण अपना दम घुटता महसूस हो रहा था। दूसरा व्यक्ति के मन में उठते भावों के विषय में कुछ भी कहना मुमकिन न था।

ऐसे ही जड़वत खड़े न जाने कितने लम्हे बीत गए।  ये वक्फा कुछ क्षणों का भी हो सकता था या  एक घंटे का। उस दौरान कुछ भी कहना मुहाल था। इसी दौरान चाँद बादल के ओट से तैरता हुआ आया और उसने अपनी चांदनी से उस जगह को प्रकाशित कर दिया। इसी चाँदनी के प्रकाश में ब्रोवर ने देखा कि आकृति ने अपने हाथ को उठाकर ब्रोवर के आने की दिशा की तरफ इशारा किया। ब्रोवर इस इशारे को बखूबी समझ रहा था। उसे मालूम था कि अब उसके पास अब कोई चारा नहीं बचा था। उसने अपने पकड़ने वाले के तरफ पीठ घुमाई और निर्देशित दिशा की तरफ बढ़ने लगा। अब वो सीधा आगे बढ़ता चला जा रहा था- न वो दायें देखता और न ही बायें देखता। शायद उसे इस बात का एहसास था कि उसकी किसी भी अवांछित हरकत से उसके ऊपर गोली चलाई जा सकती थी। उसको गिरफ्तार करने वाला  उसके पीछे पीछे चला आ रहा था।

ब्रोवर एक खूँखार अपराधी था। जिस नृशंस तरीके से उसने अपने बहनोई का क़त्ल किया था उससे उसके कठिन परिस्थितियों में भी संतुलित रहने का पता चलता था। आखिर  उसके जटिल परिस्थितियों में दिमाग संतुलित करने के गुण ने ही उसकी भागने में मदद की थी। लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था। आदमी कितना भी बहादुर है लेकिन जब वो हार जाता है तो समर्पण कर ही देता है। यही ब्रोवर के साथ भी हुआ था। उसने भी हथियार डाल दिये और खुद को भाग्य को सौंप दिया।

अब वो दोनों जंगल से होते हुए जेल की तरफ बढ़ने लगे । ब्रोवर ने  खाली एक बार अपनी गर्दन घुमाकर पीछे देखने की जुर्रत की थी। ये काम उसने तब किया जब वो  खुद तो छाया में था लेकिन उसको पकड़ने वाला चाँदनी के प्रकाश में पहचाना जा सकता था। उसको पकड़ने वाला बर्टन डफ था। उसका चेहरा मृत व्यक्ति की तरह सफ़ेद पड़ा हुआ था और भौं पर चोट के निशान थे जो कि उस लोहे के छड़ से पड़े थे जिससे ब्रोवर ने उसके ऊपर हमला किया था। ओर्रिन ब्रोवर को अब और कुछ नहीं जानना था।

आखिरकार वो लोग वापस कस्बे में दाखिल हुए । क़स्बा पूरी तरह से रौशन तो था लेकिन सुनसान था। घरों में मौजूद बच्चों और औरतों को छोड़कर कस्बें में कोई नहीं था । ब्रोवर सीधे जेल की तरफ चलता रहा। वो जेल के मुख्य द्वार तक गया और उसने लोहे के भारी दरवाज़े के दस्ते को हाथ से पकड़ कर अन्दर को धकेला। ये सब उसने बिना किसी आदेश के किया और जब वो अंदर दाखिल हुआ तो उसने खुद को आधे दर्जन हथियारबंद लोगों के सम्मुख पाया। वो पलटा। उसके पीछे कोई नहीं खड़ा था।

गलियारे में टेबल रखा हुआ था जिसके ऊपर बर्टन डफ़ की लाश पड़ी हुई थी।


© विकास नैनवाल 
मूल कहानी को आप इधर जाकर पढ़ सकते हैं:
 Present at hanging and other stories

मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

चाँद बावड़ी : दुनिया की सबसे गहरी बावड़ी

यात्रा तीस सितम्बर २०१७  को की




किधर : चाँद बावड़ी, आभानेरी, राजस्थान
कैसे जायें : जयपुर से सिकंदरा बस से १०५ रुपये टिकट (जयपुर आगरा हाईवे )
सिकंदरा से गूलर चौक (साझा टैक्सी से १० रूपये में )
गूलर से आभानेरी (टैम्पो से साझा १० रूपये में )
खुलने का समय: सूर्योदय से सूर्यास्त तक
फोटोग्राफी : निशुल्क , विडियोग्राफी : २५ रुपये

सितम्बर के आखिरी हफ्ते में मेरी बहन रुच्ची घर आ रखी थी। उसके कॉलेज की छुट्टियाँ थी और क्लासेज तीस सितम्बर से दोबारा शुरू  होनी थी। ऐसे में उसे गढ़वाल से 29 को आना था। फिर गढ़वाल से दिल्ली और दिल्ली से जयपुर का सफ़र करना था। पहले मेरी योजना भी घर जाने की थी लेकिन एक दिन के लिए ही घर जाना हो पाता तो मैंने उसे स्थगित कर दिया। मैंने घरवालों को कहा कि मैं रुच्ची को दिल्ली के महाराणा बस अड्डे पे मिल जाऊँगा और उधर से उसके साथ जयपुर चला जाऊँगा। और उसे उसके हॉस्टल तक छोड़ आऊंगा। ऐसा इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि दिल्ली तक आने तक वो बारह घंटे का सफ़र वैसे ही कर चुकी होगी और थकी भी होगी।

चूंकि 2 अक्टूबर की वैसे भी मेरी छुट्टी थी तो मैं ये सफ़र आसानी से कर सकता था।

इसलिए इसी हिसाब से मैंने प्लान बनाने की सोची। मेरा विचार था कि रुच्ची को उसके हॉस्टल छोड़कर मैं फिर घुमक्कड़ी के लिए कहीं न कहीं निकल जाऊंगा। इसलिए जाने से दो तीन दिन पहले मैंने गूगल बाबा से  जानकारी इकट्ठा करना शुरू कर दी  और निर्धारित दिन यानी शुक्रवार तक आने तक एक दो जगह को निर्धारित कर लिया। घूमने के लिए तो मैं जयपुर भी घूम सकता था लेकिन उसमे दो बातें थी। पहली ये कि मैं एक बार जयपुर घूम चुका था। दूसरी ये कि मैंने सुबह पाँच साढ़े पाँच बजे करीब जयपुर पहुँच कर और उसके बाद अपनी बहन को उसके हॉस्टल छोड़कर फ्री हो जाना था। जयपुर के पर्यटक स्थल वैसे भी दस बजे के बाद ही खुलते हैं तो मेरे लिए तीन चार घंटे बिताना मुहाल हो जाता। इसलिए मैंने ये सोचा कि इस वक्फे में मैं जयपुर के आसपास की किसी जगह पहुँच सकता था। फिर उधर घूमकर उसका आनन्द ले सकता था और वापसी भी उसी दिन की हो सकती थी।

घुमक्कड़ी में भागा दौड़ी भी मुझे ज्यादा पसंद नहीं है तो मैंने दो जगह का ही चुनाव किया था। एक तो अलवर जहाँ देखने के लिए बहुत कुछ था और दूसरा चाँद बावड़ी, जो कि दुनिया की सबसे बड़ी बावड़ी थी। मैंने पहले ही उग्रसेन की बावली और फिरोज  शाह कोटला में मौजूद बावली देख चुका  था। फिर ये बावड़ी तो दुनिया की सबसे बड़ी बावड़ी थी इसलिए इसे देखने का लोभ भी था। अब ये उधर ही जाकर निर्धारित करता कि मुझे अंततः क्या देखना था। मन में कई बार जयपुर के आसपास की जगहों का ख्याल भी आया था लेकिन अपने को ज्यादा विकल्प देकर मैं खुद को कंफ्यूज नहीं करना चाहता था। कम जगहें  देखो लेकिन आराम से पूरा समय लगाकर देखो। यही मेरा मोटो रहा है।

खैर, निर्धारित दिन आया। पहले मुझे लगा था कि मुझे २९ यानी शुक्रवार को ऑफिस जाना पड़ेगा लेकिन फिर बाद में पता लगा कि उस दिन ऑफिस का अवकाश है तो मैं थोड़ा खुश भी हो गया। यानी मैं अब सफ़र पे निकलने से पहले कपडे धो धाकर निकलूंगा ताकि वापस आऊँ तो सूखे मिले(अकेले रहते हुए सब चीज की प्लानिंग करनी ही होती है। कपडे धोने जरूरी थे क्योंकि ऑफिस में फॉर्मल पहनना होता है और वापसी का कुछ आईडिया नहीं था। )। इसलिए मैंने २९ का दिन तो इन्ही कामों में लगाया। शाम तक सब काम निपटा और मैं बस अड्डे के लिए तैयार हुआ।

 साढ़े आठ बजे करीब मैं महाराणा प्रताप बस अड्डे पहुँच गया था। यहाँ तक पहुंचना भी अपने आप में भागीरथ प्रयत्न साबित हुआ था क्योंकि आगामी तीन दिन की जो छुट्टी आ रही थीं उनके चलते दिल्ली से कूच करने वाले लोगों की तादाद काफी थी। एमजी मेट्रो स्टेशन में ये लम्बी लम्बी कतारे लगी थी जिन्हें पार करते हुए मैं यही सोच रहा था कि कहीं रुच्ची उधर पहले पहुँच जाए और उसे मेरा इंतजार करना पड़े। लेकिन फिर ऐसा नहीं हुआ। मैं वक्त रहते उधर पहुँच गया था और जब उसका फोन आया कि वो बस से उतर गयी है तो मैं उधर की तरफ आ रहा था जहाँ आईएसबी टी में घुसने से पहले बस अक्सर अपने यात्रियों को उतार देती है। मैं जल्द ही उसके पास पहुँच गया। उसका बैग थामा और आईएसबीटी में दाखिल हुआ।

अन्दर आने से पहले मैंने उसे बता दिया था कि इधर से खाली साधारण गाड़ी मिलेगी। जयपुर के लिए वॉल्वो अगर पकड़नी हो तो अक्सर बीकानेर हाउस से मिलती है। ये उसे भी पता था। उधर जाने के लिए हमे मेट्रो से जाना होता या ओला करनी होती जिसमे थोड़ा झिकझिक थी और फिर चूंकि छुट्टियाँ थी तो इस बात की पूरी सम्भावना थी कि ऑनलाइन बुकिंग हो गयी होगी और वो भरी होंगी। इसलिए उधर जाकर सीट न मिले तो इधर ही  आना  पड़ेगा या फिर इफ्को चौक जाना पड़ता क्योंकि उधर भी जयपुर की गाड़ी काफी चलती रहती है। ऐसे में काफी भाग दौड़ करनी होती जिसके वो पक्ष में नहीं थी इसलिए उसने भी आईएसबीटी से जाने के फैसले पे सहमती जताई। 

हम अन्दर पहुँचे तो  उधर लोगों की भीड़ देखकर वो भी हैरान थी। ये सब लोग अधिकतर हिमाचल जाने वाले लोग थे जो कि दिल्ली की गर्मी से निजाद पाना चाहते थे। अगर मुझे रुच्ची को छोड़ने न जाना होता तो शायद मैं भी इन्हीं लोगों में शामिल होता।

खैर, आईएसबीटी में पहुँचने के बाद हमने राजस्थान की गाड़ियों को खोजने की कोशिश की लेकिन वो हमे मिली नहीं। एक दो चक्कर मारे तब भी नहीं दिखी। फिर  मैंने रुच्ची को नेट में ढूँढने के लिए कहा तो उसने ढूँढा और बताया।  अगर आप आईएसबीटी गए हैं तो उधर आपको पता होगा कि हर राज्य को जाने वाली गाड़ी एक विशेष प्लेटफार्म, जिनकी संख्या ४० से ऊपर है,  पर खड़ी होती है। ऐसे में जयपुर जाने वाली गाड़ी ढूँढना टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। भीड़ ने इसे थोड़ा और मुश्किल बना दिया था। लेकिन किसी तरह हमने अपने मतलब का प्लेटफार्म ढूंढा।  इन्हीं प्लेटफार्म  के सामने छोटे छोटे बूथ बने होते हैं जहाँ से आपको गाड़ियों के विषय में जानकारी और टिकट वगेरह भी मिल जाते हैं। मैं प्लेटफार्म पे बने बूथ पे गया तो मुझे मालूम चला कि उधर ही जयपुर के टिकेट मिल रहे थे।

 मैंने उनसे दो टिकट मांगे। एक मेल और एक फीमेल। राजस्थान की गाड़ियों में  मेल और फीमेल का अलग अलग किराया लगता है। महिला वर्ग को किराए में रियायत दी गयी है। उन साहब ने मुझसे मेरा गंतव्य स्थल पूछा  और फिर एक पर्ची में वो लिखा, फिर उसी कागज के टुकड़े में सीट नंबर और बस का नंबर दर्ज किया और मुझे वो पकडाते हुए हिदायत दी कि उस पर्ची को मैं संभाल कर रखूं क्योंकि कुछ ही देर में कंडक्टर साहब मुझे उसके बदले में टिकट देंगे।उन्होंने ये भी कहा कि तब तक मैं उधर खडा रहूँ। गाड़ी का वक्त सवा नौ का था जिसे बजने में पाँच दस मिनट थे तो मैंने वहीं खड़े रहने की सोची।

अब चूंकि टिकट हाथ में था तो हम खड़े होकर सवा नौ बजने का इन्तजार करने लगे। सवा नौ बजे  मैं काउंटर पे गया और बस के विषय में पूछा तो उन्होंने कंडक्टर की तरफ इशारा कर दिया कि वो बतायेंगे। कंडक्टर साहब ने सवारियों को आवाज दी और हम उनके पीछे हो लिए। बस तो दिख नहीं रही थी तो मैं सोच रहा था कि जाने किधर को ले जाया जा रहा है। खैर, उनके पीछे जाते हुए वो बसों की भीड़ से हमे पार लाये और फिर बाहर की तरफ इशारा करते हुए कहा कि आप गेट से निकलते हुए इस साइड में रहते हुए डिवाइडर के साथ साथ चलते जाना तो आपको बस दिख जाएगी। चूंकि पर्ची पे बस का नंबर दर्ज था तो हम भी इस दिशा निर्देश का पालन  करते हुए बाहर आ निकले। थोड़ी ही देर में  हम बस में थे।

