शनिवार, 3 अगस्त 2019

भात के लिए

स्रोत : pixabay

भात
न होता तो 
न मालूम होता मुझे 
तृप्ति का अर्थ,

भात
न होता 
तो न मालूम होता मुझे
संतुष्टि का अर्थ

पर क्योंकि
भात है
तो मैं सो पाता हूँ
तृप्त होकर
संतुष्ट होकर



मुझे बचपन से ही रोटी खानी पसन्द नहीं है।  वहीं अगर तीनों टाइम भात खाना हो तो मुझे उसमें कोई दिक्कत नहीं होती है। मुझे मज़ा ही आता है। कितना भी फैंसी खाना क्यों न खा लो लेकिन भात खाने से जो तृप्ति और संतुष्टि मिलती है वो किसी और चीज को खाकर नहीं मिलती। 

कभी किसी कारणवश मुझे भात खाने को नहीं मिल पाता तो उस दिन मुझे ऐसा लगता ही नहीं है कि मैंने कुछ खाया होगा। पेट तो भरा रहता है लेकिन वो संतुष्टि और वो तृप्ति मन में नहीं रहती है। इसी भावना को ऊपर लिखी पंक्तियाँ दर्शाती हैं।

आपके लिए ऐसा कौन सी चीज है जो अगर आप दिन में न खायें तो आपको लगता है कि आपने कुछ खाया ही नहीं है? आपको वो तृप्ति वो संतुष्टि नहीं मिलती है।

सोचकर देखें तो ज्यादातर ज़िन्दगी की सबसे बड़ी खुशियाँ सबसे सरल चीजों में ही मिल जाती हैं। हम बिना मतलब इधर से उधर मारे मारे फिरते हैं। खुशियाँ इकट्ठा करने के चक्कर में खुश होने के मौके ही नजरअंदाज कर देते हैं। उन्हें महसूस ही नहीं कर पाते हैं।

©विकास नैनवाल 'अंजान'



मंगलवार, 30 जुलाई 2019

फैसला

Image by Gerd Altmann from Pixabay
हम न चाहते हैं
सुनना किसी को,
बस तैयार
बैठे हैं अपनी कुर्सियों पर
कमीजों की आस्तीन चढ़ाकर
कोहनियों तक 
सुनाने को फैसला

हम भिनभिनाते हैं 
चीखते हैं, चिल्लाते है
दिखाना चाहते हैं के कमजोर नहीं हैं हम
हुई कैसी हिम्मत किसी के कुछ कहने की
हमारे बारे में
हमारी भाषा के बारे में
हमारे देश के बारे में
हमारी संस्कृति के बारे में
हम मिटाना चाहते हैं उसकी हस्ती
करना चाहते हैं बॉयकॉट
देते हैं सलाह उसे मर जाने की

लेकिन हम नहीं जानते हैं 
हमारा चीखना,चिल्लाना, बिलबिलाना
ही दर्शाता है कि 
कितने कमजोर हैं हम
कितनी कमजोर है हमारी भाषा
कितनी कमजोर है हमारी संस्कृति

क्योंकि लगता है हमें कि
कि किसी के शब्दों से 
वो चटक कर बिखर जाएंगे
कुछ ऐसे 
जैसे  उनके ही कंधों पर अभी तलक टिकी हुई थी वो
या उनके कहते ही छोड़ देंगे
सभी अपनी भाषा को
अपनी संस्कृति को
अपने देश को

मैं देखता हूँ सब कुछ
और मुस्कराता हूँ सोचकर 
के अंजान होने में 
मज़ा कुछ अलग सा ही है
और सोचता हूँ
जो डर है उन्हें
वो मैं क्यों नहीं महसूसता
क्यों मुझे विश्वास है
अपने देश पर
अपनी भाषा पर
अपनी संस्कृति पर
क्यों मानता हूँ मैं
कि किसी के कह भर देने से
न होगा उनका नुक्सान
ये थीं मेरे होने से पहले भी
रहेंगी मेरे होने की बाद भी
क्योंकि इनका होना न होना
निर्भर करता है बस
मुझ पर और मेरे जैसे असंख्य अन्य लोगों पर
हम पर 


मेरी दूसरी कविताओं को आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

©विकास नैनवाल 'अंजान'

रविवार, 28 जुलाई 2019

आप इतना कैसे पढ़ लेते हैं?

Image by 1820796 from Pixabay

'आप इतना कैसे पढ़ लेते हैं?' और 'आप उपन्यास कहानियाँ क्यों पढ़ते हैं?'  ये ऐसे  प्रश्न है जो मुझसे अक्सर पूछे जाते हैं। 'आप इतना कैसे पढ़ लेते हैं?' के बाद अक्सर प्रश्नकर्ता यह जोड़ देता है कि पढ़ना तो मैं भी चाहता/चाहती  हूँ लेकिन वक्त की कमी के कारण पढ़ नहीं पाता/पाती हूँ।

'क्यों पढ़ते हैं?' का उत्तर तो एक ही मुझे पढ़ना अच्छा लगता है। और मैं इधर इसकी बात नहीं करूँगा। मैं यह पोस्ट पहले वाले प्रश्न के उत्तर के तौर पर लिख रहा हूँ। यह इसलिए भी है क्योंकि इस प्रश्न के पीछे मुझे उनकी एक इच्छा दिखाई देती है। पढने की इच्छा। वो पढ़ना चाहते हैं लेकिन किसी कारण वश पढ़ नहीं पाते है वो इसी कारण जब मुझे पढ़ते हुए देखते हैं तो मुझसे प्रश्न करते हैं कि मैं इतना कैसे पढ़ लेता हूँ?

