शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

जहरखुरानी

**कुछ दिनों पहले सुरेन्द्र मोहन पाठक जी की आत्मकथा रिलीज़ की गयी। उसी के उपलक्ष में उनके प्रकाशक वेस्टलैंड ने एक कांटेस्ट चलाया था जिसमें २०० शब्दों में एक अपराध कथा लिखनी थी। इस कांटेस्ट के लिए मैंने भी अपनी कलम चलाई थी और एक कहानी पोस्ट करी थी जो।  उस कहानी को ही इधर पोस्ट कर रहा हूँ। अपनी राय जरूर दीजियेगा। 




2-1-2018

मैं सुबह की सैर से वापस आ रहा था। सात-आठ महीने बाद पौड़ी की हवा में साँस लेने का अनुभव अद्भुत था। मैं स्वर्ग में था। इस बार हमेशा के लिए।

घर पहुँचा तो मोहल्ले में शोर मचा हुआ था। मैं उधर भागा। सुशीला रो रही थी और मोहल्ले की औरतें उसे संभाल रही थीं। उसकी नज़र मेरे से मिली और उसका रोना और तेज हो गया।

राजेश, उसका पति और मेरा जिग्री दोस्त जहरखुरानी गिरोह का शिकार हो गया था। अभी फोन पर खबर मिली थी। चार दिन से उसकी लाश मोर्ग में थी।

10-5-2017

सुशीला दौड़ते हुए मेरे कमरे में आई।
'लो रोट*', मैंने कहा।
'तुम बस रोट खाते रहना', वो तुनककर बोली।
'क्या हुआ?', मैंने पूछा।
'वो आ रहा है', उसने मेरे पास आते हुए कहा।
'कब?',मैंने उसे अपनी तरफ खींचते हुए पूछा।
'छः महीने में',वो घबराई हुई थी।
'हम्म'
'हमेशा के लिए।’,उसने झुंझलाते हुए कहा,’ तुम बस उलजलूल चीजें पढ़ते रहना। ये क्या है', उसने बगल में पड़े फोल्डर को देखते हुए पूछा।

'दिल्ली कोटद्वार मार्ग में सक्रिय है जहर खुरानी गिरोह' वो फोल्डर में मौजूद कटिंग पढ़ने लगी और मैं उसकी जुल्फों से खेलने लगा।
*रोट और अरसे गढ़वाली पकवान हैं जो अक्सर शादी में बनते हैं.....
© विकास नैनवाल 'अनजान'

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

ग्वालियर #3: ग्वालियर किला और वापसी

शनिवार 4 नवम्बर 2017
इस यात्रा वृत्तांत को शुरुआत से पढने के लिए इधर क्लिक करें।
हम लोग पैंतालीस(45) मिनट चलने के बाद आख़िरकार किला गेट पहुँच चुके थे। 
यहाँ तक आपने पिछली कड़ी में पढ़ा। अब आगे।


हम अब अंदर दाखिल हुए तो उधर लोग बाग़ पहले से मौजूद थे। मुझे ध्यान आया कि पोहा वाले भाई ने कहा था कि किला सुबह पाँच बजे खुल जाता है। उधर कुछ बच्चे थे जो  क्रिकेट खेलने की तैयारी कर रहे थे और कुछ लोग अपने सुबह की सैर से वापिस आ रहे थे और कुछ सुबह की सैर को जा रहे थे। यानी आवाजाही थी। बाहर का गेट पे लिखा बोर्ड दिखा रहा था कि हम लोग गुजरी महल में प्रवेश कर रहे थे। जब आप उस गेट से अन्दर आते हैं तो एक आहाता सा आता है जिधर सामने एक छोटा सा छप्परनुमा स्ट्रक्चर है और बायें हाथ की तरफ एक और बड़ा सा गेट है। हमे इधर ही जाना था क्योंकि इधर से ही आप ऊपर मुख्य किले की तरफ  जा सकते हो।

