मंगलवार, 19 सितंबर 2017

कानपुर मीट #5: शाम की महफ़िल

 8th जुलाई 2017, शनिवार
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अल्मास भाई को छोड़ने के बाद हम होटल की तरफ मुड़ गये थे। यहाँ तक आपने पिछली कड़ी में पढ़ा। कुछ ही देर के सफ़र के पश्चात हम अपने होटल में थे। होटल पहुँच कर हमे अपनी दिन भर घूमने की थकान को दूर करना था और इसके लिए चाय और कॉफ़ी से बढ़िया और क्या हो सकता था। हम रूम में पहुंचे, फ्रेश वगेरह हुए और चाय कॉफ़ी का आर्डर दिया। कुछ ही देर में चाय कॉफ़ी भी आ गयी और सब उसकी चुस्कियाँ लेते हुए बीते हुए दिन के विषय में बातें करने लगे। ऐसी बातें चल रही थी कि दो लोगों की कमरे में एंट्री हुयी। हमे पहले ही बता दिया गया था कि अरविन्द शुक्ला जी और उनके साथ सिद्धार्थ सक्सेना जी भी इस मीट में शिरकत करने के लिए आने वाले थे। हम लोग बातें करते हुए उनका ही इन्तजार कर रहे थे। वो आये और हम सब से मिले। मैं पहली बार सक्सेना जी और शुक्ला जी से मिल रहा था। वो आये और हमारे साथ बैठकर बातचीत में शामिल हो गये। वो आये बैठे और शैलेश जी के पाठकनामा को देखने लगे। एक सुनील के संवाद को देखते हुए उन्होंने कहा कि ये तो सुनील का है। ये सुनना था कि योगी भाई ने उनसे पूछा कि आप भी पढ़ते हैं क्या पाठक साहब को। तो उन्होंने कहा थोड़ा बहुत पढ़ा है। फिर ऐसे ही बातों का  सिलसिला चलता रहा,शैलेश जी ने अपने लड़कपन के किस्से भी सुनाए और ऐसे ही बातों की जलेबियाँ छनती रही।  

वहीं दूसरी तरफ दोनों होस्ट शाम की महफ़िल की तैयारी में जुटे हुए थे। एसएमपी मीट का मुख्य आकर्षण ये शाम की महफ़िल ही होती है। यहाँ लोग बाग़ आपस में फोर्मली मिलते हैं और अपने विषय में बाकी मौजूद लोगों को बताते हैं। बातचीत और चर्चा होती है। दौर-ए-जाम चलता है। यानी पूरा एन्जॉय किया जाता है। एसएममी मीट का ये वो हिस्सा है जिसका सभी को इन्तजार रहता है। हमे भी इसका इन्तजार था। नवल भाई के आईडिया के कारण आज तो केक भी कटना था। बातचीत करते हुए कब साढ़े सात बज गये पता ही नही लगा। अल्मास भाई भी होटल वापस आ गए थे।  अब शाम की कार्यवाही करने का वक्त हो गया था और धीरे धीरे सारे सुमोपाई होटल के हॉल की तरफ बढ़ने लगे। इसी हॉल में सब इंतजाम किया हुआ था।


नीचे जाने से पहले कुछ हल्की फुल्की बातचीत - बाएं से अल्मास भाई, पुनीत भाई, योगी भाई और शैलेश जी 

सात साढ़े सात तक सभी लोग हॉल में आ चुके थे। अब केक कटिंग होनी थी। हीरा फेरी आने के उपलक्ष में केक काटने का निर्णय किया गया था। एक तरीके से हम लोग अपने तरह से पाठक साहब के नये उपन्यास को सेलिब्रेट कर रहे थे। अब ये निर्णय लेना था कि केक कौन काटेगा तो ये निर्धारित हुआ कि होस्ट्स और  आज़ादभारती जी केक काटेंगे। तालियों की गडगडाहट के बीच केक काटा और फिर सबके बीच उसका वितरण हुआ। सबने यही दुआ की कि पाठक साहब यूँ ही लिखते रहे हैं और ऐसी ही उनके हर उपन्यास के लिए केक कटते रहे। नवल जी का ये आईडिया मुझे काफी अच्छा लगा और उनके इस आईडिया की जितनी तारीफ की जाए उतना कम है। उम्मीद है ऐसे छोटे छोटे आयोजन हर मीट में होंगे ताकि मीट और यादगार बन सके।