इधर सबसे पहले तो मैं यह बताना चाहता हूँ कि मुझे नहीं लगता कि मैं बहुत ज्यादा पढ़ता हूँ।  मैं गुडरीड्स नामक साईट का इस्तेमाल करता हूँ और उधर कई ऐसे लोग भी हैं जो साल की 300 किताबों से ऊपर पढ़ते हैं। जबकि मेरा स्कोर इसका एक तिहाई ही होता है।  हाँ, ये औसत आदमी से ज्यादा है लेकिन इस आँकड़े को आसानी से हासिल किया जा सकता है।

अगर आप पढ़ना चाहते हैं तो आप आसानी से ये काम कर सकते हैं। मैं अक्सर ये कोशिश करता हूँ कि मैं कम से कम बीस पृष्ठ एक दिन में पढूँ। अक्सर यह काम मैं दस से पन्द्रह मिनट में कर लेता हूँ।अगर वक्त मिलता है तो पृष्ठों की संख्या बढ़ जाती है।

शनिवार, 20 जुलाई 2019

आम महोत्सव 2019 - दिल्ली हाट जनकपुरी

यह यात्रा 6 जुलाई 2019 को की गई



आम मेरे पसंदीदा फलों में से एक है। एक आम ही ऐसा फल है जिसके आने का मैं इन्तजार साल भर करता हूँ और जिसके जाने के बाद मन दुखी सा हो जाता है। यही कारण है कि जब पता लगा कि जुलाई में आम महोत्सव इस साल भी आयोजित किया जा रहा है तो मैं बहुत उत्साहित था। पिछले साल(उस यात्रा वृत्तांत को पढने के लिए इधर क्लिक करें) भी मैं इस महोत्सव में गया था और मैंने भरपूर मजा लिया था। इस साल भी यही  करने का इरादा था।पिछले साल मैं अकेला गया था और इस साल भी अभी तक ऐसा ही इरादा था। यहाँ ये बताना चाहूँगा कि फेसबुक पर जब मैंने पोस्ट साझा की थी तो यशवंत जी (जो कि एक घुमक्कड़ हैं और जिनसे जी डी एस मीट के दौरान मिलना हुआ था) ने आने के विषय में कहा था लेकिन वह जून की बात थी। 6 जुलाई कि सुबह को मेरे दिमाग से वह बात बिलकुल निकल चुकी थी। सुबह सवेरे मैं अपने रोज के वक्त पर उठा और मैंने पहले ब्लॉग का काम निपटाया।

दस बजे तक Shadow of the Ponderosa, जो कि kindle में पढ़ी एक लघु कथा थी, के विषय में मैंने अपने दूसरे ब्लॉग में लिख दिया था। उसके बाद कमरे के दूसरे काम मैंने निपटा दिए थे। अब मुझे नाश्ता बनाना था।

मैंने नाश्ता बनाया और नहा धोकर, नाश्ता करके रूम से निकल गया। मौसम गर्म तो था लेकिन इतना अधिक भी नहीं था कि चला न जा सके। ग्यारह बज रहे थे और मैं पैदल ही बस स्टैंड की तरफ बढने लगा।

मेरा इरादा महोत्सव जाने का तो था ही लेकिन उसके साथ मैं राजीव चौक उतरकर कुछ पत्रिकाएँ भी लेना चाहता था। असल में उत्तरांचल पत्रिका नाम की पत्रिका उधर ही मिलती है। बाहर रहकर उत्तराखंड से जुड़े रहने का यह मेरा जरिया है। उधर की काफी बातें इससे पता लग जाती हैं और यही कारण है मैं महीने में एक बार उधर जाकर पत्रिका ले आता हूँ। इस बार भी मैं एक पंथ दो काज करना चाहता था। 

बस स्टैंड की तरफ बढ़ते हुए मुझे ख्याल आया कि मनीष भाई घूमने फिरने के लिए तैयार रहते हैं। मैंने सोचा कि क्यों न उन्हें कॉल लगाया जाए। अगर वो आने को राजी हुए तो उनके साथ महोत्सव जाया जाएगा। मैंने मनीष भाई को कॉल लगाया और उन्हें आने के लिए कहा।

मैंने उन्हें अपनी योजना से अवगत करवाया कि पहले मैं राजीव चौक उतरूंगा, उधर पत्रिकाएँ लूँगा, अगर भूख लगी तो लंच करूँगा और फिर महोत्सव जाऊँगा। उन्होंने कहा कि उन्हें डाकखाना जाना है। मैं राजीव चौक पहुँचूँ  तब तक वो अपना काम निपटा लेंगे और अगर उन्हें आना होगा तो वो बता देंगे। फिर लंच का देख लेंगे कि राजीव चौक करना है या जनकपुरी ही करना है। मुझे यह बात सही लगी और मैं अब ऑटो स्टैंड की तरफ चले गया।