लेकिन पहले हमने बाहर  ही  दो तीन फोटो खींचने की सोची। पहले  गेट में  मौजूद सीढ़ियों से हम ऊपर तक चढ़े। उधर का हाल बेहाल था। बियर और प्लास्टिक की बोतल, जानवरों का मल और प्लास्टिक के रेपर उधर मौजूद थे। किला सभी लोगों के लिए खुला रहता है और ये उसके ही कारण था। इधर आकर थोड़ा दुःख हुआ कि अपनी धरोहर के साथ हम क्या कर रहे थे। पहले मेरा इन सब चीजों की तस्वीर उतारने का मन था लेकिन फिर सोचा तस्वीर निकाल कर क्यों खुद को और दुखी करूँ। फिर मनीष भाई छतरी में गये और उन्होंने मुझसे बाहर से उनकी फोटो लेने को कहा तो मैंने उतरकर उनकी फोटो लेनी शुरू कर दी।
पहला गेट-जो दर्शाता है कि आगे पुरातत्व संग्राहलय है 
मनीष भाई 


गुजरी महल का प्रवेश गेट और सुबह की सैर को जाते लोग
कुछ देर तक फोटो लेने के बाद हमने भी गेट से प्रवेश किया। गुजरी महल अब एक संग्राहलय बना दिया गया है। वो बंद था। और उसके गेट के सामने कुछ लोग सुबह का आनन्द ले रहे थे। वो शायद रोज सैर के बाद इधर ही बतकही के लिए बैठते थे। संग्राहलय खुलने में अभी वक्त था तो हमने निर्णय लिया कि हम लोग इसी रास्ते में आगे बढ़ेंगे और अगर मूड हुआ तो इसे वापस आते हुए देख लेंगे।
गेट पे एक लोहे की चैन बंधी थी। जाने किस काम आती होगी ये?

गुजरी महल के बाहर बैठे लोग और फोटो उतारते मनीष भाई 
गुजरी महल की तरफ से दिखता प्रवेश दरवाजा

अब हम आगे बढ़ रहे थे। आगे का रास्ता समतल नहीं है। आपको हल्की चढ़ाई चढ़नी होती है। सुबह का मौसम था। ठंडा वातवरण था और ऐसे में चलने में मुझे मजा आ रहा था। वैसे हम चलते हुए ही आ रहे थे लेकिन रास्ता देखकर मुझे लगा कि चलो आज व्यायामशाला(जिम) नहीं जा पाऊंगा लेकिन उसकी जरूरत ही नहीं होगी।   हमारा गंतव्य स्थ्ल तो ग्वालियर किला ही था। गुजरी महल से आगे बढ़ते ही हमे एक बोर्ड दिखा। ये बोर्ड चतुर्भुज मंदिर का था।  चतुर्भुज मंदिर इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि इसमें एक अभिलेख है जिसके विषय में कहा जाता है कि इसमें ही 0 का प्रयोग पहली बार संख्या के तौर पर किया गया था। मंदिर के बाहर भी शिलालेख जो मंदिर के विषय में जानकारी देता है।
चतुर्भुज मंदिर के विषय में कुछ मुख्य बातें:
१. मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है
२. इसे किले की ठोस चट्टान को तराश कर बनाया गया था
३.  876 ईसवीं में  प्रतिहार राजा भोजराज के शाशन में इसे उत्खनित किया गया था
४. चतुर्भुज मंदिर के गर्भगृह में विद्यमान एक अभिलेख में ० का प्रयोग पहली बार संख्या के रूप में किया गया है

मैं  जाते वक्त तो इस मंदिर में नहीं गया लेकिन वापस आते वक्त जरूर गया था। लेकिन शिलालेख मुझे दिखाई नहीं दिया था। जाते हुए मनीष भाई इस मंदिर में गये और तब तक मैं बाहर की फोटो खींचता रहा। और ऐसे ही आराम से घूमते हुए आखिर हम फोर्ट के गेट तक पहुँच  ही गये। गुजरी महल से ऊपर चढ़ने की शुरुआत हमने सवा सात बजे के करीब की थी और हम किले के गेट पर सात पचपन के करीब पहुँच गये थे। रास्ते में चतुर्भुज मंदिर के अलावा कुछ और छोटे छोटे मंदिर आये। एक दिवार थी जिसमे मूर्तियों को तराशा गया था। मैंने कुछ की फोटो ली। हम आराम से चल रहे थे। हमे कोई जल्दी भी नहीं थी। हम आराम से घूमने आये थे  और इस खुशनुमा मौसम से घूम रहे थे। और क्या चाहिए था?