बस में गर्मी थी तो पसीने भी आ रहे थे। हम अपनी सीट्स पे बैठे। थोड़ी देर में कंडक्टर साहब भी आ गए। बस निकलने वाली थी तो एक भाई साहब ने कहा कि एक सवारी के लिए रुक जाइये। साढ़े नौ से ऊपर वक्त हो चुका था। फिर उसके इंतजार में वक्त काटा  और सवारी के आने के बाद ही गाड़ी बढ़नी चालू हुई।

बाकी का सफ़र में ज्यादा कुछ नही हुआ। एक आध घंटे तो हमने बातचीत में गुजारा। इस दौरान कंडक्टर साहब ने टिकट काटी। फिर कुछ देर बाद हमे नींद सी आ गयी।  सफ़र के बीच में मुझे नींद के झोंकों के बीच एक बार बहस सुनाई दी। शायद सामान के किराये को लेकर कुछ बहस थी जिसका नतीजा ये हुआ कि वो व्यक्ति बस से उतर ही गया। इसके बाद का सफ़र नींद के झोंकों में ही बीता। और नींद पूरी तरह सिन्धी कैंप बस स्टैंड आने से थोड़ा पहले ही खुली।

हम बस स्टैंड में उतरे कि दो तीन लोग हमे पर्यटक समझकर होटल की जानकारी देने के लिए हमारे पास आ गए। हमने कहा होटल नहीं चाहिए क्योंकि लोकल है तो वो दूर हुए। इसके बाद रुच्ची को भूख लगी थी और मुझे चाय पीनी थी तो मैंने चाय का आर्डर दिया और रुच्ची के लिए एक मैगी का आर्डर दिया। जब तक वो तैयार होता तब तक मैं चाय की दुकान के बगल में बनी एक बुक स्टाल का चक्कर लगा आया। उधर मुझे एक दो किताब पसंद आ गईं तो मैंने उन्हें खरीद लिया। एक तो केशव पंडित की टाइम बम थी। मैंने केशव पंडित का खाली एक उपन्यास 'शादी करूँगी यमराज' पढ़ा है। वो भी तीन चार साल पहले पढ़ा था और जयपुर की यात्रा पे निकलते हुए मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से लिया था। उस उपन्यास को जब मैं ट्रेन में पढ़ रहा था तो जो भी एक बार शीर्षक पढ़ता मुस्कुराए बिना नहीं रह पाता। उस दिन हम मुंबई से पुणे जनरल के डिब्बे में गए थे और वो भी एक अलग अनुभव था। उधर मैं बैग टिका कर डिब्बे के  बाथरूम के बाहर ही खड़ा हो गया था। पूरा डिब्बा खचाखच भरा था और मुझे भीड़, बदबू , चिल्लम चिल्ली से निजाद केशव पंडित के उपन्यास ने ही दिलाई थी। अब जब केशव पंडित का ये उपन्यास देखा तो पुरानी यादें ताजा हो गयी और इसे ले लिया। फिर अमित खान के उपन्यास सात तालों में बंद मौत की तरफ नजर पड़ी। अब अमित जी के उपन्यास मुझे दिल्ली में नहीं मिलते हैं। इनका भी एक उपन्यास पढ़ा है औरत मेरी दुश्मन और वो उपन्यास जब पुष्कर की यात्रा की थी तो यहीं इसी दुकान से लिया था। यानी दोनों लेखकों के उपन्यास से मेरी दो यात्रायें जुडी हुई थी और दोनों ही यात्राएं जयपुर से जुडी हुई थी। खैर, मैंने उन यात्राओं की यादों से खुद को निकला और उपन्यास की कीमत अदा करके बाहर को आ गया।


तब तक चाय तैयार थी और मैगी बन रही थी। मैंने एक चाय पी। चाय अच्छी थी तो उसे खत्म कर दूसरी का आर्डर दिया। जब तक दूसरी चाय आती तब तक रुच्ची  के लिए  मैगी भी बनकर तैयार थी। उसने वो खाई और मैंने चाय पी। फिर हम ओला में उसके कॉलेज तक की सवारी ढूँढ रहे थे। हमारे सामने फिर एक आदमी आ गया। वो उन्हीं लोगों में से एक था जो बस से उतरकर हमसे होटल के विषय में पूछने आये थे। वो हमसे होटल के लिए पूछने लगा। हमने उसे मना किया तो उसने कहा कि मेरे पास ऑटो भी है तो आपको छोड़ सकता हूँ। हमने उससे किराया पूछा तो उसने किराया बताया। तब तक रुच्ची  ओला का किराया देख चुकी थी।  वो किराया और उस बन्दे द्वारा बताये किराए में ज्यादा फर्क नही नहीं था। ऐसे में हमने ऑटो से जाना ही ठीक समझा और फिर मुझे वापस भी तो आना था इसलिए यही तय किया कि उसे ऑटो से छोड़ने चला जाऊंगा और फिर वापस उसी ऑटो से आ जाऊंगा।


सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

कानपुर मीट #6 : ब्लू वर्ल्ड वाटर पार्क और वापसी

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रविवार 9 जुलाई 2017

ब्लूवर्ल्ड वाटर पार्क में (बाएँ से दायें: अल्मास भाई,राजीव सिंह जी, आजादभारती जी, पुनीत भाई, नवल जी,राघवेन्द्र जी ,युग, पार्थ  ,मैं और योगी भाई )

टीवी की आवाज़ ने मेरी तंद्रा को भंग किया। टीवी पर कोई गीत आ रहा था। गाना खत्म हुआ तो पता चला जो प्रोग्राम चल रहा था वो रंगोली था। इतने वर्षों बाद रंगोली से दोबारा जुड़ना हुआ। जब पौड़ी में रहता था यानी 2005 से पहले तो रंगोली रविवार की दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था। सुबह छः बजे उठ जाया करते थे और नाश्ते के वक्त रंगोली देखा करते थे।  उसके बाद कभी पढ़ाई के सिलसिले में और कभी नौकरी के सिलसिले में भटकना चालू हुआ तो टीवी और उसके साथ रंगोली भी कहीं छूट गया था। इसलिए एक बार को जब टीवी पर रंगोली चलने का एहसास हुआ तो लगा कि वापस अपने बचपन में पहुँच चुका हूँ। लेकिन फिर थोड़ी देर में ही सब याद आ गया कि कानपुर के एक होटल में हूँ।  खैर, नींद तो अब खुल गयी थी। उठा तो सामने आज़ादभारती जी दिखे जो चाय पीते हुए टीवी का आनन्द ले रहे थे। उन्होंने मुझे जगा हुआ देखा तो चाय के लिए पूछा तो मैंने भी हाँ कर दी। अब अकेले रहते हुए तो बेड टी नहीं मिल पाती है। खुद ही सब करना होता है इसलिए आज बेड टी मिली तो उसने चाय के स्वाद को चार पाँच गुना ज्यादा बड़ा दिया। अब मैं रंगोली के गाने देखते हुए चाय की चुस्कियाँ ले रहा था। थोड़े ही देर में योगी भाई भी जाग गए। उनसे चाय के लिए पूछा तो वो कॉफ़ी वाले निकले। अब उनके लिए कॉफ़ी मंगवाई गयी। अब सब अपने पेय पी रहे थे और टीवी में आ रहे गीतों का आनंद ले रहे थे। इतने में नवल जी कमरे में आये। उन्होंने रंगोली चलते हुए देखा तो उस पर थोड़ी देर बात हुई। कौन कौन सी एक्ट्रेस इसको होस्ट कर चुकी हैं। कैसे ये जीवन का हिस्सा हुआ करता था इत्यादि।  इसके बाद हमे तैयार होने के लिए बोला गया। क्योंकि हम लोगों को आज वाटर पार्क जाना था तो जितने जल्दी तैयार होते उतना ठीक रहता। क्योंकि फिर हॉल में जाकर नाश्ता भी करना था। लेकिन करते कराते देर हो ही गयी और जब नीचे पहुँचे तो ग्यारह के करीब वक्त हो गया था।

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

कानपुर मीट #5: शाम की महफ़िल

 8th जुलाई 2017, शनिवार
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अल्मास भाई को छोड़ने के बाद हम होटल की तरफ मुड़ गये थे। यहाँ तक आपने पिछली कड़ी में पढ़ा। कुछ ही देर के सफ़र के पश्चात हम अपने होटल में थे। होटल पहुँच कर हमे अपनी दिन भर घूमने की थकान को दूर करना था और इसके लिए चाय और कॉफ़ी से बढ़िया और क्या हो सकता था। हम रूम में पहुंचे, फ्रेश वगेरह हुए और चाय कॉफ़ी का आर्डर दिया। कुछ ही देर में चाय कॉफ़ी भी आ गयी और सब उसकी चुस्कियाँ लेते हुए बीते हुए दिन के विषय में बातें करने लगे। ऐसी बातें चल रही थी कि दो लोगों की कमरे में एंट्री हुयी। हमे पहले ही बता दिया गया था कि अरविन्द शुक्ला जी और उनके साथ सिद्धार्थ सक्सेना जी भी इस मीट में शिरकत करने के लिए आने वाले थे। हम लोग बातें करते हुए उनका ही इन्तजार कर रहे थे। वो आये और हम सब से मिले। मैं पहली बार सक्सेना जी और शुक्ला जी से मिल रहा था। वो आये और हमारे साथ बैठकर बातचीत में शामिल हो गये। वो आये बैठे और शैलेश जी के पाठकनामा को देखने लगे। एक सुनील के संवाद को देखते हुए उन्होंने कहा कि ये तो सुनील का है। ये सुनना था कि योगी भाई ने उनसे पूछा कि आप भी पढ़ते हैं क्या पाठक साहब को। तो उन्होंने कहा थोड़ा बहुत पढ़ा है। फिर ऐसे ही बातों का  सिलसिला चलता रहा,शैलेश जी ने अपने लड़कपन के किस्से भी सुनाए और ऐसे ही बातों की जलेबियाँ छनती रही।

वहीं दूसरी तरफ दोनों होस्ट शाम की महफ़िल की तैयारी में जुटे हुए थे। एसएमपी मीट का मुख्य आकर्षण ये शाम की महफ़िल ही होती है। यहाँ लोग बाग़ आपस में फोर्मली मिलते हैं और अपने विषय में बाकी मौजूद लोगों को बताते हैं। बातचीत और चर्चा होती है। दौर-ए-जाम चलता है। यानी पूरा एन्जॉय किया जाता है। एसएममी मीट का ये वो हिस्सा है जिसका सभी को इन्तजार रहता है। हमे भी इसका इन्तजार था। नवल भाई के आईडिया के कारण आज तो केक भी कटना था। बातचीत करते हुए कब साढ़े सात बज गये पता ही नही लगा। अल्मास भाई भी होटल वापस आ गए थे।  अब शाम की कार्यवाही करने का वक्त हो गया था और धीरे धीरे सारे सुमोपाई होटल के हॉल की तरफ बढ़ने लगे। इसी हॉल में सब इंतजाम किया हुआ था।


नीचे जाने से पहले कुछ हल्की फुल्की बातचीत - बाएं से अल्मास भाई, पुनीत भाई, योगी भाई और शैलेश जी 

सात साढ़े सात तक सभी लोग हॉल में आ चुके थे। अब केक कटिंग होनी थी। हीरा फेरी आने के उपलक्ष में केक काटने का निर्णय किया गया था। एक तरीके से हम लोग अपने तरह से पाठक साहब के नये उपन्यास को सेलिब्रेट कर रहे थे। अब ये निर्णय लेना था कि केक कौन काटेगा तो ये निर्धारित हुआ कि होस्ट्स और  आज़ादभारती जी केक काटेंगे। तालियों की गडगडाहट के बीच केक काटा और फिर सबके बीच उसका वितरण हुआ। सबने यही दुआ की कि पाठक साहब यूँ ही लिखते रहे हैं और ऐसी ही उनके हर उपन्यास के लिए केक कटते रहे। नवल जी का ये आईडिया मुझे काफी अच्छा लगा और उनके इस आईडिया की जितनी तारीफ की जाए उतना कम है। उम्मीद है ऐसे छोटे छोटे आयोजन हर मीट में होंगे ताकि मीट और यादगार बन सके।

हीरा फेरी उपन्यास  आने के  उपलक्ष में लाया गया केक 

होस्ट पुनीत भाई, अंकुर भाई और आज़ादभारती जी द्वारा केक काटा गया 

केक काटने के बाद सबको खिलाया गया 
केक कटिंग सेरेमनी के खत्म होने के कुछ देर बाद ही दौर-ए-जाम शुरू हुआ। इसी दौरान पुनीत भाई के बड़े भाई भी मीट में आये और उन्होंने अपने प्यार और आशीर्वाद से सबको कृतार्थ किया। अब सभी अपना पसंदीदा पेय पी रहे थे। जिन्हें सोमरस पसंद था वो सोमरस, जिन्हें कोल्ड ड्रिंक पसंद थी वो कोल्ड ड्रिंक और जिन्हें कोल्ड ड्रिंक और सोमरस दोनों पसंद था वो उसे मिलाकर चुसक रहे थे। संक्षेप में कहूँ तो सभी अपनी इच्छानुसार आनंद ले रहे थे। स्टार्टर्स भी चालू हो चुके थे। शाकाहारी और मांसाहारी दोनों का बंदोबस्त था।  जामों के दौर और स्वादिष्ट स्टार्टर्स के साथ मीट की अगली कार्यवाही शुरू हुई।

पुनीत भाई उठे और उन्होंने मीट के होस्ट होने के कारण एक वक्तव्य दिया जिसमे उन्होंने सबको शुक्रियादा अदा किया। इसके बाद उन्होंने अल्मास भाई को सभा संचालन करने का कार्यभार सौंपा। क्योंकि हममें से काफी लोग एक दूसरे को जानते थे तो ये निर्धारित हुआ कि अल्मास भाई जो लोग एक दो मीट में आये हैं उनका संक्षिप्त परिचय देंगे और बाकी नये लोग अपना परिचय खुद देंगे तथा ये भी बताएँगे कि पाठक साहब के साथ उनका रिश्ता किस तरह जुड़ा।

हसन भाई ने कार्यभार संभाला और परिचय शुरू किया। मैंने अपने फोन में रिकॉर्डर ऑन कर लिया था जिसके कारण मीट का काफी ऑडियो मेरे पास रिकॉर्ड हो गया था। उसी से मीट की हाईलाइट्स आपके समक्ष रखना चाहूँगा।

सोमवार, 11 सितंबर 2017

ब्लॉगर में प्रकाशित पोस्ट का permalink कैसे बदलें ?