गुरुग्राम बस स्टैंड से साझा ऑटो लेकर सिकन्दर पुर पहुँचा तो मुझे चाय की तलब लगने लगी थी। चाय पीने का मन कर रहा था तो मैंने उतर कर उधर किसी चाय वाले को खोजा। मैंने एक सरसरी निगाह चारो तरफ घुमाई  लेकिन जब कोई पतीले में चाय बनाते हुए नहीं दिखा तो मैं मेट्रो प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गया।

मेट्रो स्टेशन में  में भीड़ नहीं थी और इस कारण आसानी से अन्दर दाखिल हो गया। मैं अक्सर गुरुग्राम बस स्टैंड से एम जी रोड उतरने के बजाए सिकन्दरपुर उतरता हूँ। इसका एक कारण यह भी है कि अक्सर सिकंदरपुर में मुझे एम जी रोड से कम भीड़ मिलती है। और मैं आसानी से प्लेटफार्म में पहुँच जाता हूँ। लम्बी लाइन में खड़ा नहीं रहना पड़ता है।

प्लेटफार्म में पहुँचकर मैंने  राजीव चौक के लिए मेट्रो पकड़ ली। मेट्रो में दाखिल हुआ और मैंने अपने लिए एक कोना ढूंढा और फिर अलका सरावगी जी का उपन्यास एक सच्ची झूठी गाथा पढने के लिए निकाल दी। यह उपन्यास मैंने ले तो एक डेढ़ साल पहले था लेकिन पढने का मौक़ा अब लगा है। वो भी तब जब पिछले दो महीनो से ये मेरे goodreads की currently reading शेल्फ में पढ़ा हुआ है।

अगर आप goodreads के विषय में नहीं जानते हैं तो यह एक बुक cataloguing साईट है जहाँ पर आप अपनी किताबों की लिस्ट अपडेट कर सकते हो। उधर रिव्यु पोस्ट कर सकते हो और समूह में शामिल होकर उन पर चर्चा कर सकते हो। मुझे वह साईट काफी पसंद है और उसका मैं बहुत उपयोग करता हूँ।

अब मैंने किताब निकाल ली थी और मैं किताब के कथानक में खो गया।

उपन्यास की बात करूँ तो उपन्यास एक सच्ची झूठी गाथा एक लेखिका गाथा के विषय में है। गाथा पचास वर्षीय हिन्दी की लेखिका है। ईमेल से गाथा की दोस्ती प्रमित सान्याल नामक युवक से होती है। प्रमित सान्याल काफी रोचक किरदार है और उसके जीवन के अनुभव गाथा के जीवन से इतने अलग है कि गाथा उसके ऊपर कुछ लिखने का मन बना लेती है। यही कारण है वह उससे मिलने एअरपोर्ट में पहुँच जाती है। उसने अपने घर में इस विषय में किसी को नहीं बताया है और अब एअरपोर्ट पर प्रमित के आने का इन्तजार कर रही है। पर प्रमित नहीं आया है। और इंतजार करते हुए वह यह सोच रही है कि कैसे प्रमित उसकी ज़िन्दगी में आया। कौन है प्रमित? क्या वो गाथा से मिलने आएगा? आखिर इनकी दोस्ती कैसी हुई? ऐसे ही कई प्रश्नों का उत्तर आपको इस उपन्यास को पढ़कर मालूम होगा।

मैं उपन्यास में खोया हुआ जरूर था लेकिन बीच बीच में बगल में मौजूद एक लड़के और लड़की का संवाद मेरे कानों में पड़ रहा था।  लड़का अपने सहकर्मचारी(जो शायद उसका बॉस था) के विषय में लड़की से बात कर रहा था। उसने उस लड़की से उस कर्मचारी के विषय में, उसके वाइफ के विषय में बातें की।  ऐसे ही सफ़र कट रहा था। उन दोनों की बातें और गाथा की कहानी आपस में गड मढ़ हो रही थीं।

जब मेट्रो  केन्द्रीय सचिवालय पहुँच गयी थी  तो मनीष भाई का कॉल मुझे आया। उन्होने कहा कि वो अपने रूम के पास वाले मेट्रो से निकल चुके हैं और मुझे राजीव चौक में मिलेंगे। थोड़ी बातचीत के बाद ये निर्धारित हुआ कि मैं पत्रिकाएँ ले आऊंगा, लंच हम महोत्सव के निकट ही करेंगे और वो मेट्रो स्टेशन के अन्दर आकर ही मेरा इन्तजार करेंगे।

मुझे यह बात ठीक लगी। वैसे भी मुझे अनुभव था कि महोत्सव घूमने में एक या डेढ़ घंटे ही लगेंगे और फिर हम बाहर आकर लंच कर सकते थे। अब राजीव चौक आने का इन्तजार था।