चतुर्भुज मंदिर को जाता रास्ता
सुबह की सैर की तरफ जाते और सुबह की सैर से आते लोग 


भोली भाली लड़की खोल तेरे दिल की प्यार वाली खिड़की.... प्यार वाली खिड़की का तो पता नहीं लेकिन दीवारों पे बनी ऐसी खुली हुई खिड़कियाँ काफी थी उधर 

फोटोग्राफी में मशगूल मनीष भाई 

किले की तरफ बढ़ते हुए दीवार से ग्वालियर को देखा... कोहरे से आच्छादित शहर सुन्दर लग रहा था 


चतुर्भुज मंदिर 

किले की दीवारों पर उकेरे गये कलाकृतियाँ 

किले की दीवार और उसपे उकेरी गयी छोटी छोटी कलाकृतियाँ  

ऐसी ही कई कलाकृतियाँ उन दीवारों पर उकेरी हुई थी 

रास्ते में मौजूद एक और छोटा मंदिर 

किले के निकट पहुँचकर आराम करते मनीष भाई 

किले का प्रवेश द्वार 

सोमवार, 29 जनवरी 2018

ग्वालियर #2 : बस स्टैंड से किला गेट तक

शनिवार, चार नवम्बर 2017

मैं और मनीष भाई दिल्ली से ग्वालियर पहुँच चुके थे। हमे ग्वालियर के स्टैंड पर बस ने उतारा था जहाँ हमने एक आध घंटा वक्त काटा था। फिर हल्का नाश्ता कर एक ऑटो ले लिया था।
(यहाँ तक आपने पिछली कड़ी में पढ़ा। विस्तृत तौर पर पढने के लिए इधर क्लिक करें। )


अपनी प्रजा को दर्शन देते  युवराज मनीष
सुबह का वक्त था और ग्वालियर की सड़के ज्यादातर खाली ही थी। लोग बाग़ कम दिख रहे थे और जो थे उनमे से ज्यादातर अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत सुबह की वाक पर निकलने वाले थे। अभी ग्वालियर अंगडाई ले रहा था। ऑटो वाले से जब हमने पूछा था कि फोर्ट चलोगे तो उन्होंने पैलेस कहा था। अब मुझे इतना पता था कि फोर्ट में कई पैलेस हैं तो हमने उनकी बात में ज्यादा तवज्जो नहीं दी। देनी चाहिए थी।

ऐसा इसलिए क्योंकि उनके मुताबिक़ वो हमे जय विजय पैलेस ले जा रहे थे जबकि हमारी मंजिल ग्वालियर का किला था। दोनों ही अलग अलग जगह थीं। पंद्रह बीस मिनट के बाद उन्होंने हमे पैलेस के सीमा रेखा के सामने उतारते हुए कहा कि उधर से पैलेस का रास्ता नजदीक है। हमने जब पूछा कि हमे तो ग्वालियर फोर्ट यानी ग्वालियर किला जाना है तो उन्होंने कहा कि वो तो काफी आगे है और उधर जाने का चालीस रूपये और लगेगा। मैंने मनीष भाई को देखा और उन्होंने मुझे देखा। फिर मैंने उनसे कहा कि सुबह का मौसम है जो कि चलने के लिए सबसे अनुकूल होता है। क्यों  न अभी चलते चलते ही पहुँचा जाये। हमने ड्राईवर साहब से बस ये कन्फर्म किया कि किला किस दिशा में पड़ेगा। उन्होंने हमारा मार्गदर्शन किया और फिर हमने किराया अदा किया। वो अपनी दूसरी सवारी की तलाश में निकल पड़े और हम लोग किले की तरफ की पदयात्रा करने के लिए। वैसे भी अभी सवा छः हो रहे थे।