अभी कुछ दिन पहले मुझे एक समस्या का सामना करना पड़ा। हुआ यूँ कि मैंने अपने माउंट आबू यात्रा वृत्तांत की एक पोस्ट को इधर प्रकाशित किया था। उसमे हम होटल भाग्यलक्ष्मी में रुके थे। अब ये मेरी कमजोर याददाश्त ही थी कि मैंने होटल को भाग्यलक्ष्मी की जगह धनलक्ष्मी समझा और पूरे पोस्ट में इसी नाम  से उसका ज़िक्र किया। फिर पोस्ट पढ़कर अमित श्रीवास्तव जी ने मेरी भूल को सुधारा और सही नाम बताया। अब पोस्ट पे तो मैने नाम बदल दिया था लेकिन जो मैंने कस्टम यूआरएल बनाया था उसमे होटल धनलक्ष्मी ही था। मैं इसको भी बदलना चाहता था लेकिन कैसे करूँ कोई आईडिया नहीं था। इसलिए मैंने इसके विषय में सर्च किया और मुझे इस विषय में जानकारी मिली। मुझे मिली तो सोचा इधर अपने ब्लॉग के माध्यम से  क्यों न उसे साझा कर लूँ।

अपने ब्लॉग पोस्ट का पर्मालिंक आप बड़ी आसानी से बदल सकते हैं। ऐसा कैसे कर सकते हैं ? आईये जानते हैं:


१.सबसे पहले तो आपको अपनी प्रकाशित पोस्ट को एडिटर में खोलिए। उधर जाकर Permalink पर क्लिक करेंगे तो आपको पोस्ट का मौजूदा लिंक दिखने लगेगा। नीचे तस्वीर में arrow उस लिंक की तरफ पॉइंट कर रहा है। आप देख सकते हैं कि प्रकाशित पोस्ट का लिंक blogpost_9.html है। अब इस नाम का पोस्ट के शीर्षक से कुछ लेना देना नहीं है और इसी को अब हम बदलेंगे।



गुरुवार, 7 सितंबर 2017

24वाँ दिल्ली पुस्तक मेला, दरयागंज का सन्डे मार्किट और एक मिनी मीट

पिछ्ला सप्ताहंत बेहतरीन बीता। दिल्ली में पुस्तक मेला लगा हुआ था तो शनिवार को उधर गया और  रविवार को दरयागंज गया और  साथ में कुछ मित्रों से मिलना भी हुआ। बस दुःख ये है कि फोटोएं काफी कम खींची। खैर, आप भी चलिए मेरे साथ।


शनिवार 2 सितम्बर 2017
दिल्ली में पुस्तक मेला लगा हुआ था तो उधर जाने का मेरा मन था। पुस्तक मेला २६ अगस्त से 3 सितम्बर तक लगना था। चूँकि मैं २४ को ही अपने  घर पौड़ी चले गया था तो मुझे उस सप्ताहंत में पुस्तक मेले में जाने का मौका नहीं मिला। सप्ताह के बाकी दिनों में काम काज का सिलसिला ऐसा रहता है कि कहीं भी जाना असम्भव रहता है। इसलिए  २६-२७ अगस्त के पश्चात दो या तीन सितम्बर ही ऐसी तारीक बची थीं जो मेरे लिए पुस्तक मेले में भ्रमण करने  लिए उपयुक्त थी। और मैंने इन्ही दो दिनों में उधर जाने का फैसला लिया।

दो सितम्बर को शनिवार था और मैं जल्द ही उठ गया। मौसम में बदली छाई हुई थी। मुझे उम्मीद थी कि बारिश नहीं होगी। सुबह उठकर जल्दी नाश्ता किया और पुस्तक मेले के लिए निकल गया। शनिवार को मैंने डॉक्टर हु एंड द ऑटन इनवेज़न पढना शुरू किया था और मेट्रो का सफ़र उपन्यास पढ़ते हुए और उसके इंटरेस्टिंग वाक्यों को गुडरीडस और फेसबुक पे साझा करते हुए बीता। ये तृतीय डॉक्टर का उपन्यास है।  अगर आप डॉक्टर हु सीरीज देखते हैं तो आपको पता होगा कि एक ही डॉक्टर के अलग अलग सीजन में अलग रूप होते हैं। 1963  को चला ये शो आज भी बदस्तूर जारी है।और डॉक्टर कई रूप ले चुका है। मैंने नेटफ्लिक्स पे ये सीरीज देखी थी और मुझे पसंद आई थी। उसके बाद मैने डॉक्टर हु का एक नावेल संडे मार्किट के दौरे पे मिला था। (उस दिन मैंने क्या क्या लिया था आप इधर जाकर पढ़ सकते हैं।) खैर, उसे पढने के बाद मेरे मन में और डॉक्टर हु के उपन्यास पढने की ललक जागी और मैंने तीन चार खरीद लिए थे। डॉक्टर हु एंड द ओटन इन्वेजन उन्ही में से  से एक है।

उपन्यास रोचक था और इसे पढ़ते हुए कब राजीव चौक आया पता ही नहीं चला। फिर ट्रेन बदली और प्रगति मैदान की तरफ बढ़ा। राजीव चौक से प्रगति मैदान दो तीन स्टेशन के बाद ही आ जाता है तो जल्द ही मैं मेट्रो से एग्जिट करके पुस्तक मेले की ओर बढ़ रहा था।  मैं करीब साढ़े नौ बजे रूम से निकला था और करीब दस बजकर पचपन मिनट पर पुस्तक मेले में दाखिल हो गया था।

मेले का टिकट तीस रूपये का था। मैंने टिकट लिया और अन्दर दाखिल हुआ। मैं पिछले पुस्तक मेलों में काफी सामान खरीद चुका था(दिल्ली पुस्तक मेला २०१६,विश्व पुस्तक मेला 2017)। उनके इलावा भी गाहे बघाहे किताबें खरीदता रहता हूँ तो मेरा ज्यादा किताबें लेने का मन नहीं था। मेरे मन में दो किताबें थी जो मैं लेना चाहता था। एक स्टेफेन किंग का उपन्यास इट था और दूसरा राहुल संकृत्यायन जी की किताब घुम्मकड़ शास्त्र।  जब पुस्तक मेले में दाखिल हुआ था तो मन में इन्ही दो किताबों को लेने का विचार था।

लेकिन फिर पुस्तक मेले में घुसते ही कुछ और किताबों के नाम याद आने लगे। अक्सर ऐसा होता है मेरे साथ।  मैंने सोचा राजकमल प्रकाशन से  'प्रोफेसर शंकु के कारनामे' और 'जहाँगीर की स्वर्ण मुद्रा' सरीखे उपन्यास भी ले लूँगा। जहाँगीर की स्वर्ण मुद्रा मैंने कुछ दिनों पहले अमेज़न से मंगवाया था लेकिन उसकी प्रति जो मुझे मिली थी वो काफी क्षत विक्षित हालत में थी तो मैंने उसे वापस करवा दिया। यानी घर से निकलते हुए मन में दो किताबें थी और पुस्तक मेले में आते ही दो किताबें उस सूची में जुड़ गयी थी। अब देखना था कि इनमे से कितनी मुझे मिल पाती।

पुस्तक मेले में एंट्री 




पुस्तक मेले में इस बार भीड़ मुझे काफी कम दिख रही थी। किताबें 9-11 हॉल में थी। मैं उनमें दाखिल हुआ और स्टाल्स में घूमने लगा। पहले चक्कर में मैं कुछ खरीदना नहीं चाह रहा था खाली अलग अलग प्रकाशनों के पास जाता और कुछ देर ब्राउज करके निकल जाता। हाँ, जो पसंद आती उनको मन में नोट कर लेता।  मैंने सोचा था पहले चक्कर में जिन किताबों के विषय में मन बनाया है उनको ढूँढू और अगर वो न मिले तो ही दूसरों पर हाथ डालूँ। किताबघर, एनबीटी और साहित्य अकादमी के स्टाल में मौजूद लोगों से  मैंने राहुल संकृत्यायन के घुमक्कड़ शास्त्र के विषय में पूछा था लेकिन वो उनके पास नहीं थी। हिंदी बुक सेण्टर का स्टाल भी उधर था लेकिन घुम्मक्कड शास्त्र उधर भी नहीं थी। साथ में अंग्रेजी उपन्यासों वाली जगह में इट भी ढूँढने की कोशिश की थी लेकिन वो भी कहीं दिखाई नहीं दी थी। राजकमल और वाणी प्रकाशन का स्टाल मुझे दिखाई नहीं दिया।
एक बार पूरा मेला घूम चुकने के बाद मैं बाहर निकल आया। मुझे लगा था कि दूसरा हॉल होगा जहाँ  ये दोनों प्रकाशन होंगे। बाहर आने पर 12 नंबर हॉल की तरफ गया तो उधर दूसरा मेला लगा था जहाँ शायद स्टेशनरी का सामान बिक रहा था। इसमें मुझे रुचि नहीं थी। हाँ, अब यकीन हो गया था कि पुस्तक मेले में से राजकमल और वाणी प्रकाशन नदारद थे। राजकमल वालों का बीएचयू में अलग से मेला चल रहा है और शायद इसलिए उन्होंने इस मेले को महत्व नहीं दिया। इसके इलावा वाणी वाले शायद देहरादून पुस्तक मेले को शायद ज्यादा तरजीह दे रहे थे। इससे मुझे थोड़ी निराशा हुई। क्योंकि अब प्रोफेसर शंकु के कारनामे और जहाँगीर की स्वर्ण मुद्रा नहीं ले सकता था। यानी हालत ऐसी थी कि जिन किताबों का मन बनाकर आया वो तो मिलनी नहीं थी।


सोमवार, 21 अगस्त 2017

कानपूर मीट #4

शनिवार 8 जुलाई 2017

इस यात्रा संस्मरण को शुरुआत से पढने के लिए इधर क्लिक करें।

नाना राव पेशवा पार्क के सामने सभी लोग। बायें से अंकुर भाई,अल्मास भाई, राजीव जी ,राघव जी, भारती जी ,पुनीत भाई ,नवल जी और योगी भाई 

एक चालीस का वक्त हो गया था और अब हम घाट घूम चुके थे। इस विषय में आप पिछली कड़ी में पढ़ चुके हैं। अगर आपने नहीं पढ़ा है तो आप इधर जाकर पढ़ सकते हैं। हम लोग गाड़ी में बैठ गये थे और अब दूसरे स्थलों पर जाने की तैयारी थी।

जब पुनीत भैया से पुछा कि अगला पड़ाव कौन सा होगा तो उन्होंने कहा एक साईं मंदिर है, सुधांशु महाराज का आश्रम है और आखिर में गंगा बैराज घूमेंगे। मैं घूमने के लिए निकलता हूँ तो मंदिर अक्सर कम ही जाता हूँ। अगर मंदिर की वास्तुकला में कुछ विशिष्ट बात हो तो देख आता हूँ वरना अगर मंदिर साधारण है तो मुझे उसे देखने की इतनी उत्सुकता नहीं रहती है। सुधांशु महाराज के आश्रम के प्रति भी मैं मन में उत्सुकता नहीं जगा पा रहा था। हाँ, गंगा बैराज देखने की उत्सुकता मन में थी। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि मैंने 'गैराज' तो सुना था लेकिन बैराज शब्द से पहली बार रूबरू हुआ था। क्या होता होगा ये बैराज? ये प्रश्न मन में उठ रहा था लेकिन मैंने सोचा था कि जब देखेंगे तो पता चल ही जायेगा। क्योंकि गंगा बैराज था तो पानी तो होगा ही इस बात की मुझे पूरी उम्मीद थी।

हमारी गाड़ी घाट से निकल रही थी और मुख्य सड़क की तरफ आ रही थी कि पुनीत भाई ने बोला कि इधर एक किला भी है। किला का नाम सुनकर मेरे कान खड़े हो गये। मैंने पुनीत भाई को कहा कि किला तो देखना बनता है। अल्मास भाई ने एक बार कहा कि छोड़ो किला क्या देखना लेकिन बाकी लोग भी अब किले को देखने को उत्सुक थे। और ये बात सही भी थी कि क्योंकि जब आये थे तो होटल में बैठने तो नहीं आये थे और फिर एक दो जगह घूमने में क्या दिक्कत थी। ऊपर से मेरे मन में ये भी विचार आ रहा था कि अगर ज्यादा देर हुई तो मंदिर और आश्रम जाने की योजना को कैंसिल किया जा सकता है। हमारी गाड़ी आगे बढ़ गयी थी। हमको किले की ओर जाने के लिए गाड़ी वापस मोड़नी थी। सड़क संकरी थी तो ड्राईवर साहब ने गाड़ी थोड़े आगे बढ़ाई और एक जगह रास्ता देखकर गाड़ी मोड़ ली और किले की तरफ ले ली। इसी दौरान दूसरी गाड़ी से संपर्क करके उन्हें भी किले की तरफ आने के लिए बोल दिया।

अब हम लोग किले की तरफ बढ़ रहे थे और दस पन्द्रह मिनट के बाद ही किले के सामने मौजूद थे। उधर जाकर पता चला इसका नाम नाना राव पेशवा स्मारक पार्क है। दूसरी गाड़ी भी थोड़ी ही देर में आ गयी और हम लोग इस पार्क को देखने के लिए चल दिए। अभी लगभग दो बज रहे थे। आइये इस पार्क के विषय में कुछ बातें पहले जान लें :


  1. आज़ादी से पहले इसे मेमोरियल वेल्ल(memorial well) कहा जाता था। इधर १८५७ की क्रांति में नाना राव पेशवा की फ़ौज ने लगभग 200 अंग्रेज औरतों  और बच्चों को मार डाला था। उन्ही की याद में इसे बनाया गया था। 
  2. इस स्मारक के निर्माण के लिए उस वक्त कानपुर के लोगों को तीस हज़ार पौंड की रक्म अदा करनी पड़ी थी। ये सज़ा इसीलिए दी गयी थी क्योंकि वो उन औरतों और बच्चो की जान की रक्षा नहीं कर पाए थे 
  3. आज़ादी के बाद इस मेमोरियल को तोड़ दिया गया और इसका नाम बदल कर नाना राव पेशवा पार्क कर दिया गया।(स्रोत: , : वैसे उधर कुएँ के आगे एक बोर्ड था जिसमे कुछ और ही दास्तान लिखी है। उस बोर्ड की तस्वीर आप नीचे देख सकते हैं।   ) 