राजीव चौक आया और मैंने किताब बंद की। गाथा और प्रमित सान्याल के किस्से को थोड़ा विराम दिया और पत्रिकाएँ लेने चले गया।

एक सच्ची झूठी गाथा - अलका सरावगी 

मैं आठ नम्बर गेट से बाहर निकला जो कि ए ब्लाक पर खुलता है और उधर से होता हुआ सेन्ट्रल न्यूज़ एजेंसी पहुँचा जो कि पी ब्लाक पर 20 नम्बर दुकान है। उधर पहुँचा तो देखा कि लिखा था कि एक से 2 बजे तक लंच होता है। एक बार के लिये तो अचकचा गया क्योंकि एक बजकर पांच मिनट हो रहे थे। लेकिन फिर सोचा कि अंदर जाकर देख ही लेते थे कि क्या होगा।  ज्यादा से ज्यादा यही कहेंगे कि बाद में आना। अंदर गया तो अन्दर एक बच्ची अपनी मम्मी से कहती मिली -"मम्मा ये बुक लेनी है।"

मम्मी ने उसके हाथ से बुक ली और वापस रखकर अपनी साथ मौजूद औरत से बोली- "इसको साथ लाना ही आफत है। परेशान कर देती है।" और यह कहते हुए वह तीनों दुकान से निकल गये। उन्होंने पहले ही शायद काफी कुछ ले लिया था और अब और ज्यादा कुछ नहीं लेना चाहते थे। मैं थोड़ी देर तीनों को देखता रहा। कुछ देर के लिए मुझे अपने बचपन की याद आ गयी थी जब मैं कॉमिक्स लेने के लिए उसी बच्ची की तरह जिद करता रहता था। वो आँखों से ओझल हुए तो मुझे याद आया कि मुझे तो पत्रिका लेनी है।  

मैंने चारो और नजर दौड़ाई तो टेबल पर मुझे एक महिला बैठी दिखी। यानी पत्रिकाएँ खरीदी जा सकती थी। अब मैं पत्रिकाओं वाले सेक्शन में गया और अपने पसंद की पत्रिकाएँ उठाने लगा। मैं हिन्दी में अक्सर चार से पांच पत्रिकाएँ हर महीने ले लेता हूँ। पढना कम ही हो पाता है लेकिन फिर भी लेकर रख लेता हूँ। 

एक बार की बात है कि एक अंक को मैंने एक साल बाद पढ़ा था और उसमें एक कहानी के लेखक को जब कहानी के विषय में मेल किया और उन्हें बताया कि कहानी अच्छी लगी है तो एक बार को वो भी हैरत में आ गये। उन्होंने भी कहा कि प्रतिक्रिया देने में  इतने देर कहाँ लगी आपको। फिर मैंने अपनी लेट लतीफी का ब्योरा उन्हें दिया तो वो भी हँसने लगे। 

खैर, मैं निम्न पत्रिकाएँ ही ज्यादातर लेता हूँ:

कथादेश (30-35 रूपये), हंस(40 रूपये), नया ज्ञानोदय(40 रूपये), उत्तरांचल पत्रिका(20 रूपये) 

अगर किसी पत्रिका का कोई अंक पसंद आ गया तो कभी कभार कुछ भी खरीद लेता हूँ। सारी पत्रिकायें  150 में आ जाती है। इस बार मुझे नया ज्ञानोदय तो मिली लेकिन हंस और कथादेश नहीं मिली। उत्तरांचल पत्रिका के मई और जून के अंक पड़े थे तो मैंने वो उठा लिए। मई और जून में आना नहीं हुआ था। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की द्विमासिक पत्रिका पुस्तक संस्कृति रोचक लग रही थी तो उसका भी एक अंक उठा लिया।

अब मैंने अपना ध्यान उपन्यासों के तरफ केन्द्रित किया। सेंट्रल बुक एजेंसी में मास्टरमाइंड बुक्स द्वारा प्रकाशित जेम्स हेडले चेज, एर्ल स्टैनले गार्डनर, इरविंग वाल्लास के उपन्यास भी मौजूद रहते हैं। जब भी मैं इधर आता हूँ तो एक उपन्यास उठा लेता हूँ। इसके पीछे एक कारण तो ये है कि मुझे हंस ज्ञानोदय कथादेश तो गुरुग्राम में ही मिल जाती है लेकिन उत्तरांचल पत्रिका नहीं मिलती है। इसीलिए मुझे इस दुकान में आना होता है। ऐसे में बीस रूपये की पत्रिका के चक्कर में मेरे 80 रूपये आने जाने के खर्च हो जाते हैं। तो किताब लेकर ये तस्सली रहती है कि चलो ज्यादा पैसे खर्च करने थे। दूसरा ये कि मास्टरमाइंड से प्रकाशित किताबें या तो अमेज़न जैसे ऑनलाइन विक्रेताओं के पास नहीं मिलती हैं और मिलती भी है तो उन पर डिलीवरी चार्ज होता है।  इधर वो दस प्रतिशत डिस्काउंट दे देते हैं।  जैसे मैंने जो द केस ऑफ़ डेडली टॉय ली है उन्होंने उसके 85 की जगह 77 रूपये लिए। यानी मेरा फायदा ही हुआ । मैंने पत्रिका और उपन्यास लिए  और इसके पैसे अदा किये। 