हमने सड़क क्रॉस की। सड़क के किनारे फूटपाथ की दीवार पर कुछ शानदार पेंटिंग्स बनी थी। पेंटिंग्स में सामाजिक  सन्देश थे और ये मुझे और मनीष भाई को आकर्षक लगीं तो हम  इनकी फोटो निकालने लग गये।पाँच दस मिनट हमने उधर फोटो खींची। फिर आगे बढ़ गये। उसी स्थान पर एक गुरुद्वारा भी था।  अभी तो हमारी मंजिल कुछ और थी। वक्त मिलता तो इधर जाने का विचार बनाते। सड़क सीधी थी। एक जगह चौराहा आया तो हमने दिशा निर्देश लिए। यहीं पे हमे एक धातु की बनी कलाकृति दिखी जो कि चौराहे के मध्य में लगा रखी थी। इस कलाकृति में धरती से एक इंसानी जोड़ा निकल रहा था जो कि बच्चों के साथ खेल रहा था। इस कलाकृति ने हमारा ध्यान अपनी तरफ केन्द्रित किया और हमने इसके कुछ तस्वीर उतारे। फिर हम अपनी मंजिल की ओर बढ़ चले।

एक बार थोड़ा बहुत चलने के बाद  जब किसी से रास्ता पूछा तो उसने कहा कि किला गेट तो काफी दूर है और आप लोग पैदल नहीं  चल पाओगे। मैंने मनीष भाई को देखा तो मेरे चेहरे पर शायद ऐसे भाव रहे होंगे कि अच्छा बच्चू हमे चुनौती। अब तो पैदल ही जाया जायेगा। और यही बात मैंने मनीष भाई से कही। खुशकिस्मती से वो भी इस बात के लिए राजी थी। घुमक्कड़ी में ऐसे ही साथी की जरूरत होती है जिससे आपकी ट्यूनिंग बैठे। वर्ना अगर वो कहते कि ऑटो से जाना है तो मन मारकर मुझे ऑटो में ही जाना पड़ता। खैर, क्योंकि अभी दोनों ही राजी थी तो हम अपनी मंजिल की और बढ़ने लगे। अब सोचता हूँ तो  उनके लिए हम लोग अजीब रहे होंगे। वो उधर का स्थानीय थे  और उनके लिए किला गेट कोई उत्साह का कारण नहीं था और इसलिए पैदल चलकर उधर जाने का उन्हें कोई औचित्य नहीं दिखता था। और शायद ही वो उधर तक कभी पैदल गये होंगे। जैसे मैं और मनीष भाई अपने अपने स्थानीय इलाकों में कभी ऐसे नहीं गये होंगे।  लेकिन हम तो उधर पहली बार जा रहे थे और इसलिए हम एक अलग उत्साह से भरे हुए थे।  और इसलिए हम उधर पैदल जा सकते थे। फिर मौसम भी खुशनुमा था।

पैदल चलते हुए बीच में एक फाटक भी आया जहाँ से ट्रेन गुजर रही थी और हमने उधर थोड़े देर इन्तजार किया। ट्रेन मेरे लिए हमेशा से ही कोतुहल का विषय रही है। पहली बार ट्रेन में मैं कॉलेज के दूसरे साल में ही गया था। उससे पहले ट्रेन के विषय में खाली सुना और पढ़ा था। मुझे याद है जब हम छोटे थे तो एक पार्क में मेला लगता था और उसमे खिलौने वाली ट्रेन आती थी जिस पर चढ़ने के लिए हम बच्चे  बहुत लालायित रहते थे। किसी और झूले के प्रति उस तरह के भाव नहीं रहते थे। और इधर इस शहर लोगों के लिए तो ट्रेन आम बात थी। उन्हें ट्रेन के विषय में कैसा महसूस होता होगा। क्या इसकी खड़खड़ाहट अब जीवन का हिस्सा बन गई होगी? वैसे ट्रेन की बात करूँ तो नव्वीं या दसवीं में एक कविता थी अंग्रेजी की जिसमे एक बच्चा रात को विभिन्न ट्रेन्स को देखकर अपने मन में आने वाले भावों को बतलाता है। पैसेंजर ट्रेन से अलग और मालगाड़ी से अलग भाव उत्प्पन होते हैं। शायद मालगाड़ी चूंकि अँधेरी रहती है तो वो प्रेत समान लगती थी और साधारण यात्रियों को ले जाने वाली गाड़ी में रोशनी होती थी तो वो दिवाली के समान जगमगाते घर की तरह। अब तो मुझे ढंग से वो कविता याद भी नहीं है। और ये उपमायें कविता से कम मेरे मन से ज्यादा निकली हैं। वो बच्चा भी शायद ऐसी ही जगह रहता होगा। खैर, ट्रेन तो निकल चुकी थी और जब फाटक से जाने की अनुमति मिली हम लोग भी आगे बढ़ गये।