हम पार्क की तरफ बढे तो एक बड़े से गेट ने हमारा स्वागत किया। ये गेट किले के द्वार जैसा विशालकाय था। गेट के अगल बगल जैसी दीवारें थी वो भी किले की ही तरह थीं।  शायद यही कारण था कि स्थानीय लोग इसे पार्क की जगह किला कहते थे। क्योंकि अन्दर जाने पर हमे कुछ किले जैसा इसमें नहीं दिखा। हाँ, बहुत बड़ा पार्क जरूर था।

सोमवार, 14 अगस्त 2017

कानपुर मीट #3: होटल में पदार्पण, एसएमपियंस से भेंट और ब्रह्मावर्त घाट

शनिवार, 8th जुलाई 2017
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

होटल संजय के बाहर खड़े एसएमपियनस : बाएँ से अल्मास भाई, योगी भाई, नवल जी, शैलेश जी, अंकुर भाई, मैं पुनीत भाई, राजीव सिंह जी,राघव भाई और अजादभारती जी 





यात्रा वृत्तांत को शुरुआत से पढने के लिए इधर क्लिक करें।

हमारे होटल का नाम होटल संजय था जो कि रेलवे स्टेशन से सात आठ किलोमीटर दूर था। पंद्रह बीस मिनट का रास्ता था जो कि आराम से कट गया। हम बातचीत करते रहे। कानपुर मीट में और भी एसएमपियन्स आने वाले थे। पूछने पर पता चला कि राघवेन्द्र जी अपने परिवार के साथ घूमने आये थे और वो भी इस मीट में शामिल होंगे। राघवेन्द्र जी से मैं पहले नहीं मिला था तो उनसे मिलने की उत्सुकता थी। साथ में पता चला कि शैलेश जी और राजीव जी आने वाले थे। दोनों ही लखनऊ वासी थे।  राजीव जी से मैं माउंट आबू मीट  के दौरान मिल चुका था।  राजीव जी ने मुझे माउंट आबू में दशराजन उपन्यास दिया था। शैलेश जी को फेसबुक पे पाठकनामा के वजह से जानता था। उन्होंने पाठक साहब के उपन्यासों में आये संवादों को चित्रों के रूप में बड़ी कुशलता के साथ दर्शाया था। इन्ही खूबसूरत तस्वीरों का कलेक्शन पाठकनामा है। इसी नाम से फेसबुक पेज भी है। उनसे ये मेरी पहली  मुलाक़ात होने वाली थी।

हम जल्द ही होटल में पहुँच गये। होटल में हमे मीट के दूसरे आयोजक अंकुर जी मिले। ये कानपुर में ही रहते हैं और इनसे भी मैं पहली बार मिल रहा था। अंकुर भाई बैंक में कार्यरत है। उन्होंने हमे हमारा रूम बताया और हमने उधर एंट्री की।

हम अपने कमरों में आये फोन वगेरह चार्जिंग पे लगाए और चाय पानी का आर्डर दिया गया। जब तक वो आया  तब तक सब फ्रेश होने लगे। जब ये काम किया तो पता लगा कि बाथरूम की कुण्डी आगे से टूटी थी। यानी वो लग तो जाती लेकिन चूँकि उसका घुमावदार हिस्सा गायब था इसलिए दोबारा खोलना मुश्किल था। आते ही ये बात पता लग गयी थी तो सब सावधानी से इसका इस्तेमाल कर रहे थे। धीरे धीरे सब फ्रेश हो गये।

कुछ ही देर में राघवेन्द्र जी आ गये। उनसे मुलाक़ात हुई।  वो हमारे होटल के बगल वाले होटल में ही ठहरे हुए थे। उनके कुछ देर बाद ही शैलेश जी और राजीव जी भी आ गये। वो अपने साथ पाठकनामा की प्रति भी लाये थे जिसे हमने ले लिया और उसके पन्ने पलट पलट कर देखने लगे और संवादों का मज़ा लेने लगे। बात चीत का दौर चल रहा था। इसी दौरान राघव भाई ने सबको एक धागा और प्रसाद भेंट किया। धागा मौली जैसा था जिसे कि हाथ पर पहनना था। वो ये दोनों चीजें काशी के संकटमोचन मंदिर से लाये थे। प्रसाद में लड्डू थे जो कि बहुत स्वादिष्ट थे और उन्होंने बताया कि ये विश्व प्रसिद्ध हैं। दोनों चीजें पाकर सारे एसएमपियंस गदगद हो गये। मैं चूँकि नास्तिक हूँ तो पहनने में झिझक रहा था लेकिन फिर मैंने भी हाथ में डाल दिया। उसमे उनका प्यार जो था। वैसे भी अब विर्दोह वाली और सिम्बल वाली नास्तिकता मेरे मन में समाप्त होती जा रही है। इसलिए अगर मंदिर खूबसूरत हो तो उसकी खूबसूरती देखने के लिए अन्दर चले जाता हूँ। पहले नास्तिकता दर्शाने के लिए किसी भी धार्मिक स्थल में जाने से कतराता था। लेकिन जैसे जैसे उम्र बढ़ रही अपने आप को पहचान पा रहा हूँ और अपने आप से कम्फ़र्टेबल भी होता जा रहा हूँ। खैर, वापस मीट में आते हैं। बातचीत का मुख्य विषय पाठकनामा और नवल जी के फेसबुक पोस्ट ही थे। नवल जी अक्सर फेसबुक पे अपनी तस्वीर के साथ कुछ न कुछ पोस्ट्स करते रहते हैं जो कि बेहतरीन होता है। वो किस तरह ऐसा कर पाते हैं यही जानने के इच्छुक थे। क्योंकि पोस्ट के कोट्स और उनकी तस्वीर एक दूसरे को कॉम्प्लीमेंट करती है। उन्होंने ये राज उजागर किया कि इस कार्य में वो अक्सर अपनी बेटी की राय लेते हैं और उसी पर अमल करते हैं।

इसी दौरान पुनीत भाई ने रात के खाने और सुबह के नाश्ते के मेनू के विषय में पूछा। सबकी राय ली और फिर अल्मास भाई, योगी भाई, पुनीत भाई और मैं नीचे गये। उधर खाना क्या होगा ये निर्धारित हुया। इसके ऊपर थोड़ा बातचीत हुई। शायद कैटरर भाई ने एक पर्ची पर सब लिखकर दिया था जो कि पुनीत भाई के घर में ही रह गयी थी। कैटरर भाई कह रहा था वो होता तो ज्यादा मदद मिलती क्योंकि उसी हिसाब से मेनू को निर्धारित करते। फिर भी थोड़ा बहुत बात करके नाश्ता और रात के खाने का निर्धारण हो ही गया। ये काम निपटाकर हम लोग ऊपर आ गये। ऊपर बातों का सिलसिला जारी था।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

कानपुर मीट #२: आ गये भैया कानपुर नगरीया

8th जुलाई 2017,शनिवार
#हिन्दी_ब्लॉगिंग 




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मेरे चारो तरफ सब कुछ हिलने लगा था। मुझे लगा कोई गड़गड़ाहट के साथ तेजी से मेरी तरफ बढ़ रहा था। वो इतना विशालकाय था कि मेरे तरफ बढ़ते हुए उसके कदम जमीन पर कम्पन पैदा कर रहे थे। और शायद यही मेरे हिलने का कारण भी था। तेजी से बढ़ते उसके क़दमों के साथ मुझे अपनी ह्रदय गति भी तेज होती महसूस हो रही थी। मुझे पता था इतना विशालकाय जीव मुझसे टकराएगा तो मेरे बचने की सम्भावना न के बराबर थी। मैंने उसे अपनी तरफ आता महसूस किया और टकराव के लिए दिल पक्का किया। मेरी मिंची हुई आँखें शायद ही अब खुलती। आवाज बढती गयी और साथ में कम्पन भी और मैं ये टकराया और वो टकराया। लेकिन ये क्या? एकाएक आवाज धीमी होने लगी। कम्पन घटने लगा। मेरी आँखें अभी भी बंद थी लेकिन सांसे तेज थी। ये चारो तरफ अँधेरा क्यों था? ओह याद आया। मैं तो ट्रेन में था। और ये कम्पन  इसलिए था कि बगल से ट्रेन गुजरी थी। मैंने राहत की साँस लेनी चाही लेकिन फिर मन में कुछ अन्य ख्यालों की बाड़ सी आ गयी। 

जब आपकी फटी हुई होती है तो आपका अवचेतन मन भी आपकी लेने में उतारू हो जाता है। जिसे ढाढस बांधना चाहिए वही आपकी लेने लगे तो वो अनुभव सच में विलक्षण होता है। आपने भी अनुभव किया होगा।   आप एक दिन हॉरर फिल्म देखने की योजना बनाते हैं और आपकी लग जाती है। बाथरूम जाते हुए खतरनाक ख्याल आने लगते हैं।  खिड़की से बाहर कोई मानव आकृति दिखने लगती है। हो सकता है ये हमारे अंदर बना कोई प्रोटेक्टिव मैकनिसम हो जो सदियों के एवोल्यूशन से हमारे जीन्स में हमारी सुरक्षा के लिए कोड हो गया हो लेकिन उस वक्त इतना कौन सोचता है।
बस मन मस्तिष्क को गरियाया जाता है।
ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ था
मैं अपने सपने के कारण डरा हुआ था। इसके इलावा मैं जगे होने और सोने की बीच की स्थिति में था। और अब मेरे अंतर्मन ने एक स्लाइड शो शुरू कर दिया था। उसमे खबरे चलने लगी। वो खबरे जो मैंने कुछ ही महीनों पहले देखीं थी। मैं अभी भी सोने और जागने के बीच की स्थिति में था। लेकिन मैं साफ़ देख पा रहा था कि एंकर कैसे कानपुर के निकट जाती ट्रेन के पटरी से उतरने के समाचार को दिखा रहे थे। मैं डरा हुआ था और जैसे कोई ट्रेन बगल से गुजरती मन में ये ही ख्याल आता कि अब हम उतरे अब हम उतरे। ऐसे ही कई बार हुआ और  एक ट्रेन के कारण कम्पन इतनी तेज हुआ कि झटके से मेरी आँखें खुल गयी। मैंने अपने अगल बगल देखा। मैं डरा हुआ था। घर में होता तो माँ के बगल में जाकर दुबक जाता। मुझे याद आया कि सामने की साइड लोअर बर्थ पर योगी भाई बैठे थे। अगर मैं कुछ न करता तो डरा ही रहता। मैंने योगी भाई की तरफ देखा।योगी भाई कान में हेडफोन खोंसकर फोन में कोई फिल्म देख रहे थे। मैंने उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। जब उन्होंने मेरी तरफ देखा तो मैंने मैंने उनसे पुछा कि उनका फोन चार्ज है क्या ? मैंने कहा मेरा फोन डिस्चार्ज होने वाला है और इसलिए मुझे चार्जर चाहिए थाउन्होंने अपने फोन से चार्जर निकाला और मुझे थमा दिया। मुझे अभी भी अपने शरीर से हरकत करने में दिक्कत महसूस हो रही थी। शायद डर के कारण ये हुआ था इसलिए मैंने फोन लिया और योगी भाई की तस्वीर ही खींच दी। इससे थोड़ा राहत मिली  और कुछ देर पहले के डर को मैंने अपने शरीर से निकलते हुए महसूस किया।  मैंने किसी तरह उठकर उनसे चार्जर लिया। अभी सुबह के पौने तीन बज रहे थे। सोने के एक डेढ़ घंटे में ही मेरी नींद खुल गयी थी। 


योगी भाई चार्जर देते हुए
चार्जर थामा और फोन पे लगाया तो वो चला ही नहीं। मैं फिर थोडा घबराया। लेकिन फिर हाथ को एक विशेष कोण पर घुमाया कि चार्जर चल गया और फोन चार्ज होने लगा। अब लगता था कि हाथ ऐसे ही रहेगा। मुझे इससे परेशानी नहीं होती क्योंकि मैं अभी जल्दी सोना नहीं चाहता था। और इस वजह से मुझे नींद नहीं आती।  अब मेरा फोन चार्ज होने लगा। 

फिर आधा पौने घंटे बीते होंगे कि एक जंक्शन आया टुंडला जंक्शन और उधर ट्रेन थोड़ी देर के लिए रुकी। मैं उठा और थोड़ी देर के लिए गेट के पास चला गया। डर अभी भी लग रहा था लेकिन अब वो किसी और वक्त की बात लग रही थी। मैंने टुंडला में उतर कर उसकी तस्वीर उतारी। वैसे तो मुझे पता था कि इधर अभी तो कुछ नहीं मिलेगा लेकिन फिर भी मैंने यहाँ वहां नज़र दौड़ाई कि कोई ए एच व्हीलर की दुकान हो तो कोई उपन्यास ही खरीद लूँगा लेकिन सुबह के साढ़े तीन बजे ऐसा होना मुमकिन नहीं था और ऐसा हुआ भी नहीं। 


टुण्डला जंक्शन में अपनी ट्रेन का इतंजार करते यात्री। ये भाई साहब जाने क्या सोच रहे थे। 

मैं अपने डिब्बे में आ गया क्योंकि ट्रेन चलने को तैयार थी। अब घूमकर थोड़ा मन भी हल्का हो गया था। मैंने दुबारा फोन को चार्जर पर कनेक्ट किया। अपने हाथ को फिर उसी विशेष कोण में मोड़ा और फोन को चार्ज करने लगा। 

फोन चार्ज करते करते कब दुबारा नींद आ गयी इसका पता ही नहीं लगा। 

सुबह  साढ़े पाँच-छः  बजे नींद खुली मैं थोड़ी देर ऐसे ही लेटा रहा। फिर उठ गया। मैं थोड़ा जाकर नित्यक्रिया से निवृत्त हुआ और फिर आकर बैठ गया। मैंने बैठे बैठे ही कुछ तस्वीरें खींची। 