हाँ, इधर एक और रोचक चीज मेरे साथ हमेशा होती है। उत्तरांचल पत्रिका के कारण हिसाब में हमेशा वो लोग गलती कर देते हैं। पत्रिका की कीमत 20 रूपये हैं और इसमें पृष्ठ 40 होते हैं और वो अगल बगल लिखे होते हैं तो वो लोग हमेशा कीमत 40 लगा देते हैं और मुझे हमेशा उनके हिसाब को सुधारना पड़ता है। खैर,इस बार 192 रूपये में सब आ गया। 

उधर मैंने निम्न चीजें ली:
पुस्तक संस्कृति - 25 रूपये 
उत्तरांचल पत्रिका (मई और जून अंक) - 40 रूपये (20 रूपये प्रति अंक)
नया ज्ञानोदय - 40 रूपये 
The case of deadly toy- Erle Stanley Gardner -77 रूपये(वैसे 85 का था 8 रूपये की छूट मिली)

पत्रिकाएँ जो सेन्ट्रल बुक एजेंसी से ली

अब मुझे कथादेश और हंस लेनी थी और इसलिए मैं बुक एजेंसी से निकलकर पी ब्लाक के पीछे को गया।  उधर एक भाई साहब ठेला लगाकर बैठते हैं जिनके पास पत्रिकाएँ मिल जाती हैं। जो पत्रिका मुझे सेन्ट्रल बुक एजेंसी में नहीं मिलती हैं उन्हें मैं उधर से ले लेता हूँ। मैंने सोचा उधर जाकर पत्रिका ले लूँगा और बगल में मौजूद चाय वाले से चाय पी लूँगा। लेकिन उधर जाकर मुझे दुगनी निराशा हुई। न आज ठेला था और न उधर चाय वाला ही था।

मैं उधर से वापस आ गया। मैंने सब वे से सड़क पार की और बाहर निकल कर अब गेट 8 की तरफ बढने लगा। उधर ही मुझे एक चाय वाला मिल गया तो जैसे मेरे मन की मुराद पूरी हो गयी। मैंने उससे एक चाय और एक मट्ठी ले ली। मैं अब चाय और मट्ठी का सेवन करने लगा। चारों तरफ लोग ही लोग थे। कुछ विदेशी थे जिनके पीछे पैसे मांगने वाले लोगों की लाइन थी। एक अधेड़ महिला जो कि  जापानीज या कोरियाई या उत्तर पूर्वी में से एक रही होगी,तेजी से मेरे आगे से निकली। वहीं बगल में एक दुकान के आगे कुछ युवक और युवतियाँ सेल्फियाँ खींच रहे थे। और मैं सबको देख रहा था। कितनी कहानियाँ मेरे चारो ओर थी।  सब किसी न किसी कारण से उधर पहुँचे होंगे। कुछ खुश थे, कुछ परेशान थे, कुछ रोज मर्रा की जद्दोजहद में व्यस्त थे और मैं चाय का आनंद ले रहा था।

तभी मेरा फोन बजा। मट्ठी मैंने खत्म कर ली थी तो फ़ोन निकाल कर देख सकता था। फोन  मनीष भाई का था। वो राजीव चौक पहुँच गये थे और मेरा इन्तजार कर रहे थे। मैंने उनसे कहा कि चाय खत्म करके आता हूँ।

मैंने चाय खत्म की और पैसे अदा किये।

चाय खत्म कर ही रहा था कि एक व्यक्ति चाय वाले के पास आया और उसे सिक्के देते हुए उसने कहा कि चाय देना। चाय वाला सिक्के देखकर परेशान हुआ।  उसने सिक्के ले तो लिए लेकिन उसमें से पाँच रूपये मुझे थमा दिए। मैं उसे लेकर चल पड़ा और वो कहने लगा कि - "सिक्के जल्दी जल्दी निकाल दूंगा।" उसके इस कथन से मैंने सिक्के की तरफ देखा और उसे उलटा पलटा। मेरे दिमाग में एक ख्याल आया कि कहीं ये सिक्का नकली तो नहीं और वह नकली सिक्कों को चलाने वाले गिरोह में तो शामिल नहीं लेकिन फिर  मैंने इस ख्याल को परे धकेला और गेट नम्बर आठ की तरफ बढ़ने लगा।  जासूसी नोवल अगर आप पढ़ते हैं तो हर जगह अपराध होने की कल्पना करने लग जाते हैं। ये कल्पनाएँ तो रोचक होती हैं लेकिन मैं अभी इनमें नहीं डूबना चाहता था।

