मंगलवार, 27 मार्च 2018

कोहरा


image source : new indian express


१ )
स्वतंत्र चैनल का एंकर अपनी सीट पर चिल्ला चिल्ला कर प्रदूषण के ऊपर चर्चा कर रहा था। कोहरे ने दिल्ली-एनसीआर को परेशान कर रखा था और सरकारें  एक दूसरे पर इसका ठीकरा फोड़ने में व्यस्त थी। ये सुबह का वक्त था और वो अपने कानों में हेड फोन खोंसे मेट्रो स्टेशन से नीचे उतर रहा था। एक कोहरा उसकी ज़िन्दगी में भी छाया हुआ था, लेकिन उसने उसे हटाने का बंदोबस्त कर लिया था। 2जी, कोयला और व्यापम के देश में उसका छोटा सा घोटाला क्या मायने रखता था। फिर एकाउंट्स डिपार्टमेंट में होने का क्या फायदा, जब वो बहती गंगा में हाथ भी न धो सके। लेकिन फ़िलहाल इन सबके विषय में सोचने का वक्त नहीं था। उसने वीडियो रोका और नजरें घुमाईं। वातावरण में हलकी सी ठण्डक थी। ठण्ड का आगमन हो चुका था।  कोहरा अभी भी छाया हुआ था। हाथ को हाथ नहीं सुझाई दे रहा था। चाहे ये प्रदूषण का कोहरा हो लेकिन आज उसे हिल स्टेशन वाली फील आ रही थी। मौसम सुहावना लग रहा था भले ही फेफड़ों की बैंड बज रही हो। इसलिए आज उसने पैदल चलने का फैसला किया। दस पंद्रह मिनट ही तो लगते। उसने वीडियो चालू किया और फोन की स्क्रीन में मीडिया के सर्कस को देखते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ने लगा।

२ )

एक बाइक सवार मेट्रो स्टेशन के सामने खड़ा था। उसकी पारखी नजरें स्टेशन से निकलने वाली भीड़ को देख रही थीं । सावधानी हटी और दुर्घटना घटी पर उसका विश्वास था, लेकिन कोहरे के कारण लोग ज्यादा ही सावधान हो रखे थे और उसे उसके शिकार नहीं मिल रहे थे। लेकिन इसका एक फायदा भी था। अब उसे हाथ साफ करने के लिए रात का इतंजार नहीं करना पड़ रहा था। कोहरे की वजह से सुबह ही ऐसी परिस्थिति बन चुकी थी कि वो आसानी से अपने काम को अंजाम दे सकता था। उसकी बाइक भागने को तैयार थी। उसने सोचा-बस कोई मुर्गा मिल जाये ,तो हफ्ते का खर्चा निकल जाये। तभी उसका ध्यान फोन पर नज़र गड़ाये उस व्यक्ति पर गया। उसके पतले होंठों पर मुस्कान आ गई और उसने द्रुत गति से बाइक बढ़ाई।

३ )

 कुछ देर पश्चात फोन बाइक सवार के अनुभवी हाथों में था, चेहरे पर विजयी मुस्कान थी और दिल की धड़कनें रोमांच के कारण तेज हो गईं थीं । लेकिन, अचानक एक तेज आवाज हुई और उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया।

४ )

जब फोन उसके हाथ से छीना गया तो एक पल को वो जड़ हो गया। फिर एक तेज आवाज़ उसे धरातल पर ले आयी और वो आवाज़ की तरफ दौड़ा। कुछ ही दूर  बाइक गिरी हुई थी। बाइक सवार छिटका हुआ था। उसने नजरें घुमाई तो उसे अपना फोन कोने में पड़ा दिखाई दे गया। वो झट से उधर गया और उसने फोन को उठाया। गोरिल्ला ग्लास था और फोन को कुछ भी नहीं हुआ था। बाइक के गिरने से आवाज तेज हुई थी। क्या हुआ क्या हुआ की आवाजें कोहरे के भीतर से आने भी लगी थी। लेकिन फिर भी वो बाइक सवार के पास जाना चाहता था।

५ )

जब तक बाइक वाले को एहसास हुआ कि क्या हुआ था, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कोहरे में एक गाड़ी उसकी बाइक को ठोक कर आगे निकल गई थी। उसकी आँख खुली, तो उसके सामने वही फोन वाला आदमी था। उनकी नज़रें आपस में  मिलीं तो उसने कुछ कहने की कोशिश की... शायद 'पानी!' उसका गला जो सूख रहा था।