बाहर के नज़ारे देख देखकर मैं बोर सा हो गया था। अब उजाला भी हो गया तो मैंने कुछ पढने की सोची। मैंने सफ़र के लिए अपने साथ Manhattan Noir नामक कहानी संकलन लिया हुआ था। मैंने इसकी पहली कहानी Charles Ardai की The Good Samaritan पढना शुरू किया। अगर आप लोगों ने नहीं पढ़ी है तो जरूर पढ़े। मजेदार कहानी थी। कहानी कुछ इस तरह थी। कुछ दिनों से बेघर लोग रास्तों में मरे हुए पाए जा रहे हैं। उनकी मौत जहर के कारण होती है। ये जहर उन्हें कैसे दिया जाता है और कौन दे रहा है? ये एक रहस्य है। इस केस की तहकीकात जो डिटेक्टिव कर रहा है क्या वो इसका पता लगा पायेगा? अगर हाँ तो कैसे? १८ पृष्ठों की ये कहानी मजेदार थी और इसे मैंने एक ही बैठक में पढ़ लिया। तब तक योगी भाई भी जाग चुके थे। अल्मास भाई भी जग चुके थे। मैं ब्रश करने जाने लगा तो अल्मास भाई बोले कि अरे होटल में जाकर कर लेना ब्रश। लेकिन एक कहानी पढने के बाद मैं अभी दूसरी कहानी शुरू नहीं करना चाहता था। इसलिए थोड़ा ब्रश करके ही टाइम पास हो जाता। फिर भूख लग रही थी तो ब्रश के बाद चाय और कुछ खाने का भी सोच रहा था। इसलिए भी ब्रश करना जरूरी था। 

जो ट्रेन रात को हवा से बातें करते हुए चल रही थी वो ट्रेन सुबह घोंघे के समान आगे बढ़ रही थी। हमे यकीन था कि हमे लेट होगी और वही हुआ भी

खैर, जब सब उठ गये तो फिर चाय और बिस्कुट खाने का प्लान बनाया। मैं कुछ तेल वाला नहीं खाना चाहता था इसलिए बिस्कुट से काम चलाना चाह रहा था।  रात को खाया नहीं था तो अब भूख के मारे हालत डाउन हो रही थी। जो अल्मास भाई मुझे होटल में ब्रश करने की सलाह देते पाए गये थे वही चाय बिस्कुट देखकर अपना मन नहीं रोक पाए। उन्हें भी भूख लगने लगी तो उन्होंने भी ब्रश वगेरह निकाल दिया। ये देखकर मुझे हंसी आ गयी। बच्चू मुझे कह रहे थे कि होटल में जाकर करना ब्रश और अब खुद करने जा रहे थे। हा हा। वो ब्रश करके आये और उन्होंने नाश्ते के लिए कुछ सामान ले लिए। साथ में बिस्कुट तो थे ही तो हमने चाय ली और उनपर टूट पड़े।अब कानपुर आने तक चाय और बिस्कुट का ही दौर चलाना था। ट्रेन अपनी गति से आगे बढ़ रही थी

ऐसे ही एक जगह ट्रेन रुक गयी तो अल्मास भाई बोले - 'विकास भाई तुम्हारे यात्रा वृतांत के लिए एक मस्त चीज दिखाता हूँ'
मैं - 'ऐसा क्या करतब कर रहे हो?'
अल्मास भाई - 'अरे देखो तो सही! आओ मेरे साथ' और ये कहकर वो गेट की तरफ बढ़ गये। ट्रेन रुकी हुई थी। सामने हरे भरे खेत दिख रहे थे। वो गेट पर रुके और फिर नीचे उतर गये। नीचे उतारकर उन्होंने एक सिगरेट जला लिया और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराने लगे
'बोलो कैसी रही?'
मैने कहा - 'क्या?'
अल्मास भाई- 'देखो हम चलती ट्रेन से उतरकर सिगरेट पी रहे हैं और चलती ट्रेन में वापस चलेंगे'
मैंने अपने कंधे उचका दिया। ट्रेन रुकी हुई थी। अल्मास भाई को कैसे चलते हुए महसूस हुई ये नहीं कह सकता। लेकिन ट्रेन कभी भी चल सकती थी इसलिए मैं उन्हें ऊपर आने के लिए कह रहा था। उन्होंने उधर दो तीन पफ मारे और फिर जब ट्रेन हिलने डुलने लगी तो चढ़ गये। मैं उन्हें हैरानी से देखता रहा। 'चलो अब चाय पीते हैं', मैंने कहा और योगी भाई की तरफ बढ़ गये। ट्रेन आगे बढ़ गयी। 


नाश्ते से पहले ब्रश पे पेस्ट लगाते अल्मास भाई। जब मैं ब्रश कर रहा था तो अल्मास भाई मुझे कह रहे थे कि होटल में कर लिया होता लेकिन जब पेट के चूहे बेकाबू हो गये तो खुद भी पेस्ट करने लगे। 😝😝😝😝

अब ट्रेन कानपुर पहुँचने वाली थी। आधा एक घंटा और रहा होगा कि एक जगह फिर रुक गयी। रेल की पटरी के सामने ही एक गाँव था। उसके सामने एक गन्दा सा नाला था जिसकी गंदगी देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो मच्छरों का स्वर्ग हो।मैंने इस बाबत टिपण्णी भी की। मैं उधर देख ही रहा था कि एक बच्चा एक नेत्रहीन बुर्जुग को लेकर पटरी पर चल रहा था और खिड़की वालों से पैसे की गुहार लगा रहा था। उसके कुछ ही देर बाद गाँव से दो तीन बच्चे और निकले और उनके साथ कुछ और बुजुर्ग दिव्यांग थे और वो रुकी हुई ट्रेन के सामने चलते चलते भीख मांगने लगे।कुछ तो ये तक कह रहे थे कि हम मांग रहे हैं तो नहीं दे रहे हो और अगर हिंजड़े  मांगते तो फट से 10-20 रूपये दे देते। मुझे ये सुनकर हैरानी हुई। ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें भीख न देकर हम उनका हक़ मांग रहे हैं। ऐसा क्यों था? ये मेरे समझ के परे था। जब मुंबई में काम करता था तो उधर मेरा दफ्तर गेटवे ऑफ़ इंडिया के बगल में वाइट पर्ल होटल के नज़दीक था।उधर कई अरबी लोग आते थे और इसीलिए कई भिखारी भी घूमते रहते थे। एक बार मैं ऐसे ही खड़ा था और एक बच्चा भिखारी एक महीला से भीख मांग रहा था। वो परेशान दिख रही थी और उसे मना कर रही थी। वो अरबी महिला थी। ऐसे में उसकी नज़र मेरे से मिली और शायद उसमे उसने सहानुभूति देखी तो मुस्कुरा कर बोला- 'ये लोग परेशान कर देते हैं। ' मैंने भी कंधे उचका कर कहा कि क्या किया जा सकता है। यानी कहीं भी हो भिखारी चारों तरफ है और इधर तो गाँव में ही ये मौजूद थे और ये शायद इनका पेशा भी था। थोड़ी ही देर में ट्रेन चलने लगी तो ये विचित्र गाँव पीछे छूट गया

हम फिर कानपुर की तरफ बढ़ने लगे।पुनीत भाई से फोन में बात हो गयी थी और वो हमे लेने आने वाले थे। उन्होंने हमे बताया कि नवल जी भी सुबह ही आने वाले हैं और उनकी ट्रेन के आने का वक्त हमारे ट्रेन के वक्त नजदीक है। हम खुश हुए। नवल जी से पहली बार माउंट आबू में मिला था। बड़े मिलनसार और खुश मिजाज व्यक्ति हैं। हाँ, उन्होंने मुझे कई बार बोला था कि तुम कम बोलते हो और मैंने भी हामी में मुंडी हिला दी थी। अब क्या कर सकते हैं? कोई कम बोलता है कोई ज्यादा बोलता है। सबकी अपनी प्रकृति है। 

हमने फिर चाय पी और बिस्कुट लिए। ट्रेन को ज्यादा देर हो गयी थी। हमे शायद साढ़े छः  बजे कानपुर पहुँच जाना चाहिए था लेकिन पौने आठ हो गये थे। हम कानपुर में आ गये थे।आजकल कानपुर सुनता हूँ तो भाभी जी घर पे हैं के किरदार मन में घूमने लगते हैं। उस वक्त भी लग रहा था कि रेलवे स्टेशन से निकलूंगा तो कोई हप्पू सिंह जैसे व्यक्ति हमे दिख जाएगा। लेकिन ये सब ख्याली पुलाव हैं। मुझे पता था। हमारी ट्रेन रुकी और हम प्लेटफार्म नंबर छः पर उतरे। 

हम पुनीत भाई को फोन मिलाने वाले थे कि योगी भाई ने ओवरब्रिज से आती सीढ़ियों की तरफ इशारा करके बोला कि वो रहे पुनीत भाई।हमे लगा मज़ाक कर रहे हैं लेकिन सच में साक्षात पुनीत भाई थे। मुझे लगा रात के लिए झिडकी न पड़े कहीं। रात के भागा दौड़ी में हमने उन्हें काफी परेशान किया था। लेकिन उन्होंने प्यार से सबको गले लगाया। और फिर हम बाहर को निकलने के लिए ओवरब्रिज की ओर बढ़ने लगे। हम बाहर निकलने के लिए ओवर ब्रिज से उतरे और प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुंचे। उधर एक किताबों की रेड़ी सी दिखी तो थोड़ी देर उधर खड़े हो गये उधर ही नवल जी और आजादभारती जी मिले। आज़ाद भारती जी पाठक साहब के सबसे बुजुर्ग फेन और उनके मित्र भी हैं। मैं उनसे पहले भी दिल्ली में एक पुस्तक मेले में मिल गया था। दुबारा उनसे मिले तो अच्छा लगा।  किताबों की रेहड़ी में मुझे कुछ भी रुचिकर नहीं दिखा तो मैंने नहीं लिया। 

अब चाय पीने की तलब लग रही थी। ट्रेन की चाय तो गर्म पानी से थोड़ी ही बेहतर होती है इसलिए एक अच्छी चाय पीना चाहता था। ये बात पुनीत भाई से कही तो उन्होंने कहा कि स्टेशन से बाहर निकलकर पीते हैं। हम बाहर आये। स्टेशन की फोटो ली और अल्मास भाई ने सबके साथ एक सेल्फी ली। 


कानपूर सेंट्रल के बाहर सेल्फी: अल्मास भाई, नवल जी, मैं , योगी भाई, आज़ाद भारती जी और पुनीत भाई 

फिर हम कार में बैठ गये। कार मैं बैठकर ये निर्णय लिया कि अब सीधे होटल की तरफ ही बढ़ा जायेगा और उधर ही चाय का इतंजाम होगा। हमारे दूसरे आयोजक अंकुर भाई उधर ही हमारा इन्तजार कर रहे थे। उनसे भी पहली बार मिलना होगा। फिर हमारी कार होटल की तरफ चल निकली। उधर कुछ और एसएमपीयंस आने वाले थे। मैं उनसे मिलने के लिए उत्सुक था। ये अनुभव कैसा होगा? कौन कौन आएगा? आगे क्या होगा? हम किधर किधर जायेंगे? यही सब प्रश्न मेरे मन में उठ रहे थे। अब तो बस उधर पहुँचने का इंतजार था। 

क्रमशः
कानपुर मीट की कड़ियाँ :
कानपुर मीट #१:शुक्रवार - स्टेशन रे स्टेशन बहुते कंफ्यूज़न
कानपुर मीट #२: आ गये भैया कानपुर नगरीया
कानपुर मीट #3: होटल में पदार्पण, एसएमपियंस से भेंट और ब्रह्मावर्त घाट
कानपूर मीट #4
कानपुर मीट # 5 : शाम की महफ़िल

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

कानपुर मीट #१:शुक्रवार - स्टेशन रे स्टेशन बहुते कंफ्यूज़न

7 जुलाई 2017, शुक्रवार 

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

माउंट आबू की मीट की सफलता के बाद अब नई मीट की तैयारियाँ चल रही थी।  जो मीट निर्धारित की गई थी उसे दिसंबर में होना था। यानी लगभग पाँच साढ़े पांच महीने के बाद। मेरे लिए वक्त बहुत ज्यादा था। वैसे माउंट आबू के बाद मैं छोटी छोटी तीन यात्राएं कर चुका था। और इन साढ़े पाँच महीनों में भी ऐसी कई यात्राओं का प्लान था। लेकिन ये यात्रायें एस एम पी मीट से जुदा रहती हैं। ये खालिस घुमक्कड़ी थी जबकि एस एम पी मीट में घुमक्कड़ी के साथ पाठक साहब के जिंदादिल फैंस से मिलने का तड़का भी होता है। ये अलग तरीके का नशा है। ऐसे में जब रांची मीट की बात चल रही थी तो मैं कान खड़े करके चुपचाप उस पर नज़र गड़ाये हुए था। लेकिन जब ये प्लान ठंडे बस्ते में जाता महसूस हुआ तो लगा खुराक अब दिसंबर में ही मिल पायेगी।मन दुखी था। ऐसे में दुःखहर्ता के रूप में एक मैसेज मुझे व्हाट्स एप्प में दिखा। कानपुर में मौजूद हमारे पर्सनल फनकार पुनीत दुबे जिन्हें प्यार से पी के डूबे की पदवी दी गयी है ने एक मैसेज डाला। उसके अनुसार वो एक छोटी सी गेट टुगेदर का आयोजन करने वाले थे और  इसमें शामिल होने के लिए हर कोई आज़ाद था। मैंने सोचा मैं कानपुर साइड तो कभी गया नहीं हूँ। ऐसे में उधर जाने का अच्छा मौका है और ऊपर से एसएमपी के नये प्रशंसकों से  मिलने का मौका मिलेगा। मेरी तो बांछे खिल गयी। मैंने  तुरन्त हामी भर दी।

अब देखना ये था कि किस तरह कानपूर जाया जायेगा। जो निर्धारित नाम थे उनमे योगेश्वर भाई का भी नाम था। तो मैंने सोचा उन्हें ही कॉल लगाया जाए। उन्होंने कहा वो टिकेट बुक कर देंगे। मैं खुश। मैंने अब तक आईआरसीटीसी से केवल एक ही बार टिकेट बुक किया था इसलिए मैं थोडा कतरा रहा था। उन्होंने टिकेट बुक किया तो उसमे वेटिंग चल रहा था। मैंने कहा मैं अपनी ओर से कोशिश करता हूँ और अपने साइड से देखा तो मुझे टिकेट मिल गये। मैंने दो टिकेट बुक करवा लिए। जो सूची बनी थी उसमे चूँकि दिल्ली के किसी ओर से हामी नहीं भरी थी तो मैंने किसी और से पूछा भी नहीं। अल्मास भाई के विषय में मैंने सोचा उन्होंने पहले ही टिकेट करवा दी होगी। अब अंग्रेजी की एक कह्वात है न कि assume makes an ass out of you and me, बस यही मेरे साथ भी होगा। मैंने पहले से ही सोच लिया था लेकिन कुछ दिनों बाद जब अल्मास भाई का कॉल आया तो पता चला उन्होंने ऐसा कुछ नहीं करवाया था। अब मैं गधा तो बन ही चुका था लेकिन अपनी गलती सुधारने को भी तत्पर था। फिर बात ऐसी हुई की उनका टिकेट भी मुझे ही करवाने का मौका मिला और ऐसे मैंने अपने पापों का प्रायश्चित किया।