 ऑटो से उतरने के पैंतालीस मिनट, यानी सात बजे करीब हम लोग किला गेट के समक्ष मौजूद थे। सुबह का वक्त होने के कारण अभी तक हमे भीड़ कम मिली थी। और मौसम सुहावना था। चूंकि हम चल रहे थे तो ठंड भी नहीं लग रही थी। एक पड़ाव तो हमने पा लिया था।









रास्ते में पड़ता गुरुद्वारा 

चौराहे में मौजूद इस कलाकृति लोगों का ध्यान अपनी तरफ जरूर आकर्षित करती होगी

रास्ते में खिले हुए फूल और ऊपर से दिखती किसी किले की दीवार 

रास्ते में ही ये मंदिर मिला.. अगर पैदल की जगह गाड़ी में जाते तो इसका पता ही नहीं चलता 

हमारे गंतव्य स्थल की ओर दर्शाता बोर्ड..काफी चलने के बाद इसने ही सहारा दिया कि हम सही रस्ते पर है 

ट्रेन के निकलने का इन्तजार करते हुए 

इधर एक रोचक वाक्या हुआ। किले गेट के सामने काफी गाय थीं। कुछ घूम रही थीं और कुछ बैठी थीं। एक श्रद्धालु अधेड़ उम्र के व्यक्ति पोलीथीन में गाय के लिए कुछ लाये थे। उन्होंने थोड़ा सा निकाल कर गाय को भोग चढ़ाया। गाय ने वो खाया। अब शायद गाय को वो खाना इतना पसंद आया कि वो उनकी हाथ में मौजूद पोलीथीन की तरफ बढ़ने लगी। वो अधेढ़ व्यक्ति उचक उचक कर इधर उधर कूदते हुए थैली बचाने का प्रयत्न करते रहे लेकिन जुझारू गाय के समक्ष उनकी एक न चली और उन्हें पोलीथीन छोड़कर भागना पड़ा। ये देख मेरी हँसी छूट गई। मैं अंत तक इसे देखता रहा। गाय से हारने के बाद उन व्यक्ति ने इधर उधर देखा तो मैंने भी नजरे फेर ली। फिर वो उधर थोडा भी नहीं रुके। इंसान ने श्रद्धा में भी एक हिस्सा ही पूजनीयों के लिए आल्लोट कर रखा है। और अगर कोई पूजनीय अपने हिस्से से ज्यादा मांगता है तो छीना झपटी शुरू हो जाती है। यही नियम है। और यही इधर दृष्टिगोचर हो रहा था। बहरहाल दृश्य मनोरंजक था और मैं हँसता हुआ मनीष भाई को देखने लगा जो गेट के अंदर दाख़िल हो चुके थे। 

आखिर मंजिल पर पहुँच गये.... अब आराम ही आराम.... 

मैंने नेट में ग्वालियर के विषय में पढ़ा था तो देखने लायक काफी चीजें पता चली थी। मैंने सामने गेट देखा तो सोचा कुछ चीजें तो इधर ही देखने को मिलेंगी। मनीष भाई के साथ प्लान किया कि इसे जल्दी से जल्दी निपटने की कोशिश करेंगे और दूसरी चीजें भी देखेंगे। लेकिन हमे नहीं पता था ग्वालियर किला को निपटाना कोई हँसी खेल नहीं है। खैर, उसके विषय में अगली कड़ी में क्योंकि पूरा इधर लिखूँगा तो काफी लम्बा हो जायेगा।

वैसे किले गेट तक जाने के लिए बस स्टैंड से साझा ऑटो मिलते हैं तो जो लोग इधर तक पैदल न आना चाहे वो ऑटो में आराम से आ सकते हैं।

क्रमशः

इस यात्रा की सारी कड़ियाँ
ग्वालियर #1: दिल्ली से ग्वालियर 
ग्वालियर #2: ग्वालियर बस स्टैंड से किला गेट तक 
ग्वालियर #3: ग्वालियर किला और वापसी