मैं मेट्रो के अन्दर दाखिल हुआ और फोन पर मनीष भाई से को-ऑर्डिनेट किया। उनसे मिला। वो दिखाई दिए कि मेट्रो आ गयी और हम दोनों ही मेट्रो में दाखिल हो गये। अब मैं मेट्रो के अंदर एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे होते हुए  उन तक पहुँचा। वो सीट पर बैठे हुए थे और मेरे लिए भी उधर एक सीट थी लेकिन मेरा बैठने का मन नहीं था। मैं खड़ा रहा और हम ऐसे ही बातें करने लगे। इधर उधर इसकी उसकी बातें होती रही। वो मोबाइल पर पाठक साहब की किताब पढ़ रहे थे। कुछ देर में वो किताब में लग गये और मैं गाथा और प्रमित सान्याल के साथ व्यस्त हो गया। स्टेशन बीतते गये।

थोड़े देर बाद मैंने सोचा कि गूगल करके देख लूँ कि किधर मैंगो फेस्टिवल है। पहला लिंक खोला तो उसमें पीतमपुरा दिखा रहा था। एक बार को हैरानी हुई लेकिन फिर तरीक 9 जुलाई दिखा रहा था। दिनांक बदल कर फिर सर्च किया तो मिल गया। गूगल ने ये भी बता दिया कि भाई तिलकनगर उतर जा उधर से आसानी होगी।

हम तिलक नगर उतरे और स्टेशन से बाहर निकले।

इधर से हमने रोड पार की और एक रिक्शे वाले भाई से दिल्ली हाट के विषय में पूछा। उन्होंने बताया कि उधर के लिए ऑटो किधर से मिलेंगे और हम लोग ऑटो लेकर दिल्ली हाट पहुँच गये।

मैं पिछले साल भी इधर आया था और इस साल दोबारा आ रहा था। मनीष भाई का यह पहला मौक़ा था आने का। अन्दर जाते ही हमे कोने में एक बैंड दिखाई दिया। वो इलेक्ट्रिक गिटार वगेरह लेकर गीत बजा रहे थे।  अगल बगल कुछ स्टाल अभी लग रहे थे। हमने उधर कुछ फोटो ली और फिर आगे टिकेट काउंटर की तरफ बढ़े।

पहुँच गये जी आम महोत्सव






वयस्कों का टिकेट बीस का था तो सबसे पहले वो लिया। फिर मैं तो सबसे पहले बाथरूम गया। गर्मी लग रही थी और मुँह पर पानी मारने का मन था।  लघु शंका की, हाथ धोये और उसके बाद मुँह धोया।

बाहर आये और फिर मनीष भाई ने बोला कि किधर जाना है। उन्हें बताया कि सामने डॉम में आम की प्रदर्शनी है और उसके आलावा इधर रंगारंग कार्यकर्म चलते रहते हैं। उन्होंने पहले डॉम में जाने का फैसला किया। हम लोग उधर की तरफ बढ़ गये। वहाँ जाते हुए हमे एक गत्ते के जानवर मिले जिसके साथ मैंने फोटो खिचवाई। बड़ा सा आममानुष मिला जिसके साथ हम दोनों ने फोटो खिचाई। मनीष भाई उसके साथ हाथ मिलाने लगे तो चौकीदार साहब ने उन्हें डांट दिया। मेरी हँसी छूट गयी।


क्यूट से जीव के साथ 

आम मानुष से हाथ मिलाते मनीष भाई

हम अन्दर दाखिल हुए। अन्दर तरह तरह के आम थे। हम लोग अलग अलग स्टाल में मौजूद आम देखने लगे।
इस प्रदर्शनी में अलग अलग लोग अपने बागों में मौजूद आमों को लेकर आते हैं। कई कृषि विश्वविद्यालय  भी अपने द्वारा उगाये गये अलग अलग आमों का प्रदर्शन इधर करते हैं। ऐसे में कई आमों के नाम तो होते हैं लेकिन कई ऐसे भी होते हैं जिनके नम्बर ही होते हैं। कुछ आम खाने के लिए होते हैं लेकिन कुछ केवल प्रयोग के तौर पर उगाये जाते हैं। हम एक एक स्टाल में जाकर अलग अलग आमों को देखने लगे। उनकी फोटो वगेरह उतारने लगे।


एक स्टाल से होता मैं दूसरे की तरफ बढ़ ही रहा था कि तभी एक मोहतरमा मुझसे मुखातिब हुई।

उन्होंने पूछा- "इधर मौजूद नमो और अमित शाह नाम के आम के विषय में आपको क्या कहना है।"
मैंने कहा - "वो व्यक्ति उनसे प्रेरित हुआ होगा। इसलिए उस आम के नाम उनके ऊपर रखे होंगे।"
मेरा जवाब सुनकर वो प्रसन्न हुई और फिर बोली- "यह बात आप कैमरा पर कह दोगे?"