हीरा फेरी उपन्यास  आने के  उपलक्ष में लाया गया केक 

होस्ट पुनीत भाई, अंकुर भाई और आज़ादभारती जी द्वारा केक काटा गया 

केक काटने के बाद सबको खिलाया गया 
केक कटिंग सेरेमनी के खत्म होने के कुछ देर बाद ही दौर-ए-जाम शुरू हुआ। इसी दौरान पुनीत भाई के बड़े भाई भी मीट में आये और उन्होंने अपने प्यार और आशीर्वाद से सबको कृतार्थ किया। अब सभी अपना पसंदीदा पेय पी रहे थे। जिन्हें सोमरस पसंद था वो सोमरस, जिन्हें कोल्ड ड्रिंक पसंद थी वो कोल्ड ड्रिंक और जिन्हें कोल्ड ड्रिंक और सोमरस दोनों पसंद था वो उसे मिलाकर चुसक रहे थे। संक्षेप में कहूँ तो सभी अपनी इच्छानुसार आनंद ले रहे थे। स्टार्टर्स भी चालू हो चुके थे। शाकाहारी और मांसाहारी दोनों का बंदोबस्त था।  जामों के दौर और स्वादिष्ट स्टार्टर्स के साथ मीट की अगली कार्यवाही शुरू हुई।

पुनीत भाई उठे और उन्होंने मीट के होस्ट होने के कारण एक वक्तव्य दिया जिसमे उन्होंने सबको शुक्रियादा अदा किया। इसके बाद उन्होंने अल्मास भाई को सभा संचालन करने का कार्यभार सौंपा। क्योंकि हममें से काफी लोग एक दूसरे को जानते थे तो ये निर्धारित हुआ कि अल्मास भाई जो लोग एक दो मीट में आये हैं उनका संक्षिप्त परिचय देंगे और बाकी नये लोग अपना परिचय खुद देंगे तथा ये भी बताएँगे कि पाठक साहब के साथ उनका रिश्ता किस तरह जुड़ा।

हसन भाई ने कार्यभार संभाला और परिचय शुरू किया। मैंने अपने फोन में रिकॉर्डर ऑन कर लिया था जिसके कारण मीट का काफी ऑडियो मेरे पास रिकॉर्ड हो गया था। उसी से मीट की हाईलाइट्स आपके समक्ष रखना चाहूँगा।

सोमवार, 11 सितंबर 2017

ब्लॉगर में प्रकाशित पोस्ट का permalink कैसे बदलें ?

अभी कुछ दिन पहले मुझे एक समस्या का सामना करना पड़ा। हुआ यूँ कि मैंने अपने माउंट आबू यात्रा वृत्तांत की एक पोस्ट को इधर प्रकाशित किया था। उसमे हम होटल भाग्यलक्ष्मी में रुके थे। अब ये मेरी कमजोर याददाश्त ही थी कि मैंने होटल को भाग्यलक्ष्मी की जगह धनलक्ष्मी समझा और पूरे पोस्ट में इसी नाम  से उसका ज़िक्र किया। फिर पोस्ट पढ़कर अमित श्रीवास्तव जी ने मेरी भूल को सुधारा और सही नाम बताया। अब पोस्ट पे तो मैने नाम बदल दिया था लेकिन जो मैंने कस्टम यूआरएल बनाया था उसमे होटल धनलक्ष्मी ही था। मैं इसको भी बदलना चाहता था लेकिन कैसे करूँ कोई आईडिया नहीं था। इसलिए मैंने इसके विषय में सर्च किया और मुझे इस विषय में जानकारी मिली। मुझे मिली तो सोचा इधर अपने ब्लॉग के माध्यम से  क्यों न उसे साझा कर लूँ।

अपने ब्लॉग पोस्ट का पर्मालिंक आप बड़ी आसानी से बदल सकते हैं। ऐसा कैसे कर सकते हैं ? आईये जानते हैं:


