मंगलवार, 17 सितंबर 2019

चालान

Image by carlovenson from Pixabay

शाम का वक्त था। अंधेरा होने को था और मौसम में एक तरह की ठंडक मौजूद थी। कुछ दिनों की उमस वाली गर्मी से हाल में हुई बरसात ने थोड़ी निजात लोगों को दिलाई थी। वरना तो इस वक्त भी लोगों का गर्मी और पसीने के मारे बुरा हाल रहता था।

दफ्तर बन्द होने लगे थे और लोग ऑफिस से निकलकर लोग घर की तरफ बढ़ने लगे थे। क और ख भी आज का काम निपटाकर दफ्तर की इमारत से बाहर निकल रहे थे।

ऑफिस  से निकलने के बाद क और ख सबसे पहले अक्सर चाय की टपरी पर जाते थे। चाय पीते पीते दफ्तर में हुई घटनाओं की चर्चा करते थे, उन पर अपनी विशेष टिप्पणी देते थे और फिर साथ साथ मेट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ जाते थे। ऑफिस से निकलने  के बाद ऑफिस में हुई बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी घटनाओं के ऊपर जो वो ऑफिस में नहीं बोल सकते थे वो सब इधर टपरी में बोला करते थे और अपने दिल के बोझ को हल्का करा करते थे। 

शनिवार, 3 अगस्त 2019

भात के लिए

स्रोत : pixabay

भात
न होता तो 
न मालूम होता मुझे 
तृप्ति का अर्थ,

भात
न होता 
तो न मालूम होता मुझे
संतुष्टि का अर्थ

पर क्योंकि
भात है
तो मैं सो पाता हूँ
तृप्त होकर
संतुष्ट होकर



मुझे बचपन से ही रोटी खानी पसन्द नहीं है।  वहीं अगर तीनों टाइम भात खाना हो तो मुझे उसमें कोई दिक्कत नहीं होती है। मुझे मज़ा ही आता है। कितना भी फैंसी खाना क्यों न खा लो लेकिन भात खाने से जो तृप्ति और संतुष्टि मिलती है वो किसी और चीज को खाकर नहीं मिलती। 

कभी किसी कारणवश मुझे भात खाने को नहीं मिल पाता तो उस दिन मुझे ऐसा लगता ही नहीं है कि मैंने कुछ खाया होगा। पेट तो भरा रहता है लेकिन वो संतुष्टि और वो तृप्ति मन में नहीं रहती है। इसी भावना को ऊपर लिखी पंक्तियाँ दर्शाती हैं।

आपके लिए ऐसा कौन सी चीज है जो अगर आप दिन में न खायें तो आपको लगता है कि आपने कुछ खाया ही नहीं है? आपको वो तृप्ति वो संतुष्टि नहीं मिलती है।

सोचकर देखें तो ज्यादातर ज़िन्दगी की सबसे बड़ी खुशियाँ सबसे सरल चीजों में ही मिल जाती हैं। हम बिना मतलब इधर से उधर मारे मारे फिरते हैं। खुशियाँ इकट्ठा करने के चक्कर में खुश होने के मौके ही नजरअंदाज कर देते हैं। उन्हें महसूस ही नहीं कर पाते हैं।

©विकास नैनवाल 'अंजान'



मंगलवार, 30 जुलाई 2019

फैसला

Image by Gerd Altmann from Pixabay
हम न चाहते हैं
सुनना किसी को,
बस तैयार
बैठे हैं अपनी कुर्सियों पर
कमीजों की आस्तीन चढ़ाकर
कोहनियों तक 
सुनाने को फैसला

हम भिनभिनाते हैं 
चीखते हैं, चिल्लाते है
दिखाना चाहते हैं के कमजोर नहीं हैं हम
हुई कैसी हिम्मत किसी के कुछ कहने की
हमारे बारे में
हमारी भाषा के बारे में
हमारे देश के बारे में
हमारी संस्कृति के बारे में
हम मिटाना चाहते हैं उसकी हस्ती
करना चाहते हैं बॉयकॉट
देते हैं सलाह उसे मर जाने की