कैमेरे का नाम सुनकर मैंने अपनी नजर उधर घुमाई जिधर उसकी नज़र घूमी थी तो मुझे कैमरा दिखा। जी न्यूज़ का कैमरा था। मैंने कहा - "मैं  तो नहीं कह सकता लेकिन मैं एक व्यक्ति को जानता हूँ जो कह सकता है।"

मनीष भाई मुखर हैं, बातचीत कर लेते हैं, बहिर्मुखी है तो वो इस चीज के लिए बेहतर थे। इसलिए मैं चाहता था कि वो कहें। मैंने उनको इस विषय में पूछा लेकिन उन्होंने भी टाल दिया। और हम दोनों कैमरे में आने से बच गये। मोहतरमा भी अब  किसी आंटी से कैमरे में आने के विषय में बातचीत करने लगी थीं।

और हम दोनों ही प्रदर्शनी में मौजूद दूसरे स्टाल्स में आम देखने लगे।








जिस डोम में यह प्रदर्शनी लगती है वो दो हिस्सों  में विभाजित है। ऊपर एक छोटा सा हिस्सा है जहाँ सीढ़ियों से जाया जा सकता है। हमने नीचे मौजूद सभी स्टाल्स देख लिए थे और अब हम लोग ऊपर मौजूद आम देखना चाहते थे।

हम लोग ऊपर चढ़ गये। ऊपर का कोना प्रतियोगिता में प्रथम,द्वितीय और तृतीय आये आमों के लिए था। इधर अलग अलग आम पैदा करने वाले लोग आते हैं और फिर उन आमो के बीच प्रतियोगिता होती है जिनमें प्रथम, द्वितीय और तृतीय चुना जाता है। जैसे सफेदा पैदा करने वाले कई लोग आयेंगे। ऐसे में सफेदा की श्रेणी में किसका उचतम है यह देखा जाता है और उस हिसाब से इनाम बांटा जाता है। इधर चौसा,सफेदा, मल्लिका,आम्रपाली,रतौल इत्यादि आम थे।

दशहरी आम - पहला दूसरा तीसरा विजेता 
चौसा 

लंगड़ा 
फजरी आम

केसर 

हुस्नारा का हुस्न देखिये

मल्लिका 

आम्रपाली 

रतौले

रामकेला 

बड़े  आकार के आमों के विजेता 

मिक्स वैरायटी के आम के विजेता 
ऊपर से दिखता नीचे का नजारा




नमो आम और अमित शाह आम 



हमने हर स्टाल  देख लिया था। अलग अलग आमों की तस्वीर ले ली थी। क्या हो जो रोज हमे इनमें से हर प्रकार का आम  खाने को दिया जाए। पूरा साल हम अलग अलग तरह के आम खा सकते हैं। यही कल्पना कर करके मैं तो पगला रहा था। अब सब घूम लिया था तो हम लोग उधर से बाहर निकल गये।

अब बाकी चीजें देखनी थी। हम डॉम से निकले तो बाहर एक बड़ा सा आम था। हमने उसके साथ एक फोटो खिंचाई। लोगों ने उस पर संदेश भी लिखा था। संदेश लिखने में न मेरी रूचि थी न ही मनीष भाई को ही कोई रूचि थी।

आम के साथ मनीष भाई 

आम के साथ मैं


अब हम बाकी का दिल्ली हाट घूमना चाहते थे।

सामने देखा तो नृत्य चल रहा था। पंजाबी नृत्य हो रहा था तो हम लोग उधर की तरफ बढ़ गये।

पंजाबी नृत्य के बाद हरियाणवी और राजस्थानी नृत्य भी उधर हुआ। तीनों ही परफॉरमेंस हमने देखी। गर्मी हो रही थी लेकिन कलाकारों ने अपना बेहतरीन प्रदर्शन दिया। उन्हें देखकर मैं यही सोच रहा था कि इन कलाकारों को चुनने की क्या प्रक्रिया होती होगी। क्या इन्हें इस काम के पैसे मिलते होंगे? शायद मिलते तो होंगे।

इन्ही नृत्यों के बीच मनीष भाई गायब से हो गये थे। मैंने इधर उधर देखा तो मुझे दिखाई नहीं दिए। मैं दोबारा नृत्य देखने लगा। जब आखिरी नृत्य खत्म हुआ तो देखा वो किसी से बतिया रहे हैं। वो एक स्टाल के सामने खड़े थे और सिंगल यूज कप कैसे नुकसान पहुंचाते हैं उस पर बातचीत कर रहे थे। उस स्टाल पर काफी सामान था जो कि एनवायरनमेंट फ्रेंडली था। मैं उधर जाकर उनकी बात सुनने लगा। उन्होंने स्टाल वाले से उसका कार्ड लिया और हम लोग आगे बढ़ गये।


पंजाबी नृत्य दिखाते कलाकार 

हरियाणवी नृत्य दिखाते कलाकार 

राजस्थानी(शायद)  नृत्य दिखाते कलाकार

कुछ ही देर में हमने वो दुकाने  भी देख ली जहाँ अलग अलग तरह के आम मिल रहे थे। इधर विभिन्न तरह के आम आप पेटी में खरीद सकते हैं। हमे तो इतने आमों की जरूरत नहीं होती तो हमने नहीं लिए।

पिछले बार मैं इधर आया था तो इधर ऐसा स्टाल भी था जहाँ जी भरकर आप आम खा सकते थे। आपको बस कुछ ही पैसे देने होते थे। आज वो बंद था। बाद में मनीष भाई ने बताया कि उधर लोग खा रहे थे इसलिए बंद था।
हाट में घूमते हुए 