१.सबसे पहले तो आपको अपनी प्रकाशित पोस्ट को एडिटर में खोलिए। उधर जाकर Permalink पर क्लिक करेंगे तो आपको पोस्ट का मौजूदा लिंक दिखने लगेगा। नीचे तस्वीर में arrow उस लिंक की तरफ पॉइंट कर रहा है। आप देख सकते हैं कि प्रकाशित पोस्ट का लिंक blogpost_9.html है। अब इस नाम का पोस्ट के शीर्षक से कुछ लेना देना नहीं है और इसी को अब हम बदलेंगे।



गुरुवार, 7 सितंबर 2017

24वाँ दिल्ली पुस्तक मेला, दरयागंज का सन्डे मार्किट और एक मिनी मीट

पिछ्ला सप्ताहंत बेहतरीन बीता। दिल्ली में पुस्तक मेला लगा हुआ था तो शनिवार को उधर गया और  रविवार को दरयागंज गया और  साथ में कुछ मित्रों से मिलना भी हुआ। बस दुःख ये है कि फोटोएं काफी कम खींची। खैर, आप भी चलिए मेरे साथ।


शनिवार 2 सितम्बर 2017
दिल्ली में पुस्तक मेला लगा हुआ था तो उधर जाने का मेरा मन था। पुस्तक मेला २६ अगस्त से 3 सितम्बर तक लगना था। चूँकि मैं २४ को ही अपने  घर पौड़ी चले गया था तो मुझे उस सप्ताहंत में पुस्तक मेले में जाने का मौका नहीं मिला। सप्ताह के बाकी दिनों में काम काज का सिलसिला ऐसा रहता है कि कहीं भी जाना असम्भव रहता है। इसलिए  २६-२७ अगस्त के पश्चात दो या तीन सितम्बर ही ऐसी तारीक बची थीं जो मेरे लिए पुस्तक मेले में भ्रमण करने  लिए उपयुक्त थी। और मैंने इन्ही दो दिनों में उधर जाने का फैसला लिया।

दो सितम्बर को शनिवार था और मैं जल्द ही उठ गया। मौसम में बदली छाई हुई थी। मुझे उम्मीद थी कि बारिश नहीं होगी। सुबह उठकर जल्दी नाश्ता किया और पुस्तक मेले के लिए निकल गया। शनिवार को मैंने डॉक्टर हु एंड द ऑटन इनवेज़न पढना शुरू किया था और मेट्रो का सफ़र उपन्यास पढ़ते हुए और उसके इंटरेस्टिंग वाक्यों को गुडरीडस और फेसबुक पे साझा करते हुए बीता। ये तृतीय डॉक्टर का उपन्यास है।  अगर आप डॉक्टर हु सीरीज देखते हैं तो आपको पता होगा कि एक ही डॉक्टर के अलग अलग सीजन में अलग रूप होते हैं। 1963  को चला ये शो आज भी बदस्तूर जारी है।और डॉक्टर कई रूप ले चुका है। मैंने नेटफ्लिक्स पे ये सीरीज देखी थी और मुझे पसंद आई थी। उसके बाद मैने डॉक्टर हु का एक नावेल संडे मार्किट के दौरे पे मिला था। (उस दिन मैंने क्या क्या लिया था आप इधर जाकर पढ़ सकते हैं।) खैर, उसे पढने के बाद मेरे मन में और डॉक्टर हु के उपन्यास पढने की ललक जागी और मैंने तीन चार खरीद लिए थे। डॉक्टर हु एंड द ओटन इन्वेजन उन्ही में से  से एक है।

उपन्यास रोचक था और इसे पढ़ते हुए कब राजीव चौक आया पता ही नहीं चला। फिर ट्रेन बदली और प्रगति मैदान की तरफ बढ़ा। राजीव चौक से प्रगति मैदान दो तीन स्टेशन के बाद ही आ जाता है तो जल्द ही मैं मेट्रो से एग्जिट करके पुस्तक मेले की ओर बढ़ रहा था।  मैं करीब साढ़े नौ बजे रूम से निकला था और करीब दस बजकर पचपन मिनट पर पुस्तक मेले में दाखिल हो गया था।

