रविवार, 21 अप्रैल 2019

शाम

Image by HeungSoon from Pixabay

"तो..?"
"तो क्या..."
"फिर..."
"फिर क्या..."
"हम्म..."
"हम्म.."
फिर दोनों ने एक गहरी साँस छोड़ी और बेंच में बैठे दूर क्षितिज को देखने लगे। शाम का वक्त था। अँधेरा होने वाला था। दो हथेलियों ने एक दूसरे को थाम लिया था।उनके पास कुछ वक्त था। वो बातों में इसे जाया नहीं करना चाहते थे।
वो इसे एक दूसरे के साथ शांति से बिताना चाहते थे। वो दो हथेलियाँ मिलकर कोई जादूगिरी सा करके दिखा रही थीं। वो अपनी थकान, अपने अवसाद, अपनी परेशनियों से खुद को दूर जाते महसूस कर रहे थे। दूर अपनी दुनिया की तरफ.... जहाँ केवल वो थे और थे उनके स्वप्न।

                                                                   समाप्त 
मेरे दूसरे माइक्रो फिक्शन आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
लघु-कथा

©विकास नैनवाल 'अंजान'

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

जोधपुर जैसलमेर की घुमक्कड़ी #4: कुलधरा और खाबा किला

यह यात्रा 28/12/2018 से 01/01/2019 के बीच की गई थी
30/12/2018  रविवार 
इस वृत्तांत को शुरू से पढ़ने के लिए इधर क्लिक करिए:

कुलधरा


पिछली कड़ी में आपने पढ़ा:
हम सुबह जैसलमेर में उठे। उठकर नाश्ता किया और फिर कुलधरा के लिए निकल पड़े। 
अब आगे:



हम टिकट चेक करने वाले भाई की बात पर हँसते हुए अंदर दाखिल हुए थे। अन्दर कुलधरा के अवशेषों की तरफ रास्ता बना हुआ था। वहाँ कुछ गाड़ियाँ खड़ी थी जो इस बात की तरफ इशारा कर रही थी कि अवशेष उधर ही थे। मैंने सोचा कि हम उधर की तरफ जायेंगे लेकिन राकेश भाई ने कुछ और सोच रखा था। उन्होने बाइक दूसरी दिशा में घुमा दी थी। उधर एक और चीज हमारा इन्तजार कर रही थी। यह एक बावड़ी थी जिसके पास एक महिला बैठी थी। वहीं एक लड़का भी खड़ा था। वो दोनों स्थानीय लोग ही लग रहे थे और उनके सिवा उधर केवल हम दोनों ही थे। राकेश भाई ने बावड़ी के नजदीक जाकर बाइक खड़ी कर दी।

सोमवार, 15 अप्रैल 2019

मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #5


मच्छर मारेगा हाथी को - अ रीमा भारती फैन फिक्शन #5


पिछली कड़ी में आपने पढ़ा:

रीमा मुंबई से दिल्ली लैंड करती है और उसे पता चलता है कि सुनीता को किसी ने अगुवा कर लिया है। वही फिर उसकी बात सुनीता की दोस्त काम्या नारंग से होती है और वो उससे मिलने के लिए निकल पड़ती है। 

अब आगे:

5)


रीमा की बाइक कुछ दूर बढ़ी ही थी कि उसे इस बात का एहसास हो गया कि शायद कोई उसके पीछे पड़ा है। वह यह तो जान चुकी थी कि वो लोग दो या तीन गाड़ियों में थे और बारी बारी से उसके पीछे लगे थे। उसने बाइक में तेल भरवाने के बहाने एक पेट्रोल पंप के निकट लगवाई। थोड़ा तेल डलवाया और फिर काम्या को फोन लगाया। एक ही घंटी में फोन उठाया गया।

"हेल्लो, रीमा दीदी आप कब तक आ रही हैं?" काम्या ने एक ही साँस में कहा। 

"काम्या,प्लान में थोड़ा बदलाव करते हैं। मैं अब तुम्हारे घर नहीं आऊँगी। एक चीज बताओ क्या तुम्हे पता है कि फीनिक्स मॉल किधर है?"

"जी दीदी।" काम्या ने जवाब दिया। 

"तुम कितने देर में उधर पहुँच सकती हो?" मैंने प्रश्न किया।

"दीदी आधे घंटे में"

"ठीक है मुझे भी इतना ही वक्त लगेगा। मैं नहीं चाहती कि हम लोग तुम्हारे घर के नजदीक मिले। सुनीता के साथ जो हुआ उसके चलते हमे सावधानी से चलने की जरूरत है।"

रविवार, 14 अप्रैल 2019

जोधपुर जैसलमेर की घुमक्कड़ी #3: जैसलमेर से कुल्धारा की तरफ

यह यात्रा 28/12/2018 से 01/01/2019 के बीच की गई थी

30/12/2018  रविवार 

इस वृत्तांत को शुरुआत से पढ़ने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें:
जोधपुर जैसलमेर की घुमक्कड़ी #1


पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे मैं जोधपुर पहुँचा था और उधर पहुँचकर मुझे राकेश भाई ने सरप्राईज दिया था। उसके बाद हमने जोधपुर में अपना काम निपटाया था और उसके पश्चात शाम को जोधपुर से बस लेकर हमें जैसलमेर आना पड़ा था। यह सब कुछ अप्रत्याशित सा था। लेकिन फिर ज़िन्दगी वैसे तो चलती नहीं है जैसे हम अक्सर सोचते हैं। हमारे साथ भी ऐसे ही हुआ था। अब आगे:


सुबह नींद खुली तो देखा राकेश भाई फोन पर कुछ टिपटिपा रहे थे। मैंने वक्त पूछा और फिर सो गया। फिर साढ़े आठ बजे नींद खुली। राकेश भाई नहा-धोकर रेडी थे। मुझे एक चाय चाहिए थी। मैंने एक चाय के लिए बाहर किसी बन्धु से कहा। कुछ देर में चाय आई और चाय पीते हुए मैंने उपन्यास के कुछ पृष्ठ पढ़े।

हफ्ते की लोकप्रिय पोस्ट(Last week's Popular Post)