हाट में मौजूद दूसरी दुकाने 

पेटियों में बिकते आम 

आम के स्टाल्स जहाँ से आम खरीदे जा सकते थे 


गर्मी में पीलो ठंडे पेय 

हाट में घूम लो दुनिया 


आम अब लगने लगे हैं पोल में भी 
खैर, हम मेले में घूम लिए थे और अब वापिस जाने की बारी थी। हम बाहर की तरफ निकले  गेट के नजदीक काफी स्टाल्स थे जिनकी तस्वीर मैंने ली। इनमें से एक स्टाल गुड़ियों का था।वैसी गुड़ियाँ मैंने जैसलमेर की घुमक्कड़ी के दौरान देखी थीं। इसके अलावा कुछ झूले, कुछ मेले में अक्सर जो स्टाल मौजूद होते हैं वो भी इधर थे। आप निशाना लगा सकते थे, छल्ले डालकर ईनाम जीत सकते थे। हमने उन स्टाल्स की फोटो ली और गेट की तरफ बढ़ गये।

 वहीं गेट पर  एक राजस्थानी लोक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहा था। घोड़े की पोशाक पहने वह नृत्य कर रहा था। गेट में मौजूद कालीन में वो गेट की तरफ आ रहा था और जा रहा था। बीच बीच में घोड़े की तरह ठुमक  रहा था और कभी गोल गोल चक्कर भी लगा रहा था। थोड़ी देर हमने उसका नृत्य देखा और फिर उसकी फोटो खींच कर गेट से बाहर निकल आये।

गुड़ियों का स्टाल.. 

निशाने लगाओ या झूला खेलो 

छल्ले डालो इनाम पाओ 

राजस्थानी लोक कलाकार 

अलविदा! अब अगले वर्ष मिलेंगे



तो ये थी 31 आम महोत्सव की घुमक्कड़ी। पिछले बार की तरह इस बार भी काफी कुछ देखा और काफी कुछ रह भी गया होगा। अब अगले साल का इन्तजार है। उस वक्त दोबारा इधर जाऊँगा। जाने से पहले इधर मैंने जितने आम देखे उनमें से कुछ की सूची दे जाता हूँ ताकि आप याद  रखें कि कितने आम आपको खाने हैं। याद रखें ५०० से ऊपर तरह के आम थे।

हुस्न आरा, शरीफ,लतीफ,सेशन,गुलाब जामुन, मालदा,सफेदा लखनऊ, खासुल ख़ास, टुन टुन,दशहरी,आम्रपाली,सावनिया, पेट छिर्री, तुहिरी,आमिन,रामकेला,बम्बई,काला पहाड़,लम्बुई,मल्लिका,तैमूरिया, सेंसेशन,लंगड़ा,नाज़ुक परी,गुलाब ख़ास,राम केला, मिस्टर फोर्ड,लज्जत बक्श, हिम सागर,बैंगलोरा, महाराज ऑफ़ मैसूर,राजा वाला,सिन्धु,गुरुवानी, निलियोरा,अनानास, पापट पेरी, के बी करेला, अलिफ़, थैंकिंग अमाडा,टिक्का भादुरिया,पंजा पसंद, पैरी, महमूद बहार,रत्ना, ह्मीफ पसंद,पत्थर, हजूर पसंद, महिलाबादी,फजली, करेला, केसर बश,रॉयल स्पेशल, बिहारी वाला, नील्फान्सो,याकुती, ब्राइड ऑफ़ रशिया,बिजोरो गढ़, बर्मा सुर्ख, राजीव,पूसा श्रेष्ठ, रहमान पसंद,तोता पूरी, टॉमी अटकिंस,चौसा,मोहम्मद वाला, नारियल, क्रोटोन,जर्दालू, हाथी झूल, अजवाइन,साहिर, अंगूर लता, भोर दास,फकीरा, कलंक गोआ,कोंकण रूचि, पौ,काला हापुस, कच्चा मीठा, अम्बिका,मीनाक्षी, सोनाली गोला, ऐश्वर्या, रशिया,रजिया गोला,मौसम गोला, चिंता हकन, तोता चोच, अनारदाना, नमो,अमित शाह,कालिंदी, चान्दिनी गोला, सुर्खी,किस्म ज्योति, रमैया,केतकी गोला, मनोहरी, आम राजा,यशोदा पसंद,जामुन गोला, शिवपाल पसंद,सुन्हेरी, जानवी किस्म, फूरी,जैसिक, अनुज पसंद,जौहरी, इत्यादि

 नाम तो और भी हैं लेकिन मुझे आलस्य महसूस हो रहा है।  अगर आपको सभी नाम जानने हैं तो आप भी देख आइयेगा अगले साल।

अब अगली यात्रा पर मिलेंगे। तब तक के लिए पढ़ते रहिये घुमते रहिये।

#पढ़ते_रहिये_घूमते_रहिये #फक्कड़_घुमक्कड़
                                                            समाप्त
© विकास नैनवाल 'अंजान'

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