शनिवार, 22 जुलाई 2017

गुडगाँव से नॉएडा,नोएडा से रानी माजरा और वापसी : बाइक यात्रा

23 जून 2017 से  25 जून,2017
हरिद्वार लस्कर बाईपास पर कहीं 
कई दिनों से अश्विन भाई मुझे अपने गाँव आने का निमंत्रण दे रहे थे लेकिन कुछ न कुछ हो जाता था और योजना को रद्द करना पड़ जाता था। पिछले हफ्ते भी ऐसा ही हुआ था। उस वक्त उनका तो टिकट हो गया था लेकिन मेरा नहीं हुआ था। लेकिन फिर भी मैं जैसे तैसे जाने के पक्ष में लेकिन कुछ ऐसा हो गया कि हम जा न पाए और फिर अंत में रविवार को दिल्ली में ही भ्रमण किया। उंसके विषय में जानने के लिए इधर क्लिक करें।

अब 22 जून की बात है कि अश्विन  भाई का दोबारा व्हाट्सएप्प आया। उन्होंने कहा इस बार चलना है क्या? मैं तो राजी था। मैंने मन बना लिया था कि कहीं नहीं तो नीलकंठ महादेव तक की जंगल ट्रेक को अंजाम दे ही दूँगा। जब अश्विन भाई ने पूछा तो सोचा कि चलो बढ़िया है। शनिवार को उनके घर रुक लेंगे और रविवार को ऋषिकेष चल लेंगे। उनसे ये बात की तो वो भी इसके लिए राजी हो गये।

अब ये देखना था कि कैसे जाया जायेगा। अश्विन भाई से मैंने सब टिकट करने के लिए कहा। उन्होंने कोशिश की लेकिन कुछ भी नहीं बन पाया। फिर सोमवार को ईद थी  और इस वजह से हरिद्वार वाला रूट काफी बिजी रहने वाला था। अश्विन भाई ने खुद भी और अपने भाई  के द्वारा भी काफी कोशिश करवाई लेकिन कुछ नहीं हुआ। उन्होंने फोन पर मुझे बताया तो मैंने कहा कि क्या बाइक से जाया जा सकता है? मुझे मालूम था कि अश्विन भाई के पास बाइक थी। उन्होंने ये बात जँच गयी। लेकिन अभी भी इसमें परेशानी थी वो ये कि उनकी बाइक में ट्यूब वाले टायर थे जिनके पंक्चर होने की संभावना ज्यादा रहती है। अगर ऐसा हो जाता तो बीच में परेशानी उठानी पड़ती। इसलिए उन्होंने कहा कि वो ऐसी गाड़ी का इंतजाम करते हैं जिसमे ट्यूबलेस टायर्स हों।मैने कहा अश्विन भाई परेशानी की तो एक और बात है वो ये कि मुझे गाड़ी चलानी नहीं आती। उन्होंने दिलासा दिया कि इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी। फिर क्या था अब एक खाका तैयार हो चुका था। हमे उसी हिसाब से चलना था।  

मुझे शुक्रवार को सीधे अश्विन भाई के रूम पे जाना था जहां से हम शनिवार सुबह जल्द से जल्द निकल पड़ते। मैं खुश था चलो एक बाइक यात्रा तो होगी। कुछ देर बाद अश्विन भाई का दोबारा कॉल आ गया कि बाइक का इंतजाम हो गया है। अब बस शुक्रवार का इंतजार था जब यात्रा शुरू करनी थी।

शुक्रवार की सुबह मुझे शेव बनानी थी लेकिन मैंने इस काम को शाम तक के लिए मुल्तवी कर दिया था। मेरी योजना ये थी मैं अभी ऑफिस चले जाऊँगा और फिर उधर से आकर थोड़ी एक्सरसाइज करके और तब अश्विन भाई के घर के लिए निकलूँगा। मैं छः बजे करीब तक वैसे भी रूम में आ  ही जाता हूँ। मैंने जाने के लिए सारा सामान इकट्ठा कर लिया था तो पैकिंग की कोई टेंशन नहीं थी। 

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

क़ुतुब मीनार : अश्विन भाई के साथ

रविवार 18 जून,2017



ऐसा नहीं है कि मैं क़ुतुब मीनार पहले नहीं गया हूँ। लेकिन मेरा मानना है जिस प्रकार आप एक किताब को दूसरी बार नहीं पढ़ सकते, क्योंकि एक बार पढ़ने के बाद आपके अवचेतन मन मे वो काफी कुछ बदल देती है, उसी प्रकार आप एक जगह दूसरी बार नहीं जा सकते। पढ़ना तो फिर भी ऐसी गतिविधि है जहां आप अकेले उस अनुभव को लेते हैं इसके बनिस्पत घूमने में कई वेरिएबल्स होते हैं। आप अगर कहीं दोबारा जाते है तो पाएंगे जिस वक्फे में आप उससे दूर रहे स् वक्फे में आपके और उस जगह के अंदर काफी कुछ जुड़-घट गया होता है। अगर ये वृद्धि  प्राकृतिक संपदा में होती है तो मन मे खुशी की लहर उठती है लेकिन अक्सर जब ऐसा नहीं होता और मौजूदा प्राकृतिक संपदा में आप कुछ घटाव महसूस करते हैं तो मन दुखी हो जाता है। जगह के इलावा आप किसके साथ उस जगह को देखने गए थे ये भी आपके घूमने के अनुभव को अलग बनाता है। कहने का लब्बोलबाब ये हुआ कि मेरी समझ में एक जगह को दूसरी बार देखना नामुमकिन है। एक बार डॉन, जिसकी तलाश सोलह मुल्कों की पुलिस को है, पकड़ में आ सकता है लेकिन आप दोबारा उसी जगह पहुँचे ये नहीं हो सकता। आप इस विषय में क्या सोचते हैं? मुझे बताईयेगा। 

अब आते हैं वृत्तान्त पर।

मेरा अश्विन भाई के साथ उनके गाँव जाने का प्लान काफी दिनों से चल रहा था। हमेशा सप्ताहंत का प्रोग्राम बनता था और उस वक्त ऐसा कुछ न कुछ हो जाता था  कि प्रोग्राम कैंसल करना पड़ता था। इस  सप्ताहंत भी ऐसा ही हुआ। मैंने इस  हफ्ते की शुरुआत में ही अश्विन भाई को बता दिया था कि इस हफ्ते कुछ भी हो मैं उनके साथ चलूँगा। मेरे तरफ से प्रोग्राम कैंसिल नहीं होगा। फिर गुरूवार की सुबह को मुझे किसी काम के लिए इंदौर को निकलना पड़ा। लेकिन मेरी वापसी उसी दिन की थी तो शुक्रवार की मुझे कोई दिक्कत नहीं थी। वैसे एक बात पहले ही हो चुकी थी। अश्विन भाई की टिकेट बुक हो चुकी थी। मेरा ख्याल उनके दिमाग से निकल गया था क्योकि उनकी टिकेट किसी और ने करवाई थी। जब मैंने उनसे बात की तो हमने यही निर्णय लिया कि मैं जनरल का टिकेट लेकर स्लीपर में चढ़ जाऊँगा और फिर फाइन दे दूंगा। उनकी तो सीट हो ही रखी थी तो बैठने में कोई परेशानी नहीं होती। अब मुझे शुक्रवार का इन्तजार था। 

शुक्रवार आया और मुझे थोड़ा आलस आने लगा। मन में आ रहा था कि प्रोग्राम कैंसिल कर दूँ। लेकिन फिर ऐसा हर यात्रा के वक्त होता है लेकिन इस आलस को पार करके यात्रा पे निकलो तो मज़ा दोगुना हो जाता है।  इसलिए  मैंने अपने तरफ से प्लान कन्फर्म ही रखा। 

लेकिन  होनी को कुछ और ही मंजूर था। शुक्रवार का प्लान कैंसिल हुआ क्योंकि अश्विन भाई को जरूरी काम आ गया था। इसके बाद योजना शनिवार के सुबह जाने की बनी लेकिन  आखिरकार उसे भी मुल्तवी ही करना पड़ा। अब मेरे पास शनिवार खाली था तो मैंने इसमें कपड़े वगेरह निपटाए और अपनी चोटिल कमर को आराम दिया। जब प्रोग्राम कैंसिल हो रहा था तो अश्विन भाई ने पूछा कि सप्ताहंत में क्या करोगे तो मैंने बता दिया था कि यही दिल्ली में ही कहीं घूम लूँगा। तो उन्होंने भी साथ में आने के विषय में बोला। तो मैंने कहा कि चलो आप जिधर रहते हो उधर के ही आसपास ही घूमने जाते हैं। मैंने अक्षरधाम मंदिर नहीं देखा था तो सोचा उधर ही घूमा जाएगा। उन्होंने भी इसे नहीं देखा था तो उन्होंने भी इधर जाने की हामी भर दी। तो अब ये तय था कि रविवार कि कहीं न कहीं तो जाया जायेगा। 

रविवार की सुबह को मेरी आँख सात - साढ़े सात बजे ही खुली। मैंने चाय वगेरह बनाई और ब्लॉग पोस्टस पे काम करने लगा। नौ बजे करीब तक मैं चाय की चुस्की लेता जा रहा था और ब्लॉग पे काम कर रहा था। इसी दौरान उन्हें सन्देश भेजा कि कब चलोगे अक्षरधाम। मेरा मन शाम को जाने का था। लेकिन उनका जवाब आया कि एक दो घंटे में चलते हैं। मैं थोड़ा हड़बड़ा गया। मैंने चाय का कप किनारे रखा और उनसे कहा कि अभी तो उठकर खाली चाय का दौर चल रहा है। तो उन्होंने कहा एक दो घंटे तो हैं नाश्ता कर लो और मिल लो। मैंने देखा नौ बज रहे थे तो सोचा कि ग्यारह बजे करीब इधर से निकलूँगा। यही बात मैंने उन्हें बताई।  पोस्ट जितनी लिखी थी उतनी लिखी और उसे सेव किया। फिर नाश्ता बनाने में जुट गया। नाश्ते में अंडे के भुर्जी और चाय करने की सोची। उसकी तैयारी की और नहाने चला गया। नहाने जाने से पहले चाय का पानी उबालने के लिए छोड़ गया। नहाकर आया तो चाय उबल चुकी थी। उसे किनारे रखा और  फिर भुर्जी बनाई।  भुर्जी तैयार थी तो अब दोबारा चाय का पहले से उबला पानी चढ़ाया तो दो मिनट में वो भी तैयार। (जब एक चूल्हे वाला इंडक्शन हो तो ऐसे ही काम करना पड़ता है।) अब चाय और भुर्जी से पेट भरा। तब तक ग्यारह बज गये थे। मैं निकल रहा था। उस वक्त मेरे फ़ोन में नेट भी एक्टिवेट नहीं था। मैं अपने पीजी के वाईफाई से एक्टिव था। मैंने अश्विन भाई को बोला कि मैं निकल रहा हूँ और चूँकि नेट एक्टिव नहीं है तो समय समय पर कॉल करता रहूँगा। उन्होंने कहा ठीक है। 

गुरूवार को मौसम थोड़ा ठंडा  हुआ था तो उम्मीद कर रहा था कि गर्मी कम होगी और मौसम में यही ठंड बरक़रार रहेगी। जब निकला था तो हल्की सी बदली थी लेकिन  ऐसा लग ही रहा था कि वो सूरज महाशय को ज्यादा देर तक छुपाकर नहीं रख सकेगी। क्योंकि गर्मी बढ़ने लगी थी।  लेकिन उम्मीद फिर भी थी। उम्मीद करने में क्या जाता है। ऑटो से बैठकर मैं एम जी मेट्रो बैठा। फिर प्लेटफार्म पर चढ़ा और अश्विन भाई को कॉल किया। उन्हें कॉल करके बताया कि मेट्रो में हूँ और राजीव चौक पहुँच कर कॉल करता हूँ। पहले मैं केन्द्रीय सचिवालय उतरना चाहता था लेकिन उन्होंने ही सलाह दी कि दो तीन ट्रेन बदलोगे तो उतना ही वक्त लग जायेगा। मेरे को ये बात जची और मैंने इस पर अमल करने की सोची। 

अब मैं ट्रेन में चढ़ चुका था। ट्रेन की एसी शरीर को राहत दे रही थी। मैंने अपना किंडल निकला और रेजीना बेथोरी का लघु उपन्यास लाजलो खोल दिया। मैं बहुत दिनों से इसे पढने की सोच रहा था तो सोचा इस सफ़र में इस इच्छा को पूरी करूँ। नोएल, किम और बेन तीन दोस्त हैं जो कि रोड ट्रिप पर निकले थे। कुछ दिनों में किम का जन्मदिन था और उसके दोस्तों ने उसके लिए कुछ सरप्राइज पार्टी प्लान करी थी। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। मैं उनके साथ उनके सफ़र में शरीक था इसलिए मुझे पता ही नहीं लगा कि कब राजीव चौक आ
गया। मैंने उनकी कहानी को थोड़ा पॉज दिया और राजीव चौक में उतरा। मैं ऊपर चढ़ा और नॉएडा की तरफ जाने वाली मेट्रो का इन्तजार करने लगा। मैंने उन्हें 11:32 को कॉल करी होगी। जब रूम से निकला था तो उन्होंने बता दिया था कि वो पैतालीस मिनट में अक्षरधाम पहुँच जाएँगे। मेरे को तो वक्त लगना था। मैं 12:24 के करीब राजीव चौक था और मैंने उन्हें इस विषय में फोन करके इत्तला कर दी। मैंने कहा मैं दस पन्द्रह मिनट में ही अक्षरधाम में होऊंगा। उन्होंने भी कहा कि वो उस वक्त तक पहुँच जायेंगे। 