मेले का टिकट तीस रूपये का था। मैंने टिकट लिया और अन्दर दाखिल हुआ। मैं पिछले पुस्तक मेलों में काफी सामान खरीद चुका था(दिल्ली पुस्तक मेला २०१६,विश्व पुस्तक मेला 2017)। उनके इलावा भी गाहे बघाहे किताबें खरीदता रहता हूँ तो मेरा ज्यादा किताबें लेने का मन नहीं था। मेरे मन में दो किताबें थी जो मैं लेना चाहता था। एक स्टेफेन किंग का उपन्यास इट था और दूसरा राहुल संकृत्यायन जी की किताब घुम्मकड़ शास्त्र।  जब पुस्तक मेले में दाखिल हुआ था तो मन में इन्ही दो किताबों को लेने का विचार था।

लेकिन फिर पुस्तक मेले में घुसते ही कुछ और किताबों के नाम याद आने लगे। अक्सर ऐसा होता है मेरे साथ।  मैंने सोचा राजकमल प्रकाशन से  'प्रोफेसर शंकु के कारनामे' और 'जहाँगीर की स्वर्ण मुद्रा' सरीखे उपन्यास भी ले लूँगा। जहाँगीर की स्वर्ण मुद्रा मैंने कुछ दिनों पहले अमेज़न से मंगवाया था लेकिन उसकी प्रति जो मुझे मिली थी वो काफी क्षत विक्षित हालत में थी तो मैंने उसे वापस करवा दिया। यानी घर से निकलते हुए मन में दो किताबें थी और पुस्तक मेले में आते ही दो किताबें उस सूची में जुड़ गयी थी। अब देखना था कि इनमे से कितनी मुझे मिल पाती।

पुस्तक मेले में एंट्री 




पुस्तक मेले में इस बार भीड़ मुझे काफी कम दिख रही थी। किताबें 9-11 हॉल में थी। मैं उनमें दाखिल हुआ और स्टाल्स में घूमने लगा। पहले चक्कर में मैं कुछ खरीदना नहीं चाह रहा था खाली अलग अलग प्रकाशनों के पास जाता और कुछ देर ब्राउज करके निकल जाता। हाँ, जो पसंद आती उनको मन में नोट कर लेता।  मैंने सोचा था पहले चक्कर में जिन किताबों के विषय में मन बनाया है उनको ढूँढू और अगर वो न मिले तो ही दूसरों पर हाथ डालूँ। किताबघर, एनबीटी और साहित्य अकादमी के स्टाल में मौजूद लोगों से  मैंने राहुल संकृत्यायन के घुमक्कड़ शास्त्र के विषय में पूछा था लेकिन वो उनके पास नहीं थी। हिंदी बुक सेण्टर का स्टाल भी उधर था लेकिन घुम्मक्कड शास्त्र उधर भी नहीं थी। साथ में अंग्रेजी उपन्यासों वाली जगह में इट भी ढूँढने की कोशिश की थी लेकिन वो भी कहीं दिखाई नहीं दी थी। राजकमल और वाणी प्रकाशन का स्टाल मुझे दिखाई नहीं दिया।
एक बार पूरा मेला घूम चुकने के बाद मैं बाहर निकल आया। मुझे लगा था कि दूसरा हॉल होगा जहाँ  ये दोनों प्रकाशन होंगे। बाहर आने पर 12 नंबर हॉल की तरफ गया तो उधर दूसरा मेला लगा था जहाँ शायद स्टेशनरी का सामान बिक रहा था। इसमें मुझे रुचि नहीं थी। हाँ, अब यकीन हो गया था कि पुस्तक मेले में से राजकमल और वाणी प्रकाशन नदारद थे। राजकमल वालों का बीएचयू में अलग से मेला चल रहा है और शायद इसलिए उन्होंने इस मेले को महत्व नहीं दिया। इसके इलावा वाणी वाले शायद देहरादून पुस्तक मेले को शायद ज्यादा तरजीह दे रहे थे। इससे मुझे थोड़ी निराशा हुई। क्योंकि अब प्रोफेसर शंकु के कारनामे और जहाँगीर की स्वर्ण मुद्रा नहीं ले सकता था। यानी हालत ऐसी थी कि जिन किताबों का मन बनाकर आया वो तो मिलनी नहीं थी।