लेकिन हम नहीं जानते हैं 
हमारा चीखना,चिल्लाना, बिलबिलाना
ही दर्शाता है कि 
कितने कमजोर हैं हम
कितनी कमजोर है हमारी भाषा
कितनी कमजोर है हमारी संस्कृति

क्योंकि लगता है हमें कि
कि किसी के शब्दों से 
वो चटक कर बिखर जाएंगे
कुछ ऐसे 
जैसे  उनके ही कंधों पर अभी तलक टिकी हुई थी वो
या उनके कहते ही छोड़ देंगे
सभी अपनी भाषा को
अपनी संस्कृति को
अपने देश को

मैं देखता हूँ सब कुछ
और मुस्कराता हूँ सोचकर 
के अंजान होने में 
मज़ा कुछ अलग सा ही है
और सोचता हूँ
जो डर है उन्हें
वो मैं क्यों नहीं महसूसता
क्यों मुझे विश्वास है
अपने देश पर
अपनी भाषा पर
अपनी संस्कृति पर
क्यों मानता हूँ मैं
कि किसी के कह भर देने से
न होगा उनका नुक्सान
ये थीं मेरे होने से पहले भी
रहेंगी मेरे होने की बाद भी
क्योंकि इनका होना न होना
निर्भर करता है बस
मुझ पर और मेरे जैसे असंख्य अन्य लोगों पर
हम पर 


मेरी दूसरी कविताओं को आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

©विकास नैनवाल 'अंजान'

रविवार, 28 जुलाई 2019

आप इतना कैसे पढ़ लेते हैं?

Image by 1820796 from Pixabay

'आप इतना कैसे पढ़ लेते हैं?' और 'आप उपन्यास कहानियाँ क्यों पढ़ते हैं?'  ये ऐसे  प्रश्न है जो मुझसे अक्सर पूछे जाते हैं। 'आप इतना कैसे पढ़ लेते हैं?' के बाद अक्सर प्रश्नकर्ता यह जोड़ देता है कि पढ़ना तो मैं भी चाहता/चाहती  हूँ लेकिन वक्त की कमी के कारण पढ़ नहीं पाता/पाती हूँ।

'क्यों पढ़ते हैं?' का उत्तर तो एक ही मुझे पढ़ना अच्छा लगता है। और मैं इधर इसकी बात नहीं करूँगा। मैं यह पोस्ट पहले वाले प्रश्न के उत्तर के तौर पर लिख रहा हूँ। यह इसलिए भी है क्योंकि इस प्रश्न के पीछे मुझे उनकी एक इच्छा दिखाई देती है। पढने की इच्छा। वो पढ़ना चाहते हैं लेकिन किसी कारण वश पढ़ नहीं पाते है वो इसी कारण जब मुझे पढ़ते हुए देखते हैं तो मुझसे प्रश्न करते हैं कि मैं इतना कैसे पढ़ लेता हूँ?

इधर सबसे पहले तो मैं यह बताना चाहता हूँ कि मुझे नहीं लगता कि मैं बहुत ज्यादा पढ़ता हूँ।  मैं गुडरीड्स नामक साईट का इस्तेमाल करता हूँ और उधर कई ऐसे लोग भी हैं जो साल की 300 किताबों से ऊपर पढ़ते हैं। जबकि मेरा स्कोर इसका एक तिहाई ही होता है।  हाँ, ये औसत आदमी से ज्यादा है लेकिन इस आँकड़े को आसानी से हासिल किया जा सकता है।

अगर आप पढ़ना चाहते हैं तो आप आसानी से ये काम कर सकते हैं। मैं अक्सर ये कोशिश करता हूँ कि मैं कम से कम बीस पृष्ठ एक दिन में पढूँ। अक्सर यह काम मैं दस से पन्द्रह मिनट में कर लेता हूँ।अगर वक्त मिलता है तो पृष्ठों की संख्या बढ़ जाती है।

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