इतने में मेट्रो आई और मैं उस पर चढ़ गया। मैंने अपनी किताब दोबारा खोल दी। कथानक तेज रफ़्तार से भाग रहा था। नोएल, किम और बेन एक घर में घुसे थे जो बाहर से तो खाली दिख रहा था लेकिन उसके अन्दर कोई था। उधर उन्हें कई ऐसी चीजें भी मिली थी जिससे ऐसा लगता था जैसे उधर काले जादू का प्रयोग किया जा रहा था। मैं इसी में खोया हुआ था कि अक्षरधाम भी आ गया। अक्षरधाम से पहले एक रुचिकर वाक्या हुआ। उधर एक परिवार था जिसमे औरतों की संख्या ज्यादा थी। उन्हें उससे एक स्टेशन पहले उतरना था लेकिन वो इतने अन्दर बैठे हुए थे कि जब तक दरवाजे तक पहुचंते तब तक दरवाजा बंद हो गया था। वो घबराए न इसलिए उन्हें सलाह दी कि अगले में उतर जाओ और वापस इधर की तरफ आ जाओ। उनके चेहरे से चिंता की लकीरे गायब हो चुकी थी। अक्सर भीड़ भाड़ में स्टेशन छूट जाए तो आदमी बड़ा चिंतित हो जाता है। ऐसे लगता है जाने क्या हो गया। जबकि ये उतनी बड़ी बात भी नही होती।  वो अगले स्टेशन यानी अक्षरधाम का इन्तजार करने लगे।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

माउंट आबू मीट #9: होटल भाग्यलक्ष्मी और वापसी के ट्रेन का सफ़र


इस यात्रा वृत्तांत को शुरू से पढ़ने के लिए इधर क्लिक करें।  #हिन्दी_ब्लॉगिंग

यात्रा 21 मई 2017,रविवार की है

इवेंट के फेसबुक पेज से साभार 

दिलवाड़ा मंदिर समूह देखने के बाद दाल बाटी की पार्टी भी हो गयी। माउंट आबू में हमारा सफ़र अब खत्म हो चुका था।(इस विषय में पढने के लिए इधर क्लिक करें। )

अब हमारी अगली मंजिल होटल भाग्यलक्ष्मी थी। इधर नवल जी का रूम था। उनकी उदयपुर से फ्लाइट अगले दिन की थी इसलिए आज वो इधर रुकने वाले थे। हम इधर कुछ वक्त बिताना चाहते थे। इधर हमे एक और संपियन और उभरते लेखक  अमित श्रीवास्तव् जी मिलने आने वाले थे। उनका उपन्यास फरेब जल्द ही आने वाला है। वो नज़दीक में रहते थे और बाकी लोग उनसे पहले ही मिल चुके थे। अब चूँकि हमारी वापसी थी तो फिर मिलने का प्रोग्राम था।

हम गाड़ी से निकले तो कुलदीप भाई ने बोला उनकी थोड़ी तबियत सी ख़राब हो रही है। ये दिन भर गर्मी में घूमने के बाद एकदम से पूल में डुबकी लगाने का नतीजा था। लेकिन  अब क्या कर सकते थे ? एक ही काम था कि जब तक भाग्यलक्ष्मी पहुँचते तब तक वो आराम कर लेते। यही उन्होंने किया भी।

हम होटल भाग्यलक्ष्मी पहुँचे। हमने जो गाड़ी बुक की थी उनका काम हमे यहाँ तक छोड़ना था। इधर आकर हम लोग बैठ गये और बात चीत और चाय का दौर चला। कुछ चर्चा पॉलिटिक्स और कुछ ऐसे ही चलती रही। पॉलिटिक्स के ऊपर बात करते करते समूह दो धडो में बंट गया। चर्चा गर्मागर्म हो रही थी और मज़ा आ रहा था। मैंने थोड़ी देर चर्चा पे ध्यान दिया फिर  मुझे होटल के सामने पहाड़ी पर एक मंदिर नुमा जगह दिखी। मैंने राकेश भाई से उधर चलने के लिए कहा लेकिन अब वो भी थक चुके थे। उन्होंने अपनी असमर्थता जताई। मैं भी इतना तरो ताज़ा महसूस नहीं कर रहा था इसलिए मैंने भी उधर जाने का विचार त्याग दिया। आज के लिए वैसे भी काफी घुमक्कड़ी हो गयी थी। फिर अभी हमारे सामने वापस जाने के का भी सवाल खड़ा था।  हम लोगों की टिकेट कन्फर्म नहीं हुई थी।अभी कुलदीप भाई, योगी भाई और मेरे बीच इसको लेकर मंत्रणा हो रही थी। हमे पता चला कि नज़दीक ही बस स्टैंड है और उधर जाकर जयपुर जाने की बस का पता किया जा सकता है। जयपुर से दिल्ली तक आसानी से जाया जा सकता है। योगी भाई ने पहले मुझे जाने को कहा लेकिन ऐसी बातचीत का मुझे इतना अनुभव नहीं है। मैंने उनसे कहा तो उन्होंने खुद जाने के लिए हामी भर दी। फिर बस की बात चीत करने के लिए योगी भाई और राकेश भाई गये थे। वो वापस आये तो उन्होंने बताया कि बस का प्रोग्राम कैंसिल करना होगा। क्योंकि एक तो किराया अत्यधिक था और ऊपर से सफ़र भी तकलीफदेह होता। पहले बस से जयपुर जाओ और फिर दिल्ली का कुछ पकड़ो।  इसी दौरान हमारे साथ एक और साथी हो गये थे। ठाकुर महेश जी की टिकेट भी कैंसिल हो गयी थी। अब हम वापस जाने वाले छः थे। हसन अल्मास भाई, दीपक भाई, कुल्दीप भाई, योगी भाई, ठाकुर महेश जी और मैं। इनमे से खाली योगी भाई की ही टिकेट कन्फर्म हो पायी थी।  अब प्लान ये था कि स्टेशन पहुंचेंगे और जो होगा देख लेंगे। फिर दुबारा चाय का दौर चला। कुछ लोग नीचे चाय पी रहे थे और कुछ लोग ऊपर नवल भाई के रूम में थे। उधर फोन वगेरह चार्ज करने की व्यवस्था थी।

इतने में अमित भाई भी आ गये थे। उनसे मुलाक़ात हुई। उनसे ऊपर दिखने वाली जगह के विषय में जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि वो पिकनिक स्पॉट सा बन गया है। कई लोग उधर जाते हैं और पार्टी वगेरह भी उधर होती रहती थी। इसके बाद फोटोग्राफी का सेशन हुआ।

फोटो सैंडी भाई ने ली थी और खुद को स्लेटी करने का आईडिया उनका ही है। 

एक सेल्फी तो बनती थी। शिव भाई ने ये कमी पूरी कर दी। 


 इसके बाद विदाई कार्यक्रम चालू हुआ।  पहले शिव भाई , विद्याधर भाई और उनके साथ आये लोग विदा हुए। इसके थोड़े देर बाद संदीप भाई और राकेश भाई भी विदा हो गये। उन्होंने बाइक में जाना था। संदीप भाई को मुंबई जाना था तो उनका सफर हेक्टिक होने वाला था। सबने उन्हें आराम से बाइक चलाने की हिदायत दी। ये भी बोला गया कि ज्यादा नींद आये तो ढाबे में सो लेना। संदीप  भाई एक अनुभवी घुमक्कड़ हैं। उन्हें ये बातें तो पता होंगी ही। खैर, फिर थोड़ी देर में वो भी चले गये।

अब हम कुछ लोग ही बचे थे। जिनमे गुरूजी, जीपी सर, अमीर सिंह जी, वीर नारायण जी,पुनीत जी,संदीप अग्रवाल जी  और हम छः  जिन्होंने साथ जाना था। अमित जी थोड़ी देर के कहीं चले गये थे लेकिन वापस आये तो साथ में पकोड़ी लेकर आये। हमने थोडा थोडा खाया और फिर कुछ पकोड़ीयाँ नवल जी के रूम में भिजवाने को कहा। अमित भाई को उनसे बात करनी थी तो वो उधर लेकर चले गये। थोड़े देर ऐसे ही गप्पों का दौर चला। अब बाकियों की ट्रेन का वक्त हो गया था।  हम काफी लोग थे तो निर्णय ये हुआ कि एक ऑटो वाले भाई  गुरु जी और अन्य लोगों को लेकर जायेंगे और फिर हमे लेने वापस आयेंगे। हमारे ट्रेन में तो वक्त था। गुरु जी और अन्य लोगों की ट्रेन जाने वाली थी। इसलिए पहले चक्कर में गुरूजी, जीपी जी, अमीर सिंह जी, वीर नारायण जी,संदीप अग्रवाल जी  और अल्मास भाई निकल लिए। मैं उसके बाद नवल जी के रूम के  तरफ बढ़ चला। नीचे कुछ लोग सामान के पास बैठे हए थे। रूम में माहौल जमा हुआ था। ऐसे में सामान बाहर रखना उचित नहीं था तो मैंने अपना फोन चार्ज पे लगाया और नीचे से सामान ले आया। नीचे बैठे लोगों को भी ऊपर आने को कह दिया। मैं  वापस आया तो बाकियों का खाने का प्लान बन चुका था।  उन्होंने मुझे खाने के लिए पूछा तो मैंने मना कर दिया। पहले ही बहुत हो गया था और अब कुछ और खाने की उम्मीद नहीं थी। पुनीत भाई की ट्रेन का वक्त भी नज़दीक आ रहा था तो उन्हें यही बोला कि जल्दी जल्दी निपटा लो। लेकिन खाना आने में देर हो रही थी। होटल वाले से बात की तो पता चला और देर होगी तो ये निर्णय हुआ कि खाना रूम में लाने की बजाय नीचे बने रेस्तरां में ही मंगवाया जाए। यही किया गया और हम नीचे पहुंचे। उधर जब तक खाना आता तब तक ऑटो वाले के विषय में पूछा। अमित भाई ने पता कि तो पता लगा कि वो आ रहा है। इतने में खाना भी खाया गया। अब सब जल्दी जल्दी हो रहा था। जल्दबाजी में खाने का आर्डर जयादा हो गया था तो उसमें से कुछ  नवल जी से पूछकर ऊपर उनके रूम में भिजवाया और कुछ बाकी  लोगों ने खाया। फिर खाना पीना निपटाकर हमने अपना सामान लिया और ऑटो का इन्तजार करने लगे।

ऑटो वाला आया और उसमें सामान रखा गया और हम उसमे एडजस्ट हो गये। हमे जल्द से जल्द पहुंचना था। पुनीत भाई की ट्रेन को आने में दस पंद्रह मिनट ही रह गये थे। अब ऑटो स्टेशन की तरफ बढ़ चला था। जैसे जैसे घड़ी निर्धारित वक्त की और बढ़ रही थी वैसे वैसे ऑटो की गति हमें कम होती लग रही थी। क्या पता हम वक्त पे स्टेशन पहुँच पाते या नही ? हमारा तो खैर कोई नुक्सान नहीं होता लेकिन पुनीत भाई की ट्रेन तो कन्फर्म थी। ऐसे में हमारा वक्त पर पहुँचना जरूरी था। ऑटो की गति को देखकर तो लग रहा था कि वक्त के साथ हो रही ये रेस हम  हार जायेंगे। लेकिन ऑटो वाला भाई अनुभवी थे। उन्होने बोला था वक्त पर पहुंचा देंगे और उन्होंने हमे गाड़ी के निकलने के वक्त से पांच मिनट पहले ही  स्टेशन पहुंचा दिया। हम उतरे तो पुनीत भाई किराया देने के लिये पर्स निकालने लगे। हमने उनसे जल्द से जल्द अंदर जाने को बोला और कहा किराया हम दे देंगे। वो अन्दर की तरफ भागे। उनके साथ योगी भाई  भी थे। हमने किराया दिया और अन्दर की ओर बढ़ गये। तब तक पुनीत भाई और योगी भाई उस  प्लेटफार्म पे जा चुके थे जहाँ से उनकी ट्रेन मिलनी थी। हमारी ट्रेन (जिसका की टिकेट कैंसिल हो चुका था ) जिधर लगनी थी उधर उधर से सामने ही वो वाला प्लेटफार्म था। इसके इलावा गुरुजी और बाकी लोगों वाली ट्रेन अभी भी लगी हुई थी। जब वो ट्रेन निकलने लगी तो हमने खिडकियों से उन्हें देखने की कोशिश की लेकिन उसमे सफलता नहीं मिली। इतने में उनकी ट्रेन चलने लगी। अब हमें अपना जुगाड़ करना था।

हमे उधर अल्मास भाई भी मिल गए थे। वो हमसे पहले आ गए थे। हमने आपस से बात की कि क्या किया जाए। मैं रेल यात्रा का अनुभवी नहीं हूँ लेकिन बाकि सब जानते थे क्या हो सकता था ? प्लान ये था कि हम जनरल का टिकट लेंगे और फिर स्लीपर पर चढ़कर पर्ची कटवाएंगे  और साथ में टी टी से बात करके सीट का जुगाड़ करने  की कोशिश करेंगे। अब हमने टिकट लेने थे। इधर बात ये आयी की टिकट कैसे लिए जाएँ।  थोड़ा कंफ्यूजन था की कहीं पाँचों का टिकट एक में ही न मिल जाये। ऐसे में पांच लोगों को एक साथ देखकर टीटी सीट के जुगाड़ में आना कानी कर सकता था। इसलिए यही निर्णय लिया की सब अपना अपना टिकट लेंगे। हमने टिकट लिया और हम वापस आये। मेरी नज़रें उधर किसी बुक स्टाल को ढूँढ रही थी लेकिन अफ़सोस ऐसा कुछ नहीं दिखा। वरना जैसे उदयपुर में रीमा भारती के तीन उपन्यासों को लिया था ऐसे ही कुछ रोचक दिखता तो खरीद लेता। लेकिन फिर हम एक जगह सामान रख कर बैठ गये और गप्पे मारने लगे।