६ )

फोन वाले मुर्गे ने उसे देखा और मुस्कुराया। उसने फोन में हेडफोन डाला और कुछ बड़बड़ाते हुए निकल गया।

७ )

'कौन कहता है कोहरा बुरा है।'
शायद उसने यही कहा था और इन आखिरी शब्दों को सुनने के साथ ही बाइक सवार के प्राण पखेरू उड़ गये।


अगले दिन के अख़बार की हैडलाइन थी :


कोहरे ने ली एक मासूम की जान। कौन है जिम्मेदार?


एडिटिंग : राजीव रंजन सिन्हा उनकी साइट : साहित्य विमर्श

© विकास नैनवाल 2018

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

मिसएडवेंचर्स ऑफ़ तोताराम #१

'इलाइची मैं तुझे दुनिया तबाह नहीं करने दूँगा'- रस्सियों से जकड़ा तोताराम गुर्राया।

इलाइची ने अपने काले घने बालो को झटका और दुनिया भर की शोखी अपनी आवाज में घोलती हुई बोली- 'मेरे प्यारे तोतू। दुनिया तबाह करने के लिये तो मेरी एक अदा ही काफी है।'
वो उतरी और बलखाती हुई बंधे हुए तोताराम के नज़दीक पहुंची। फिर उसके गालों को सहलाती हुई बोली,'तुम ये मिर्ची खाओ। ये दुनिया बचाना तुम्हारे बस की नहीं।'
तोताराम अपना सा मुँह लेकर रह गया और उस दिन को कोसने लगा जब उसके पिताजी मिट्ठूलाल ने उसका नाम ये रखा था।

#तोताराम_ब्रह्मांड_का_रक्षक 

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

जहरखुरानी

**कुछ दिनों पहले सुरेन्द्र मोहन पाठक जी की आत्मकथा रिलीज़ की गयी। उसी के उपलक्ष में उनके प्रकाशक वेस्टलैंड ने एक कांटेस्ट चलाया था जिसमें २०० शब्दों में एक अपराध कथा लिखनी थी। इस कांटेस्ट के लिए मैंने भी अपनी कलम चलाई थी और एक कहानी पोस्ट करी थी जो।  उस कहानी को ही इधर पोस्ट कर रहा हूँ। अपनी राय जरूर दीजियेगा। 




2-1-2018

मैं सुबह की सैर से वापस आ रहा था। सात-आठ महीने बाद पौड़ी की हवा में साँस लेने का अनुभव अद्भुत था। मैं स्वर्ग में था। इस बार हमेशा के लिए।

घर पहुँचा तो मोहल्ले में शोर मचा हुआ था। मैं उधर भागा। सुशीला रो रही थी और मोहल्ले की औरतें उसे संभाल रही थीं। उसकी नज़र मेरे से मिली और उसका रोना और तेज हो गया।

राजेश, उसका पति और मेरा जिग्री दोस्त जहरखुरानी गिरोह का शिकार हो गया था। अभी फोन पर खबर मिली थी। चार दिन से उसकी लाश मोर्ग में थी।

10-5-2017

सुशीला दौड़ते हुए मेरे कमरे में आई।
'लो रोट*', मैंने कहा।
'तुम बस रोट खाते रहना', वो तुनककर बोली।
'क्या हुआ?', मैंने पूछा।
'वो आ रहा है', उसने मेरे पास आते हुए कहा।
'कब?',मैंने उसे अपनी तरफ खींचते हुए पूछा।
'छः महीने में',वो घबराई हुई थी।
'हम्म'
'हमेशा के लिए।’,उसने झुंझलाते हुए कहा,’ तुम बस उलजलूल चीजें पढ़ते रहना। ये क्या है', उसने बगल में पड़े फोल्डर को देखते हुए पूछा।

'दिल्ली कोटद्वार मार्ग में सक्रिय है जहर खुरानी गिरोह' वो फोल्डर में मौजूद कटिंग पढ़ने लगी और मैं उसकी जुल्फों से खेलने लगा।
*रोट और अरसे गढ़वाली पकवान हैं जो अक्सर शादी में बनते हैं.....
© विकास नैनवाल 'अनजान'