ऐसे  ही बातें चल  रहीं थीं कि पुनीत जी का फोन आया। उन्होंने बताया कि योगी भाई कि तबियत ठीक नहीं थी। हम सोच में पड़ गए कि अचानक ये क्या हुआ ? उनके अनुसार योगी भाई के पेट में दर्द हो रहा था।  हम उनके पास जा रहे थे कि ठाकुर महेश जी ने अपनी दवाई की पोटली से कुछ गोलियाँ निकाली और योगी भाई को देने के लिए कहा। हमने महेश जी को सामान के पास ही रहने के लिए कहा और ओवर ब्रिज को को क्रॉस करके पुनीत भाई  के पास गए।  योगी भाई थोड़ा आगे के साइड ही विराजमान थे।हम उधर पहुंचे और उन्हें पुदीन हरा की गोली दी और पानी दिया। उन्होंने वो लिया। उन्हें आराम पहुँचा। अब हम लोग  पुनीत भाई की ट्रैन का इंतजार करने लगे। कुछ ही देर  में उनकी ट्रैन आ गयी।  हमने उन्हें विदा किया और वापस ठाकुर जी के पास गए।

अब हमे अपनी ट्रैन का इंतजार था। हमने  इसी दौरान ये भी प्लान बना लिया था कि ट्रेन आते ही हम ये देख लेंगे कि हमें कौन सी सीट मिल सकती थीं। हमे एक आईडिया ये भी मिला था कि सीट्स देखें और ऐसे यात्रिओं को देखें जो दूर के स्टेशन से  चढ़ने वाले थे या जल्दी के स्टेशन पे उतरने वाले थे। ऐसा होता तो हमे सोने लायक जगह तो कुछ देर के लिए  मिल ही  जाती। इसके इलावा ये भी प्लान था टी  टी से बात करेंगे। ऐसे ही वक्त बीता और  ट्रैन भी आ गयी। टी टी से बात करने पर  उन्होंने साफ़ मना कर दिया कि कोई सीट नहीं मिल सकती। खैर, अब जाना तो था ही हम उस  डिब्बे में चढ़ गए जिसमे  की योगी भाई की सीट थी। प्लान ये था की हम लोग सीट का जुगाड़ करेंगे और जो सीट कन्फर्म है उसमे ठाकुर जी को स्थापित कर  दिया जायेगा। ऐसे ही हम चढ़ गए और गाडी चलना शुरू हो गयी।

योगी भाई की सीट जिस साइड अप्पर बर्थ पे थी उसके नीचे वाली सीट आरएएफ वालों के लिए आरक्षित थी। हम दरवाजे के सामने जम गए।उधर एक व्यक्ति पहले से ही खड़ा था। हमने एक चादर जमींन पे बिछाई और उधर ही बिछ गए। जब हम बैठ रहे थे तो आर पी ऍफ़ के जवान न कहा कि आप कहीं और बैठ जाओ क्योंकि उन्हें कुछ  कुछ देर में दरवाजा खोलना पड़ेगा और इससे हमे परेशानी होगी। हमने उनसे कहा जब ऐसी बात होगी तो उठ जायेंगे। इसके बाद हम बकैती करने लगे।   ऐसे जाने का मेरा ये पहला अनुभव था और मैं बहुत खुश और उत्साहित था।

थोड़ी देर में जो बगल में खड़ा लड़का था उसने हमे अपने बैग  का ध्यान रखने को बोला और कहीं चले गया। इसके बाद थोड़ी देर में टीटी साहब आ गए तो हमने अपनी अपनी पर्ची कटवाई और बैठ गए। अभी  सफर चालु हुए आधा एक घंटा ही हुआ होगा की बारिश आने लगी। जहाँ हम बैठे थे वो गेट के  नज़दीक और उधर से  पानी भी टपक रहा था। मैं वैसे भी थका हुआ था। सुबह सुबह लम्बी ट्रेक जो की थी। इसके इलावा एक और बात मेरे दिमाग में खटक रही थी। जो बंदा मुझे अपना बैग देखने का बोलकर  गया था वो काफी देर से नदारद था। जब हम चढ़े थे तो हमे लगा था कि वो हमारे जैसे ही जेनेरल टिकट धारक था और टीटी से बचने के लिए ही रफू चक्कर हुआ था। लेकिन उसको गए काफी वक्त हो चुका था।

अब मेरे दिमाग में टीवी में दिखने वाले विज्ञापन घूमने  लगे थे। कोई भी लावारिस वस्तु बम हो सकती है। मैं कभी पास वाले आरएफ वालों को देखता और कभी बैग को देखता। मेरे दिमाग कल्पना की उड़ान भरने लगा। मन में चित्र उभरने लगे कि कैसे ये बम फटेगा और हम क्योंकि नज़दीक हैं हमारे परखच्चे उड़ जायेंगे। शायद ये ज्यादा उपन्यास पढ़ने का नतीजा भी है। मैंने कुलदीप भाई को अपने मन में उपजी शंका से अवगत कराया। पहले तो उन्होंने इस बात को हँसी में टालना चाहा लेकिन फिर जिद करने पर हमने बात करने की सोची। तभी उधर से टीटी भी गुजरे। वो हमे पहचान ही गए थे क्योंकि हमने उनसे पहले प्लेटफार्म  बात की थी और फिर  हमने पर्ची कटाई थी। हमने उनसे बैग के बारे में बोला तो उन्होंने भी कहा कि कपडे ही होंगे। हमने कहा चेक कर लीजिये हमे संतुष्टि हो जाएगी। उन्होंने आरपीऍफ़ वाले  भाई से कहा जिन्होंने चैन वगैरह खोलकर  देखना चालू किया। ऐसे में मेरे मन में और विचार आने लगे। कभी मन में आता कि सचमुच ही उस बैग में बम मिलेगा और हमे हमारी मुस्तैदी के लिए इनाम मिलेगा। या कभी मन में आता की शायद  ड्रग्स मिले और हमे पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिए जाये। ऐसे ही रोमांचक कथानक मेरा मन बन रहे  था। लेकिन ये सब शेख चिल्ली के स्वप्न ही थे। बैग में कपडे ही थे। फिर हमने उन्हें बैग को अपने पास रखने के लिए बोला। अगर वो बंदा आता तो वो उनसे बैग ले लेता। वो राजी हो गए। वैसे यहाँ ये बात आश्चर्य वाली है कि  जब तक हम उधर बैठे थे तब तक वो बंदा वापस नहीं आया था।
जनरल वाले स्लीपर में। फोटो में दीपक भाई,अल्मास भाई और मैं। फोटो कुल्दीप भाई ने खींची 
हमको भिगोने को आतुर पानी हमारी ओर बढ़ता हुआ 

खैर,अब हम मस्ती कर रहे थे। सीट का कोई जुगाड़ नहीं हुआ था लेकिन ये पता चला था कि ये गाडी जयपुर तक खाली हो जाती है जहाँ से सीट  मिलने की संभावना थी। ऐसे ही मस्ती चल रही थी कि उधर से एक आरपीएफ वाले  भाई से बात होने लगी। उनसे  भी हमने सीट के लिए बोला तो उन्होंने भी असमर्थता जताई। हमने कहा ५०० रूपये में एक सीट नहीं हो सकती।  वो हँसने लगे क्योंकि हमने ये बात हँसते हँसते ही कही थी। हंसी हंसी में ये भी बोले कि आज तो ढाई हज़ार भी दोगे तो कुछ न मिलेगा।

जब शुक्रवार को सफर के लिए निकला था तो ये नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ अनुभव होगा। अब नींद भी आ रही थी। अल्मास भाई तो ठाकुर साहब को उनकी स्थापित जगह से हटाकर सोने के लिए बढ़ गए थे। ठाकुर साहब हमारे साथ आकर बैठ गए। उन्होंने बताया वो  तो जगे हुए थे और उन्हें ट्रैन में नींद अक्सर कम ही आती है।

अब कुलदीप भाई और मैं आगे सीट देखने गए क्योंकि एक स्टेशन आने वाला था। हमे एक सीट मिल भी गयी लेकिन जैसे ही सीट पर चढ़ने लगे तो नीचे से एक बुजुर्ग ने कहा कि उनकी सीट है। अब बहस होना लाजमी था। कुलदीप भाई तो चढ़ ही गए थे  सीट पर की उठाओ मुझे। बहस बढ़ने लगी लेकिन फिर उनके  उम्र का लिहाज किया और उतर गए। हुआ ये था कि कायदे से वो लोग ज्यादा थी और उनकी सीट कम थी। उन्होंने स्टेशन में उतरने वाले भाई से अपनी सीट बदल दी थी। और खुद उस भाई की सीट पर दो दो सो रहे थे। अब जब उस भाई की सीट खाली हुई तो वो वापस आपने सीट पर जाने का सोचने लगे क्योंकि उस भाई की सीट पर तो वो पहले से ही काबिज थे। उनकी योजना सही थी जिसपे हम बट्टा लगाने जाने कहाँ से धमक गये थे।

वैसे भी हम थके हुए थे तो ही बहस हुयी थी। साधारण वक्त पर तो ऐसे होती ही नहीं। खैर, हम आगे बढ़ गए। हमारी किस्मत अच्छी थी कि एक ऐसी सीट मिल गयी जो आने वाले स्टेशन पे खाली हो रही थी। हमने उसे अधिकार में ले लिया  और बैठ गए। तभी एक युवती अपनी माता जी के साथ आ गयीं और कहने लगी ये उनकी सीट है। हमने कहा ऐसा कैसे हो सकता है टिकट दिखाइए तो उन्होने कहा कि टी टी ने बोला। हमने कहा उन्हीं को लेकर आइये। हमे पता था क्या हुआ होगा। वो चली गयीं। कुछ देर बार टीटी साहब आये तो हमे पहचान गए और बिना कुछ बोले चले गए। उन्हें शायद दूसरी सीट दे दी होगी। कुलदीप भाई ने मुझे उधर बैठाया और बोला कि वो आते हैं आगे सीट देख कर।अगर कुछ मिला तो ठीक नहीं तो एक ही सीट में एडजस्ट होना पड़ेगा। लेकिन जैसे ही ट्रैन रुकी तो ऐसे भीड़ चढ़ी की सीट की उम्मीद बेकार हो गयी। थोड़े देर में कुलदीप भाई आये और उन्होंने इस बात की पुष्टि कर दी। अब क्या था अब तो इसी सीट पर एडजस्ट होना था। हम किसी तरह एडजस्ट हुए और कुछ ही देर में सो गए।

सुबह के वक्त गर्दन में दर्द हुआ तो नींद टूटी। मेरी गर्दन सीट से बाहर निकली हुई थी। कुलदीप भाई गहरी नींद में थे। मैं अपनी जगह से उठा और बाथरूम वगैरह गया। गेट खुला हुआ था तो उधर कुछ फोटो खींची। थोड़ी देर में उधर एक आर पी एफ वाले आये और उन्होंने गेट बंद करने के लिए कहा। ये पौने सात बजे का वक्त रहा होगा।

वापसी के दौरान ट्रेन से ली गयी एक तस्वीर

वापसी के दौरान ट्रेन से ली गयी एक तस्वीर

वापसी के दौरान ट्रेन से ली गयी एक तस्वीर 




उन्होंने  गेट बंद किया और दीपक भाई लोगों को के पास चले गया। मुझे  समझ नहीं आया कि सुबह के वक्त गेट बंद करने का औचित्य क्या था ? खैर, उधर भी दीपक भाई लोग उठ गए थे। अब गुडगाँव आने की देर थी। मुझे उतरकर ऑफिस जाना था। ट्रैन लेट थी तो ऑफिस में इस बाबाबत पहले ही बता दिया था कि लेट हो जाऊंगा। इसी दौरान सब आ गये थे। हमने चाय वगेरह भी पी ली थी। मैंने मुझसे बुरा कौन के कुछ पृष्ठ भी पढ़ लिए थे।  गुडगाँव आने से  पहले के ही कई स्टॉप्स से लोकल पब्लिक चढ़ने लगी थी। ऐसे में ज्यादातर यात्री उठ गए थे। मैं इस चीज से वाकिफ था क्योंकि जब मुंबई में रहता था तो सेंट्रल रेलवे वाले ज्यादातर लोग जो कल्याण रहते थे ऐसे ही एक्सप्रेस पकड़ना पसंद करते थे। वो लोकल से सफर करना इतना पसंद नहीं करते थे क्योंकि वो वक्त ज्यादा लेती थी और उसमे भीड़ भी काफी रहती थी। ठाकुर साहब आज शाम तक  दिल्ली ही थे।गुरूजी के ऑफिस में  मिलने का प्रोग्राम था। मैंने कहा कि ऐसा कुछ होता है तो मुझे बता दीजियेगा  मैं भी आने की कोशिश करूंगा। कोशिश ही कह सकता था क्योंकि पता नहीं था ऑफिस से कब छूटूँ। फिर थोडा थकान भी थी ही।अब गुडगाँव का स्टेशन आया तो मैंने सबसे विदा ली और उतर गया। उधर से सीधे अपने रूम में गया। उधर पहुँचकर नहाया और ऑफिस के लिए निकला। अब सीधे ऑफिस जाना था।

एक यात्रा का अंत हुआ था लेकिन इसी यात्रा के दौरान ही कई और यात्राओं की योजना बन गयी थी। कौन सी यात्राएं थी? उसके विषय में तो जब वो यात्राएं होंगी तो बताऊँगा। अभी के लिए तो इतना कहूँगा कि इस यात्रा से काफी यादें मिली, कई बेहतरीन लोगों से रूबरू होने का मौका मिला और कई अनुभव मिले। कुछ अपने को जाना और कुछ दूसरों को जाना। यही जानना पहचानना तो यात्रा का मज़ा होता है, क्यों है न?

पुनाश्च : अमित भाई ने ये याद दिलाया कि होटल का नाम धनलक्ष्मी नहीं भाग्यलक्ष्मी था। उनका धन्यवाद। और अब मुझे बादाम की मात्रा बढ़ानी पड़ेगी या अगली बार जिस जगह रुकूँ उधर की फोटो ले लेनी पड़ेगी। 😜😜😜😜😜😜

सम्पात 

पूरी ट्रिप के लिंकस
माउंट आबू मीट #१: शुक्रवार का सफ़र
माउंट आबू मीट #२ : उदय पुर से होटल सवेरा तक
माउंट आबू  #3 (शनिवार): नक्की झील, टोड रोक और बोटिंग
माउंट आबू #4: सनसेट पॉइंट, वैली वाक
माउंट आबू मीट #5: रात की महफ़िल
माउंट आबू मीट #6 : अचलेश्वर महादेव मंदिर और आस पास के पॉइंट्स
माउंट आबू #7:गुरुशिखर
माउंट आबू मीट #8: दिलवाड़ा के मंदिर, होटल में वापसी,दाल बाटी  की पार्टी 
माउंट आबू मीट #9: होटल भाग्यलक्ष्मी और वापसी के ट्रेन का सफ़र